एलॉन मस्क स्टारलिंक को लेकर भारत सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं इस बीच अमेरिकी श्रम विभाग की ओर से TCS, Infosys और Wipro जैसी 8 बड़ी कंपनियों पर (परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम- PERM) बैन लगाने की खबर आई है. सोशल मीडिया पर इन दोनों मामलों को 'अमेरिकी दबाव वाली राजनीति' से जोड़कर देखा जा रहा है.
हालांकि, गहराई से चीजों को देखें तो इन दोनों घटनाओं का आपस में कोई सीधा कूटनीतिक या नीतिगत संबंध नहीं है. इसे दबाव का जरिया मानने के बजाय दो अलग-अलग मामले एक समय सामने आना संयोग ज्यादा है.
दरअसल, अमेरिका का PERM बैन आंतरिक चुनावी और श्रम राजनीति से प्रेरित है. अमेरिकी श्रम विभाग और उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने यह फैसला ट्रंप प्रशासन की अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत लिया गया है. उन्होंने ने स्पष्ट कहा है कि यह कदम अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियों की रक्षा और घरेलू वेतन दरों को गिरने से रोकने के लिए है. यह बैन केवल भारतीय कंपनियों पर नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनी Microsoft और Adobe पर भी लागू हुआ है.
भले ही मस्क ट्रंप प्रशासन के करीबी हैं, लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्रालय या श्रम विभाग किसी एक उद्योगपति के व्यापारिक प्रोजेक्ट के लिए अपनी ही घरेलू टेक कंपनियों और विश्वविद्यालयों को संकट में डालने वाली नीति नहीं बनाएगा.
स्टारलिंक विवाद भारत का आंतरिक और सुरक्षा संबंधी मामला है, स्टारलिंक की भारत में एंट्री पर विवाद किसी भू-राजनीतिक दबाव का नतीजा नहीं है. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि लाइसेंसिंग प्रक्रिया सभी कंपनियों (जियो, एयरटेल, स्टारलिंक) के लिए समान और गैर-भेदभावपूर्ण है.
दोनों घटनाओं का एक ही समय पर होना केवल एक संयोग है. अमेरिकी श्रम विभाग का कहना है कि यह जांच इस बात की हो रही है कि कहीं कंपनियां PERM के ज़रिए कम वेतन वाले विदेशी पेशेवरों को लाकर अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों और उनके वेतन को प्रभावित तो नहीं कर रही हैं.
अमेरिकी कंपनियों का भी भारी नुकसान
इस बैन का सीधा असर खुद अमेरिका के बड़े कॉर्पोरेट सेक्टर जैसे Microsoft, Adobe और वहां की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज पर भी पड़ रहा है. मस्क के दबाव बनाने के लिए अमेरिकी प्रशासन अपनी ही टॉप-टियर टेक कंपनियों और शोध संस्थानों को संकट में नहीं डालेगा.
चूंकि दोनों घटनाएं एक ही समय पर सुर्खियों में आई हैं, इसलिए यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि यह भारत पर मस्क की शर्तों को मनवाने का अप्रत्यक्ष कूटनीतिक दबाव है.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खासकर माइक्रोसॉफ्ट पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि कंपनी ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, जबकि उसी दौरान वह विदेशी कर्मचारियों के लिए हजारों H-1B वीजा और PERM आवेदनों को मंजूरी दिला रही थी. प्रशासन ने इसे व्यवस्था का दुरुपयोग और स्थानीय अमेरिकी कामगारों को नौकरी के बाजार से बाहर रखने का प्रयास माना है.
यह फैसला मुख्य रूप से विदेशी कर्मचारियों के वीजा और ग्रीन कार्ड नियमों के दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों की सुरक्षा के लिए लिया गया है. PERM वह पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके जरिए अमेरिकी कंपनियां अपने विदेशी कर्मचारियों (H-1B वीजा धारक) को स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए आवेदन करती हैं. हालांकि, इस कार्रवाई से कर्मचारियों के मौजूदा वैध H-1B वीजा या पहले से मिल चुके ग्रीन कार्ड तुरंत रद्द नहीं होंगे, लेकिन भविष्य में ग्रीन कार्ड मिलने का रास्ता पूरी तरह ठप हो जाएगा.
चूंकि अमेरिकी टेक सेक्टर में काम करने वाले और H-1B वीजा या एंप्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड का लाभ उठाने वाले लोगों में 70% से अधिक हिस्सेदारी भारतीय इंजीनियरों की है, इसलिए इस फैसले का सबसे बड़ा झटका वहां काम कर रहे हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों को लगेगा.
शेयर बाजार के लिए सीमित झटका
शेयर बाजार ने इस खबर को बहुत बड़े संकट के रूप में नहीं देखा, क्योंकि यह निलंबन H-1B वर्क वीजा या कंपनियों के चालू व्यावसायिक राजस्व को सीधे प्रभावित नहीं करता. हालांकि निवेशकों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि PERM निलंबन से अमेरिकी जांच और नियामक सख्ती बढ़ सकती है, जिससे आने वाले समय में कंपनियों के मार्जिन और प्रोजेक्ट डिलीवरी लागत में बढ़ोतरी हो सकती है.
इस निलंबन से कंपनियों के मौजूदा H-1B या L-1 वीजा रद्द नहीं होते हैं. कर्मचारी अपनी वर्तमान कार्य सीमा तक अमेरिका में काम करना जारी रख सकते हैं. TCS और अन्य आईटी कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि इस प्रशासनिक जांच का उनकी दैनिक व्यावसायिक गतिविधियों, नई नियुक्तियों या अमेरिका में ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. H-1B एक अस्थायी कार्य वीजा है, जो पेशेवरों को अमेरिका में 3 से 6 साल तक काम करने की अनुमति देता है.
बता दें, PERM ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के तहत नियोक्ता अमेरिकी श्रम विभाग से प्रमाणित करता है कि इस पद के लिए कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं है. सरल शब्दों में कहें तो H-1B आपको अमेरिका में कानूनी रूप से काम करने का अस्थायी अधिकार देता है, जबकि PERM आपको अमेरिका का स्थायी नागरिक बनाने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रमाण पत्र है.
आजतक बिजनेस डेस्क