उन्नाव रेप केसः गवाहों की एक-एक कर मौत, इत्तेफाक या साजिश?

ये पुराने दौर की किसी हिंदी फिल्म जैसा है. जिसकी कहानी की ज़मीन कोई गांव हो. गांव में कोई ज़मीनदार, नेता या दबंग हो. उसकी किसी से दिुश्मनी हो. फिर वो दुश्मन से कैसे-कैसे और किस हद तक जाकर बदला लेता है.

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इस मामले को लेकर संसद में भी हंगामा हो रहा है इस मामले को लेकर संसद में भी हंगामा हो रहा है

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 30 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 1:07 PM IST

यूपी में सत्ताधारी दल के एक ताकतवर विधायक पर दो साल पहले रेप का मुकदमा दर्ज होता है. विधायक को जेल भेज दिया जाता है. दो साल से विधायक जेल मे हीं बंद है और मुकदमे की कार्रवाई अदालत में जारी. इस दौरान पीड़ित लड़की के पिता को विधायक का भाई इतना पीटता है कि वो मर जाता है. रेप केस के एक अहम गवाह की रहस्यमयी हालत में मौत हो जाती है.

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अब केस में तीन और गवाह बचे थे. खुद पीड़ित लड़की, उसकी चाची और मौसी. रविवार को एक सड़क हादसे में चाची और मौसी की भी मौत हो जाती है. जबकि खुद पीड़ित लड़की और उसके वकील नाजुक हालत में अस्पताल में हैं. अब सवाल ये है कि केस से जुड़े लोगों की एक-एक कर हो रही ये मौत इत्तेफाक है या फिर कोई साजिश?

17 साल की एक लड़की सत्ताधारी विधायक पर रेप का इल्ज़ाम लगाती है. इलज़ाम लगाते ही ल़ड़की रहस्यमयी तौर पर ग़ायब हो जाती है. लड़की की मां पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने जाती है. लड़की हैरतअंगेज तौर पर वापस आ जाती है. तभी लड़की के पिता को विधायक का भाई और उसके गुर्गे बुरी तरह पीटते हैं.

पुलिस लड़की के पिता को ही गिरफ्तार करके जेल भेज देती है. शरीर पर 14 गंभीर जख्म के चलते दो दिन बाद ही पिता की जेल में मौत हो जाती है. लड़की के घर वाले फिर पुलिस के पास विधायक और उसके भाई के खिलाफ मुकदमा लिखवाने पहुंचते हैं. पर पुलिस नहीं सुनती. इस बीच लड़की के साथ रेप के मामले में एक अहम चश्मदीद की गांव में रहस्यमयी तौर पर मौत हो जाती है.

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आखिर में लड़की इंसाफ के लिए लखनऊ पहुंचती है. मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह करने की कोशिश करती है. मामला मीडिया में आता है. मुख्यमंत्री सीबीआई जांच का आदेश देते हैं. विधायक, उसका भाई और गुर्गे पकड़े जाते हैं. विधायक पर रेप का मुकदमा दर्ज कर सीबीआई उसे जेल भेज देती है.

मुकदमा शुरू हो जाता है. अब रेप मामले में लड़की और उसकी दो चाची अहम गवाह के तौर पर विधायक के खिलाफ ज़िंदा सबूत बचे थे. तीनों अहम गवाह एक कार में एक साथ जा रहे थे. तभी एक ट्रक उनकी कार को टक्कर मारता है. लड़की की दोनों महिला रिश्तेदारों की मौत हो जाती है. जबकि लड़की और उसका वकील फिलहाल अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं.

पुराने दौर की हिंदी फिल्मों को याद कीजिए. जिसकी कहानी की ज़मीन कोई गांव हो. गांव में कोई ज़मीनदार, नेता या दबंग हो. उसकी किसी से दिुश्मनी हो. फिर वो दुश्मन से कैसे-कैसे और किस हद तक जाकर बदला लेता है. आंखों के सामने वो सारे सीन घूम जाएंगे. पर ये कहानी फिल्मी पर्दे के बाहर की है. और बिल्कुल सच भी. लिहाज़ा इस कहानी में अब तक जो-जो घटता रहा है वो सब सिर्फ इत्तेफाक हो यकीन करना मुश्किल हो जाता है.

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फिर इत्तेफाक भी कैसे-कैसे? पहले एक-एक कर गवाह की मौत. फिर पुलिस सुरक्षा मिलने के बावजूद हादसे के वक्त पुलिस की गैर-मौजूदगी. पुलिस की दलील ये कि कार में पुलिस वालों के बैठने के लिए जगह ही नहीं थी. जिस ट्रक ने गवाहों के कार को उड़ाया उसके नंबर प्लेट पर कालिख का पुता होना. हादसे के बाद ड्राइवर का मौके से भाग जाना. फिर हैरतअंगेज तौर पर कुछ देर बाद उसका गिरफ्तार हो जाना.

इसमें कोई शक नहीं कि सड़क पर हादसा कभी भी किसी के भी साथ हो सकता है. बहुत मुमकिन है, ये हादसा भी हादसा ही हो. लेकिन जिस कहानी में शुरू से ही इतने मोड़ हों. पुलिस, मुल्जिम, इलज़ामों, धमकियों, सबूतों और गवाहों के पल-पल बदलते चेहरे और साज़िशों का ताना-बाना हो, वहां शक पैदा होना लाज़िमी है. और कायदे से इस हादसे को लेकर सबसे ज्यादा शक पुलिस को करना चाहिए. पर सवाल ये है कि यूपी पुलिस इस हादसे को सचमुच शक की निगाह से देख भी रही है या नहीं?

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