कॉर्पोरेट नौकरी खोना अपने आप में काफी मुश्किल होता है. लेकिन 29 साल के एक व्यक्ति के लिए, चार महीने की बेरोजगारी ने उन्हें एहसास कराया कि उन्होंने केवल नौकरी नहीं खोई है बल्कि नौकरी के साथ ही मिलने वाले उद्देश्य और नियमित दिनचर्या को भी खो दिया है. उन्होंने अपने इस अनुभव को ऑनलाइन शेयर कर बताया है कि अप्रैल में उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया था और उन्हें नौ महीने का मुआवजा दिया गया था, उन्हें बेरोजगारी भत्ता भी मिल रहा है, जो नवंबर तक जारी रहने की उम्मीद है.
उनका कहना है कि उनके पास कई सालों तक खर्च चलाने के पर्याप्त बचत थी लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी का इमोशनल असर उनपर दिखाई देने लगा. इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने एक अलग फैसला लिया. उन्होंने 11 डॉलर प्रति घंटे यानी करीब 950 रुपये प्रति घंटे की कमाई वाले पार्ट-टाइम बर्तन धोने के काम करने का फैसला किया.
200 आवेदन 15 इंटरव्यू और नहीं मिली नौकरी
अपनी पोस्ट में युवा ने आगे लिखा कि किसी और नौकरी की तलाश करना उनके लिए आसान नहीं था. उन्होंने बताया कि करीब 200 से भी ज्यादा आवेदन भेजे और 15 से ज्यादा इंटरव्यू में शामिल हुए लेकिन बावजूद इसके उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली. बार-बार मिल रहे रिजेक्शन से न केवल उनका आत्मविश्वास टूट रहा है बल्कि उनकी दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है. उनका कहना था कि नौकरी न होने की वजह से उनके दिन का एक तय रुटीन भी खराब हो गया था.
नहीं मिलती है खुशी
हालांकि, उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी कॉर्पोरेट नौकरी कुछ खास पसंद नहीं थी. इसके बावजूद बेरोजगार होने के बाद उन्हें समझ आया कि नौकरी सिर्फ काम या कमाई नहीं होती. इससे अपनेपन, उपयोगी होने और अपनी पहचान का एहसास भी जुड़ा होता है.
पूरी रुटीन हो गई है खराब
चार महीने तक बिना काम के रहने के बाद उन्हें धीरे-धीरे लगने लगा कि उनकी जिंदगी की दिशा खो रही है. उन्होंने बताया कि खुद को बेकार महसूस करने के कारण उनका मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा था. हर दिन जॉब पोर्टल पर नई नौकरियां तलाशने और किसी कॉर्पोरेट नौकरी का इंतजार करने के बजाय उन्होंने अपनी दिनचर्या में बदलाव करने का फैसला किया.
इसी दौरान उन्हें पार्ट-टाइम बर्तन धोने का काम मिला, जिसे वह अगले हफ्ते से शुरू करने वाले हैं. उनका कहना है कि यह काम उनके पुराने करियर की जगह लेने या आर्थिक समस्या को हल करने के लिए नहीं है बल्कि वह उम्मीद कर रहे हैं कि काम और रोज की जिम्मेदारियों से उन्हें फिर से स्थिरता और एक तय दिनचर्या हासिल करने में मदद मिलेगी.
क्या काम बन सकता है हमारी पहचान का हिस्सा?
अपने अनुभव के आधार पर वह अब सोच रहे हैं कि लोग अपनी पहचान को नौकरी और काम से कितनी गहराई से जोड़ लेते हैं. उन्हें अपनी पिछली कॉर्पोरेट नौकरी पसंद नहीं थी, लेकिन नौकरी जाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि काम का उनके मानसिक और भावनात्मक जीवन में कितना महत्व था.
नौकरी से उन्हें एक तय रुटीन, गोल और हर सुबह उठने की एक वजह मिलती थी. इन चीजों के बिना शुरुआत में मिला खाली समय अच्छा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यही खालीपन उन्हें बोझ जैसा महसूस होने लगा. अब वह यह भी सोच रहे हैं कि अगर वह आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र हो जाएं और उन्हें दोबारा कभी काम करने की जरूरत न पड़े, तो क्या उनकी चिंता खत्म हो जाएगी.
अभी दिन में बहुत समय बच जाता है
उन्होंने बताया कि शौक में खुद को व्यस्त रखने के बावजूद दिन का काफी समय खाली रहता है. इसी अनुभव ने उन्हें उस सोच पर सवाल उठाने के लिए मजबूर किया है कि आर्थिक स्वतंत्रता मिलने के बाद जिंदगी अपने आप आसान और खुशहाल हो जाती है. जिस व्यक्ति को जीवन का बड़ा हिस्सा काम करते हुए बिताने की आदत हो, उसके लिए अचानक बहुत ज्यादा खाली समय मिलना भी अपनी तरह की चुनौतियां लेकर आ सकता है.
पिता की रिटायरमेंट को लेकर भी चिंता
उनकी चिंता सिर्फ अपनी नौकरी तक सीमित नहीं है. वह अपने पिता के बारे में भी सोच रहे हैं, जिन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में करीब 30 साल काम किया है और लगभग तीन साल बाद रिटायर होने वाले हैं. 29 साल के इस युवक को डर है कि रिटायरमेंट के बाद उनके पिता को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. दशकों तक नौकरी, सहकर्मियों और तय दिनचर्या के बाद अचानक खाली समय बढ़ जाना उनके लिए भी एक चुनौती हो सकता है. ऐसे में सवाल होगा कि उस समय का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए.
छोटा काम, लेकिन बड़ा मकसद
कॉर्पोरेट नौकरी करने वाले व्यक्ति के लिए बर्तन धोने का पार्ट-टाइम काम करना भले ही बड़ा बदलाव लगे लेकिन उनके लिए इसका मतलब सिर्फ कमाई नहीं थी. यह काम उन्हें घर से बाहर निकलने की वजह, एक तय समय और रोज पूरा करने के लिए एक जिम्मेदारी देगा. साथ ही इससे उन्हें अपनी पहचान को पिछली कॉर्पोरेट नौकरी से अलग करने में मदद मिल सकती है.
अब देखना होगा कि इस काम से उनके नजरिए में कितना बदलाव आता है. फिलहाल वह इंतजार करने के बजाय काम करना चुन रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि रोज कुछ घंटे काम करने से बेरोजगारी की चिंता कम होगी और उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि उनका आत्मसम्मान सिर्फ कॉर्पोरेट नौकरी पर निर्भर नहीं है.
(नोट- यह खबर सोशल मीडिया पर शेयर किए गए पोस्ट पर आधारित है. aajtak.in इस पर किए गए दावों की पुष्टि नहीं करता)
आजतक एजुकेशन डेस्क