ट्रंप का यू-टर्न, रूस के डर से अमेरिका रद्द कर सकता है जर्मनी से मिसाइल डील

रूस के साथ सैन्य टकराव और उकसावे के डर से अमेरिका जर्मनी को टोमाहॉक मिसाइलें देने का सौदा रद्द कर सकता है. नाटो से अमेरिका की यह रणनीतिक वापसी जर्मनी की सुरक्षा के लिए बड़ा संकट है.

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अमेरिकी युद्धपोत से लॉन्च होती टोमाहॉक मिसाइल. (File Photo: US Navy) अमेरिकी युद्धपोत से लॉन्च होती टोमाहॉक मिसाइल. (File Photo: US Navy)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 9:55 AM IST

एक बेहद चौंकाने वाले और ऐतिहासिक नीतिगत बदलाव के तहत, पेंटागन जर्मनी को लंबी दूरी की टोमाहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइलें सौंपने की अपनी योजना को रद्द करने पर सोच कर रहा है. खुफिया और कूटनीतिक रिपोर्टों के अनुसार कि अमेरिकी अधिकारियों को इस बात का डर है कि मिसाइल सौदे को रूस सीधे उकसावे के रूप में देख सकता है, जिससे यूरोप में बड़ा अनियंत्रित सैन्य टकराव शुरू होने का खतरा है. 

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अमेरिका के इस संभावित फैसले ने न केवल वॉशिंगटन के सबसे भरोसेमंद और बड़े नाटो (NATO) सहयोगियों में से एक जर्मनी को हैरान कर दिया है, बल्कि इसे अमेरिकी महाद्वीप के अपने पुराने सहयोगियों से पीछे हटने के एक बड़े संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. यह फैसला इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि यह समझौता बाइडेन प्रशासन के दौरान बेहद सोच-समझकर और लंबी बातचीत के बाद तय किया गया था, जिसे अब डोनाल्ड ट्रंप पूरी तरह पलटने की तैयारी में दिख रहे हैं. 

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जर्मनी के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि बर्लिन लगातार यह दलील देता रहा है कि रूसी आक्रामकता से निपटने के लिए उसे इन आधुनिक रक्षा प्रणालियों की सख्त और तात्कालिक जरूरत है. इस पूरे मामले से जुड़े दो वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारियों और एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर पुष्टि की है कि वॉशिंगटन में इस समय तीव्र आंतरिक मंथन चल रहा है. 

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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और पेंटागन के रणनीतिकारों का मानना है कि मध्य यूरोप यानी जर्मनी की धरती पर इतनी संहारक और सटीक मार करने वाली अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती से मॉस्को भड़क सकता है. वह किसी न किसी रूप में इसका गंभीर सैन्य जवाब दे सकता है. 

वर्तमान अमेरिकी प्रशासन इस समय रूस के साथ सीधे सैन्य गतिरोध में उलझने से बचना चाहता है, भले ही इसके लिए उसे अपने दशकों पुराने नाटो सहयोगियों की सुरक्षा प्राथमिकताओं से समझौता क्यों न करना पड़े. दूसरी तरफ, बर्लिन में इस संभावित फैसले को लेकर भारी बेचैनी और असुरक्षा का माहौल बन गया है, क्योंकि जर्मनी ने अपनी भावी रक्षा रणनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी अमेरिकी मिसाइल सौदे पर केंद्रित कर रखा था.

नाटो से अमेरिका का बढ़ता अलगाव और रणनीतिक वापसी का दौर

जर्मनी के साथ टोमाहॉक मिसाइल सौदे को रद्द करने की यह संभावित कवायद कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह यूरोप और नाटो गठबंधन के प्रति अमेरिकी नीति में आ रहे एक व्यापक और गहरे बदलाव का हिस्सा है. पिछले कुछ समय से अमेरिका यूरोपीय सुरक्षा तंत्र में अपनी प्रत्यक्ष भागीदारी को धीरे-धीरे कम कर रहा है. 

