कारगिल में शहीद हुए थे विजयंत थापर, बहादुरी का ये किस्सा रहेगा याद

कारगिल की जंग में शहीद हुए भारतीय सेना के जवान कैप्टन विजयंत थापर का आज जन्मदिन है. सेना में विजयंत को सिर्फ छह महीने ही हुए थे, जब करगिल युद्ध (भारत-पाकिस्तान) छिड़ गया था और थापर इस जंग में देश के लिए कुर्बानी देने वाले सबसे कमउम्र जांबाज थे.

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विजयंत थापर विजयंत थापर

मोहित पारीक

  • नई दिल्ली,
  • 26 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 3:08 PM IST

कारगिल की जंग में शहीद हुए भारतीय सेना के जवान कैप्टन विजयंत थापर का आज जन्मदिन है. सेना में विजयंत को सिर्फ छह महीने ही हुए थे, जब करगिल युद्ध (भारत-पाकिस्तान) छिड़ गया था और थापर इस जंग में देश के लिए कुर्बानी देने वाले सबसे कमउम्र जांबाज थे. 26 दिसंबर 1976 को जन्मे विजयंत सैनिकों के परिवार से आते थे. परदादा डॉ. कैप्टन कर्ता राम थापर, दादा जेएस थापर और पिता कर्नल वीएन थापर सब के सब फौज में थे.

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बचपन से ही विजयंत का सपना आर्मी ज्वाइन करने का था. वो 'बॉर्न सोल्जर' थे. जब उनके पिता रिटायर हुए, लगभग तभी उन्होंने राजपूताना राइफल्स में कमिशन लिया. जून 1999 में कैप्टन विजयंत ने तोलोनिंग (कारगिल) पर विजय हासिल की और भारत का तिरंगा लहराया. कारगिल पर विजय हासिल करने के बाद कैप्टन के सामने दूसरी चुनौती तब आई, जब पाकिस्तानी फौज ने पिंपल्स और नॉल पर कब्जा कर लिया था.

इसके बाद उन्हें नोल एंड लोन हिल पर 'थ्री पिम्पल्स' से पाकिस्तानियों को खदेड़ने की जिम्मेदारी मिली. चांदनी रात में पूरी तरह से दुश्मन की फायरिंग रेंज में होने के बावजूद विजयंत आगे बढ़े. हम 'थ्री पिम्पल्स' जीत गए लेकिन इस अभियान में हमने विजयंत को खो दिया. उन्हें शहादत मिली.

उन्होंने एक खत लिखा था, जिसमें लिखा हुआ था, 'मेरा यह खत जब तक आपके पास पहुंचेगा, मैं आप सबको आसमान से देख रहा होऊंगा. अगर मैंने फिर मनुष्य का जन्म लिया तो एक बार फिर सेना में भर्ती होकर देश के लिए लड़ना चाहूंगा. नई पीढ़ी को इस कुर्बानी के बारे में बताना चाहिए. पापा, मां, आपको गर्व होना चाहिए.'

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मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विजयंत थापर ने शहादत से पहले 13 जून 1999 को तोलोलिंग की पहाड़ियों पर जीत का झंडा फहराया था. ये महत्वपूर्ण जीत करगिल की जंग के दौरान भारत के हक में एक निर्णायक लड़ाई साबित हुई.

रिपोर्ट्स के मुताबिक कैप्टन विजंयत के कमरे में वो यूनिफॉर्म आज भी टंगी है, जो उनकी शहादत के बाद करगिल से भेजी गई थी. तोलोलिंग की उस चोटी की तस्वीर भी लगी है, जिस पर उन्होंने जीत का तिरंगा फहराया था. कमरे में शहीद विजयंत की तस्वीरें और उनसे जुड़ी तमाम चीजें आज भी वैसे ही रखी हैं.

 

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