पीएचडी में दाखिला किसी भी छात्र के लिए कई साल की पढ़ाई और मेहनत के बाद मिलने वाला बड़ा मौका होता है. खासकर आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों के लिए तय सीटें उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने का अहम जरिया होता है. ऐसे में अगर इन सीटों के आवंटन में कमी का आरोप लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पीएचडी दाखिलों को लेकर ऐसा ही विवाद सामने आया है. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की ओर से आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय में आरक्षण नीति को सही तरीके से लागू नहीं किया गया. संगठन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है.
छह दाखिला सत्रों में 86 सीटों की कमी का दावा
AISA ने 31 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय को भेजे पत्र में कहा कि उसमे मॉनसून 2022 से मॉनसून 2026 तक के छह दाखिला सत्रों का विश्लेषण किया है. संगठन के मुताबिक, इस दौरान पीएचडी की कुल 4,288 सीटों का विज्ञापन दिया गया. इनमें अनुसूचित जनजाति (ST) और अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण के अनुपात के हिसाब से जितनी सीटें होनी चाहिए थीं, उतनी आवंटित नहीं की गईं.
संगठन का दावा है कि 7.5 फीसदी एसटी कोटे के तहत करीब 322 सीटें मिलनी चाहिए थीं लेकिन केवल 278 सीटें आवंटित की गईं. यानी इस वर्ग के लिए 44 सीटों की कमी रही. वहीं, 15 फीसदी एससी कोटे के तहत करीब 643 सीटें अपेक्षित थीं, जबकि 601 सीटें ही आवंटित की गईं. AISA के अनुसार, इस तरह दोनों वर्गों को मिलाकर 86 सीटों का अंतर सामने आया.
2026-27 के दाखिलों को लेकर भी सवाल
AISA ने 2026-27 के दाखिला सत्र के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए हैं. संगठन के मुताबिक, इस सत्र में पीएचडी की 711 सीटों का विज्ञापन जारी किया गया. इनमें एसटी वर्ग के लिए करीब 53 सीटें होनी चाहिए थीं, लेकिन केवल 38 सीटें आवंटित की गईं. संगठन ने इसे 15 सीटों की कमी बताया है. एससी वर्ग के मामले में भी AISA ने कहा कि 15 फीसदी आरक्षण के हिसाब से करीब 107 सीटें अपेक्षित थीं, जबकि विज्ञापन में 103 सीटें दिखाई गईं. इसके अलावा, दिव्यांग उम्मीदवारों (PwD) के लिए 36 सीटें अपेक्षित होने के बावजूद केवल 17 सीटों का विज्ञापन किए जाने का दावा किया गया है.
कई विभागों में एसटी उम्मीदवारों के लिए सीटें नहीं होने का आरोप
छात्र संगठन ने यह भी दावा किया कि विश्वविद्यालय के कई पीएचडी कार्यक्रमों में एसटी उम्मीदवारों के लिए एक भी सीट का विज्ञापन नहीं दिया गया. AISA के पत्र के मुताबिक, चार दाखिला चरणों के दौरान 351 सीटों वाले 30 कार्यक्रमों में एसटी वर्ग के लिए कोई सीट नहीं दिखाई गई. संगठन ने कहा कि 2026-27 के दाखिला सत्र में 84 में से 56 कार्यक्रम ऐसे थे, जिनमें एसटी वर्ग के लिए सीटें विज्ञापित नहीं की गईं. AISA ने छोटे विभागों और कम सीटों वाले कार्यक्रमों में आरक्षण रोस्टर लागू करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं.
OBC छात्रों की संख्या में गिरावट का भी मुद्दा उठाया
AISA ने विश्वविद्यालय में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों की संख्या में कमी का मुद्दा भी उठाया है. संगठन ने JNU की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 2023-24 में OBC छात्रों की संख्या 2,975 थी, जो 2024-25 में घटकर 2,766 रह गई. इसी अवधि में कुल छात्र संख्या में OBC छात्रों की हिस्सेदारी भी 37.20 फीसदी से घटकर 34.61 फीसदी हो गई. संगठन का कहना है कि कुल छात्र संख्या में बहुत बदलाव नहीं होने के बावजूद OBC छात्रों की संख्या और उनकी हिस्सेदारी में गिरावट आई है.
शिक्षा मंत्रालय से क्या मांग की गई?
AISA ने शिक्षा मंत्रालय से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने और JNU को 2026-27 का पूरा पीएचडी आरक्षण रोस्टर सार्वजनिक करने का निर्देश देने की मांग की है. संगठन ने एससी और एसटी वर्ग की सीटों का ऑडिट कराने के साथ-साथ आवेदन, शॉर्टलिस्टिंग, इंटरव्यू, चयन, दाखिले और खाली रह गई सीटों का श्रेणीवार डेटा जारी करने की मांग भी की है.
इसके अलावा, संगठन ने आरक्षित सीटों को सामान्य वर्ग में बदलने से रोकने के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाने, कम सीटों वाले कार्यक्रमों में आरक्षण रोस्टर की समीक्षा करने और Not Found Suitable (NFS) प्रावधान के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाने की मांग की है.
AISA ने NET/JRF के जरिए होने वाले पीएचडी दाखिलों की समीक्षा और JNUEE आधारित प्रवेश प्रक्रिया बहाल करने पर विचार करने की बात भी कही है. यह पत्र AISA के महासचिव प्रशांतजीत कुमार और अध्यक्ष नेहा ने हस्ताक्षर करके भेजा है. संगठन ने शिक्षा मंत्रालय से इस मुद्दे पर अधिकारियों के साथ बैठक का समय देने की भी मांग की है.
अनमोल नाथ