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इसमें न केवल मिसाइल सौदों को वापस लेना शामिल है, बल्कि जर्मनी में पहले से तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित तैनाती को रद्द करना और वहां से कई महत्वपूर्ण सैन्य संपत्तियों को वापस बुलाने की योजनाएं भी शामिल हैं. 

दशकों से जिस मजबूत और अटूट साझेदारी ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को बांधकर रखा था. जिसने शीत युद्ध के बाद से पूरे यूरोप को सुरक्षा की गारंटी दी थी, वह कूटनीतिक संरचना अब अमेरिकी प्राथमिकताओं के बदलने से बिखरती हुई नजर आ रही है.

इस रणनीतिक बदलाव को हाल ही में यूरोपीय और अमेरिकी सैन्य कमांडरों के बयानों में भी साफ महसूस किया गया. नाटो के शीर्ष कमांडर और यूरोप में अमेरिकी सेना के प्रमुख, जनरल एलेक्सस ग्रिनकेविच ने इस सप्ताह सैन्य नेताओं की एक उच्च स्तरीय बैठक में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं आगे आना होगा और निकट भविष्य में अपनी जिम्मेदारी खुद संभालनी होगी.

जनरल ग्रिनकेविच का यह बयान यूरोपीय देशों के लिए एक खुली चेतावनी की तरह है कि वे अब अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिकी छतरी पर निर्भर नहीं रह सकते. उन्होंने साफ किया कि अमेरिका अब अपनी सेनाओं, आधुनिक हथियारों और रणनीतिक उपकरणों को यूरोप से हटाकर दुनिया के अन्य महत्वपूर्ण और उभरते हुए संघर्ष क्षेत्रों (जैसे कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र) पर रीफोकस करने जा रहा है. अमेरिका का यह नया रवैया यह साफ करता है कि वह अब यूरोप की सुरक्षा का सारा बोझ अपने कंधों पर उठाने के मूड में नहीं है.

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टोमाहॉक मिसाइलें और जर्मनी की सुरक्षा का बड़ा संकट

टोमाहॉक मिसाइलों का सौदा रद्द होना जर्मनी के लिए रक्षा के मोर्चे पर एकबड़ा शून्य पैदा कर देगा. टोमाहॉक एक ऐसी अत्याधुनिक और अत्यधिक सटीक मार करने वाली प्रेसिजन मिसाइल है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों को पलक झपकते ही तबाह करने की क्षमता रखती है.

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही जर्मनी और पूरे पूर्वी यूरोप में इस बात को लेकर गहरा डर व्याप्त है कि यदि रूस ने अपनी सीमाओं का और विस्तार करने की कोशिश की, तो उनके पास मॉस्को को रोकने के लिए कोई दीर्घकालिक और आक्रामक पारंपरिक हथियार प्रणाली मौजूद नहीं है. 

जर्मनी के चांसलर और सैन्य जनरलों का मानना था कि अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइलों की तैनाती से वे रूस के खिलाफ एक मजबूत डिटरेंट बना पाएंगे, जिससे रूस जर्मनी या किसी अन्य नाटो देश पर आंख उठाने की हिम्मत नहीं करेगा. अब यदि यह सौदा आधिकारिक तौर पर रद्द हो जाता है, तो बर्लिन के पास अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए बहुत कम और सीमित विकल्प बचेंगे.

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यूरोपीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों के पास फिलहाल अपनी ऐसी कोई घरेलू तकनीक या मिसाइल प्रणाली तैयार नहीं है जो अमेरिकी टोमाहॉक की जगह ले सके. इस तकनीक को विकसित करने और उसे सेना में शामिल करने में कई साल और संभवतः दशक लग सकते हैं, जबकि रूस का खतरा उनके दरवाजे पर आज ही मंडरा रहा है. 

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इस फैसले के बाद जर्मनी के भीतर भी इस बात को लेकर बहस तेज हो गई है कि क्या देश को अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से आत्मनिर्भर होना पड़ेगा. क्या अब उसे अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा करना बंद कर देना चाहिए.

