सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी भारी पड़ी! केंद्रीय शिक्षा सचिव को जारी हुआ अवमानना नोटिस

यह पूरी कानूनी कार्यवाही अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट याचिका के बाद शुरू हुई है. इसमें याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण और उनकी निगरानी के लिए एक स्पष्ट फ्रेमवर्क बनाया जाए.

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सुप्रीम कोर्ट (Photo-File) सुप्रीम कोर्ट (Photo-File)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 15 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:19 PM IST

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का तय सीमा में पालन न करना केंद्रीय शिक्षा सचिव टीके अनिल कुमार को भारी पड़ता नजर आ रहा है. शीर्ष अदालत ने एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय शिक्षा सचिव को अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद के लिए सूचीबद्ध की है.

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'यह सीधे तौर पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का मामला'

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद सख्त रुख अपनाया. पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला सीधे तौर पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट से जुड़ा हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवमानना की इस कार्यवाही के दौरान अदालत किसी नए संवैधानिक मुद्दे पर विचार नहीं करेगी, बल्कि उसका एकमात्र मकसद यह सुनिश्चित करना है कि शीर्ष अदालत के पूर्व आदेश का शत-प्रतिशत पालन हो. हालांकि, राहत की बात यह रही कि अदालत ने केंद्रीय शिक्षा सचिव टीके अनिल कुमार को इस कंटेम्प्ट याचिका की सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के समक्ष पेश होने से छूट दे दी है.

क्या है पूरा विवाद?

यह पूरी कानूनी कार्यवाही अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट याचिका के बाद शुरू हुई है. इसमें याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण और उनकी निगरानी के लिए एक स्पष्ट फ्रेमवर्क बनाया जाए.

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इस मामले में याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह याचिका में उठाए गए मुद्दों पर 3 महीने के भीतर निर्णय ले. अब याचिकाकर्ता का आरोप है कि अदालत द्वारा दी गई 3 महीने की समय सीमा बीत जाने के बाद भी शिक्षा मंत्रालय की ओर से कोई फैसला नहीं लिया गया, जो कि सीधे तौर पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट यानी शीर्ष अदालत के आदेशों का उल्लंघन है. इसी आधार पर उन्होंने अवमानना याचिका दायर की.

अब इस मामले में चार हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है, जहां शिक्षा मंत्रालय को शीर्ष अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर अवमानना की नौबत क्यों आई और आदेश का पालन अब तक क्यों नहीं हुआ.

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