MBA कर रहे या करने की सोच रहे छात्रों के लिए हवा का रुख बदल चुका है. वो दिन गए जब छात्र सिर्फ 'प्लेसमेंट डे' का इंतजार करते थे और एक-दो इंटरव्यू देकर बड़ी कंपनी का ऑफर लेटर हाथ में आ जाता था. अब कंपनियां बहुत सोच-समझकर दांव लगा रही हैं.
नौकरी कब मिलेगी, कहां मिलेगी और कैसे मिलेगी... इस पूरे प्रोसेस का मिजाज ही बदल गया है. BT-MDRA बेस्ट बी-स्कूल्स सर्वे 2026-27 के आंकड़े साफ बता रहे हैं कि अब कंपनियां फाइनल प्लेसमेंट का इंतजार करने के बजाय इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स और PPO (प्री-प्लेसमेंट ऑफर) के जरिए छात्रों को लंबे समय तक परख रही हैं.
टियर-2 कॉलेजों ने मारी बाजी, टॉप बी-स्कूल्स की रफ्तार धीमी
अगर आपको लगता है कि सिर्फ देश के टॉप 25 बी-स्कूल्स में ही नौकरियां हैं, तो आंकड़े आपको चौंका देंगे! पहले जहां टॉप 25 बी-स्कूल्स में प्लेसमेंट दर 97.5% थी, वो अब घटकर 96.4% पर आ गई, वहीं 51 से 75वें रैंक वाले टियर-2 कॉलेजों में यह आंकड़ा 87.4% से उछलकर सीधे 93.8% पर पहुंच गया.
स्टाइपेंड का हाल
टॉप 25 कॉलेजों में औसतन स्टाइपेंड 23% तक गिर गया, जबकि 51 से 75वें रैंक वाले कॉलेजों में छात्रों के स्टाइपेंड में 20% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
PPO का ट्रेंड
अब कंपनियों ने बिना परखे नौकरी बांटना कम कर दिया है. PPO के आंकड़े भी टॉप कॉलेजों में नीचे गिरे हैं.
सीवी पर 'AI' या 'IIM' लिख देने से बात नहीं बनेगी!
कंपनी वाले अब बहुत सख्त हो गए हैं. सिर्फ बड़े कॉलेज की डिग्री या सीवी में फैंसी शब्द लिख देने भर से लाखों का पैकेज नहीं मिलने वाला. कंपनियां अब यह देख रही हैं कि आपने इंटर्नशिप के दौरान असल में क्या तीर मारा? क्या आपने कोई ऐसा काम या प्रोजेक्ट किया जिससे कंपनी का फायदा हुआ?
IIM कोझिकोड के डायरेक्टर देबाशीष चटर्जी और MDI गुड़गांव के प्रोफ़ेसर रोहित सिंधवानी का साफ कहना है कि अब कंपनियां 2-3 महीने की इंटर्नशिप में ही बच्चे को पूरा ठोक-बजाकर देख लेती हैं. अगर बंदा काम का लगा, तो तुरंत PPO थमा दिया.
टैलेंट कंसल्टिंग फर्म 'हान डिजिटल' के सीईओ सरवनन बालसुंदरम के मुताबिक नियोक्ता अब सिर्फ 2-3 राउंड के इंटरव्यू के भरोसे 2 साल का रिस्क नहीं लेना चाहते. वे बंदे को पहले काम करते हुए देखना चाहते हैं.
कंपनियां ज्यादा आ रही हैं, पर क्या नौकरियां भी बढ़ रही हैं?
मजेदार बात यह है कि कैंपस में आने वाली कंपनियों की संख्या तो 8 से 10% बढ़ी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे भर-भर के नौकरियां बांट रही हैं. रिक्रूटर्स हर कॉलेज में जा रहे हैं, लेकिन चुन सिर्फ उसी को रहे हैं जिसमें सच में दम है.
सैलरी पैकेज की बात करें तो टॉप 10 बी-स्कूल्स का औसत पैकेज भले ही ₹29.9 लाख तक पहुंच गया हो, लेकिन निचले रैंक के कॉलेजों में पैकेज में गिरावट भी देखी गई है. यानी बाजार बहुत सेलेक्टिव हो चुका है.
अब कंपनियों को भी मनाना पड़ रहा है!
आज की नई पीढ़ी यानी 'Gen Z' को रिझाना इतना आसान नहीं है. अब सिर्फ कंपनियां ही छात्रों का इंटरव्यू नहीं ले रहीं, बल्कि कंपनियों को भी कैंपस में आकर यह साबित करना पड़ रहा है कि उनका वर्क कल्चर और रोल कितना शानदार है. एचआर वाले अब पूरे-पूरे दिन कैंपस में बिताकर छात्रों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
सीधा गणित यही है कि अगर आपके पास सच में कोई स्किल है, आप AI का सही इस्तेमाल करना जानते हैं और बिजनेस की प्रॉब्लम सॉल्व कर सकते हैं तो पैकेज की चिंता भूल जाइए, कंपनियां आपको ढूंढती हुई आएंगी!
आजतक एजुकेशन डेस्क