मॉस्को की जवाबी कार्रवाई का डर और वॉशिंगटन की नई कूटनीति

पेंटागन के भीतर इस मिसाइल सौदे को लेकर जो सबसे बड़ा तर्क दिया जा रहा है, वह है रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित प्रतिक्रिया का डर. अमेरिकी रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मध्य यूरोप में अमेरिकी मिसाइलों की मौजूदगी को रूस अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधे और तात्कालिक खतरे के रूप में परिभाषित करेगा. 

रूस पहले ही कई बार चेतावनी दे चुका है कि यदि नाटो देश उसकी सीमाओं के करीब अपनी आक्रामक मारक क्षमता का विस्तार करते हैं, तो वह अपनी परमाणु और पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों को यूरोप के प्रमुख शहरों की तरफ मोड़ने के लिए मजबूर होगा. ट्रंप प्रशासन के तहत वॉशिंगटन की नई कूटनीति इस समय रूस के साथ किसी भी तरह के सीधे सैन्य टकराव को टालने और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी सैन्य भागीदारी को सीमित करने की नीति पर चल रही है.

इस नीति के समर्थकों का कहना है कि अमेरिका को उन समझौतों से पीछे हट जाना चाहिए जो उसे किसी तीसरे देश के कारण युद्ध की आग में झोंक सकते हैं. लेकिन इस कूटनीति की वजह से नाटो के भीतर अमेरिका की विश्वसनीयता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लग गया है. 

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यदि अमेरिका अपने सबसे बड़े और आर्थिक रूप से समृद्ध सहयोगी जर्मनी से किए गए वादों को रूस के डर से या अपनी नई प्राथमिकताओं के कारण तोड़ सकता है, तो पोलैंड, लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया जैसे छोटे और अधिक संवेदनशील देशों की सुरक्षा का क्या होगा, जो सीधे तौर पर रूसी सीमा से सटे हुए हैं? 

कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा आम हो गई है कि अमेरिका के इस कदम से नाटो की सामूहिक रक्षा की मूल भावना- एक पर हमला, सब पर हमला कमजोर पड़ जाएगी. रूस को यूरोपीय मामलों में अधिक आक्रामक रुख अपनाने का मौका मिल जाएगा.

यूरोप के लिए एक नए और आत्मनिर्भर युग की शुरुआत

पेंटागन की इस संभावित योजना ने यूरोप को एक बेहद कठिन चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. पिछले कई दशकों से यूरोप ने अपनी आर्थिक समृद्धि पर पूरा ध्यान केंद्रित किया और अपनी रक्षा का पूरा जिम्मा अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो के भरोसे छोड़ दिया. लेकिन अब, जब अमेरिका खुद अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को बदल रहा है और रूस के डर से मिसाइल समझौतों को रद्द करने की कगार पर है, तब यूरोप के पास अपनी नींद से जागने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है. 

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जर्मनी को अब न केवल अपनी रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी करनी होगी, बल्कि फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों के साथ मिलकर एक स्वतंत्र और मजबूत यूरोपीय रक्षा ढांचे का निर्माण करना होगा. 

यह घटनाक्रम इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और सैन्य साझेदारियों के समीकरण पूरी तरह बदलने वाले हैं. अमेरिका अब दुनिया का इकलौता वैश्विक पुलिसकर्मी बनने की भूमिका से पीछे हट रहा है. वह अपने सहयोगियों को यह संदेश दे रहा है कि अपनी जंग उन्हें खुद ही लड़नी होगी. 

जर्मनी के लिए टोमाहॉक मिसाइल डील का रद्द होना महज एक हथियार सौदे का टूटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का आधिकारिक ऐलान है कि ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा की पुरानी और सुनहरी कड़ियां अब हमेशा के लिए कमजोर हो चुकी हैं. यूरोप को अब अपनी सुरक्षा की कहानी अपने दम पर ही लिखनी होगी.

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