आईआईएम से MBA, बड़ी कंपनियों में इंटर्नशिप, अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड और कैंपस प्लेसमेंट की उम्मीद... देखने में इस करियर की शुरुआत किसी सपने से कम नहीं थी. लेकिन नौकरी शुरू करने के बाद तस्वीर कुछ और ही थी. ग्रेजुएट का दावा है कि वह एक ऐसी कंपनी में पहुंच गया जहां केवल 5 मिनट की देरी पर उसकी सैलरी कट जाती थी, जींस पहनने पर डांट पड़ती थी और नए आइडिया देना भी पसंद नहीं किया जाता था.
यानी जिस नौकरी को उसने अपने सपनों के करियर की शुरुआत समझा था, वहां पहुंचकर उसे लगा कि कॉलेज की पढ़ाई और असली कॉर्पोरेट जिंदगी के बीच जमीन-आसमान का फर्क है. इसे लेकर उसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर पोस्ट किया. जैसे-जैसे यह पोस्ट ऑनलाइन वारयल हुआ, एक नई बहस ने जन्म ले लिया.
पोस्ट में इन बातों का किया जिक्र
रेडिट यूजर के मुताबिक, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद मार्च 2026 में भारत के टॉप 10 आईआईएम में से एक से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने आगे दावा किया कि उन्होंने जेपी मॉर्गन में इंटर्नशिप की और डायरेक्टर मेरिट रैंक हासिल किया. इस दौरान उन्होंने बताया कि कैंपस प्लेसमेंट के दौरान नोएडा में मौजूद एक कंपनी से मिले ऑफर लेटर को एक्सेप्ट कर लिया जिसकी वजह अच्छी सैलरी और पोस्ट था. लेकिन कंपनी में शामिल होना उनके करियर का सबसे गलत फैसला था.
परिवार चलाती थी कंपनी
पूर्व कर्मचारी के मुताबिक, 200 से कम कर्मचारियों वाली यह पारिवारिक कंपनी है, जहां काम करने का तरीका बिल्कुल ही अलग और पुराना है. उनका आरोप है कि कर्मचारियों पंच-इन और पंच-आउट के नियम बहुत सख्त थे और सिर्फ पांच मिनट देर होने पर भी सैलरी काट ली जाती थी. उन्होंने यह भी दावा किया है कि कंपनी के ज्यादातर फैसले मैनेजिंग डायरेक्टर, उनकी बेटी और एक सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के हाथ में थे.
कर्मचारियों के सुझावों और नए विचारों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती थी. पूर्व कर्मचारी ने आगे कहां कि कंपनी में बदलाव को लेकर सोच बहुत पुरानी थी. नए तरीके अपनाने या कुछ अलग करने की कोशिशों को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता था. उनके मुताबिक, यही वजह थी कि कर्मचारियों के लिए अपने आइडिया सामने रखना और कुछ नया करने की कोशिश करना मुश्किल हो जाता था.
डेनिम पहनने पर होती थी आलोचना
यहां तक तो ठीक था. लेकिन उन्हें जो बात सबसे ज्यादा अजीब लगी वह थी कपड़ों को लेकर होने वाली आलोचना. उन्होंने आगे बताया कि कंपनी में कर्मचारियों को केवल फॉर्मल कपड़े पहनने की उम्मीद की जाती थी. अगर कोई कर्मचारी जींस पहनकर आ जाए, तो उसे सीनियर्स की फटकार तक सुननी पड़ सकती थी. उनका कहना है कि कंपनी में बदलाव और नए विचारों की बातें तो होती थीं, लेकिन जब कर्मचारी कोई सुझाव देते थे, तो ज्यादातर सुझावों को स्वीकार नहीं किया जाता था. पूर्व कर्मचारी के मुताबिक, इससे कर्मचारियों को लगता था कि कुछ नया करने या अपने आइडिया रखने का ज्यादा फायदा नहीं है.
मेंटल हेल्थ पर पड़ता था असर
कंपनी में करीब साढ़े तीन महीने बिताने के बाद रेडिट यूजर ने बताया कि भले ही कंपनी उसे एक अच्छा और जरूरी कर्मचारी मान रही थी, लेकिन उसे खुद लगने लगा था कि वह इस माहौल में फिट नहीं बैठ रहा है. उसे डर था कि अगर वह इसी कंपनी में लंबे समय तक काम करता रहा, तो इसका असर उसके करियर और भविष्य पर पड़ सकता है. इसी उलझन के बीच उसने रेडिट पर दूसरे लोगों से सलाह मांगी कि क्या उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए या फिलहाल वहीं बने रहना चाहिए.
कंपनी के साथ है एग्रीमेंट
स्नातक ने आगे बताया कि कंपनी के साथ उसका दो साल का सर्विस एग्रीमेंट है. अगर कोई कर्मचारी इससे पहले नौकरी छोड़ता है, तो उसे तीन महीने की सैलरी बतौर जुर्माना देनी पड़ती है. हालांकि, उनका कहना है कि अगर नौकरी छोड़ना उनके करियर के लिए जरूरी है, तो आर्थिक जुर्माना भी उन्हें इस्तीफा देने से नहीं रोक पाएगा.
आजतक एजुकेशन डेस्क