स्मार्ट सिटी से भी आगे निकल रही है दुनिया, बनेंगे इंसानों का दर्द समझने वाले शहर!

हम अब तक जिन 'स्मार्ट शहरों' की बात करते थे, दुनिया अब उनसे एक कदम आगे बढ़ चुकी है, सिर्फ कैमरे, इंटरनेट और कंक्रीट की इमारतें बना देना ही काफी नहीं है असली शहर वही है जो उसमें रहने वाले लोगों की तकलीफ समझे.

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स्मार्ट सिटी और संवेदनशील शहर में क्या अंतर? (Photo-Pexels) स्मार्ट सिटी और संवेदनशील शहर में क्या अंतर? (Photo-Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 29 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:58 PM IST

साल 2016 की बात है, सरकार ने ऐसे शहरों के ज़रिए जीवन की गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से 'स्मार्ट सिटीज मिशन' की घोषणा की थी, जो आर्थिक रूप से समृद्ध, समावेशी और पर्यावरण के अनुकूल हों. दस साल बाद 1.64 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है और कुल 8,067 परियोजनाओं में से 94 प्रतिशत पूरी हो चुकी हैं, लेकिन इस बीच के दशक में दुनिया भी आगे बढ़ चुकी है. इस बार ऐसे शहरों की ओर, जो न केवल बेहतर हैं बल्कि उनमें रहने वाले लोगों के प्रति संवेदनशील भी हैं, जिन्हें संवेदनशील शहर कहा जाता है.

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प्रोफेसर केंट लार्सन का मानना है कि सिर्फ तकनीकों और कंप्यूटरों से लैस 'स्मार्ट शहर' ही काफी नहीं हैं. उन्होंने पुरानी व्यवस्था की इस कमी को पहचाना कि उसमें नीतियां ऊपर से थोपी जाती थीं और केवल तकनीक पर ध्यान दिया जाता था, आम लोगों की ज़रूरतों पर नहीं. इसलिए उन्होंने 'सेंटीएंट सिटीज़' का विचार दिया. ये ऐसे शहर हैं जो इंसानों की रोजमर्रा की ज़रूरतों, उनकी भलाई और उनके व्यवहार को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, ताकि शहर में रहने वाले लोगों का जीवन बेहतर, सुरक्षित और आसान बन सके.

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मानव-प्रतिक्रियाशील शहरीकरण क्या है?

'वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट 2027' की एक रिपोर्ट के अनुसार, मानव-प्रतिक्रियाशील शहरीकरण के सिद्धांत पर आधारित 'सेंटीएंट सिटीज़' शहर के नियोजन के केंद्र में निवासियों के अनुभवों, भलाई और जरूरतों को रखते हैं. मानव-प्रतिक्रियाशील शहर निवासियों को केवल आर्थिक बुनियादी ढांचे और प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय "सामाजिक, सांस्कृतिक और निर्मित वातावरण को आकार देने में सक्रिय भागीदार के रूप में देखते हैं.

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यह सोच सिर्फ तकनीक पर ध्यान नहीं देती, बल्कि हर नागरिक की सुविधा, सुरक्षा और सेहत का पूरा ख्याल रखती है, इसका मकसद एक ऐसा शहर बनाना है, जहां हर किसी को बराबरी से मौके और संसाधन मिलें. WGS (वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट) के मुताबिक, 'सेंटीएंट' या संवेदनशील शहर इंसानों की ज़रूरतों को समझते हैं और उनके हिसाब से ढल जाते हैं. यानी ये शहर सिर्फ हाई-टेक नहीं होते, बल्कि रहने में बेहद आरामदायक, सुरक्षित और सबको साथ लेकर चलने वाले होते हैं.

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मौसम और जलवायु में आ रहे तेजी से बदलावों के कारण आज शहरों को संभालना काफी मुश्किल हो गया है. इसलिए, भविष्य की चुनौतियों को पहले से ही भांपना बहुत जरूरी हो गया है. इसी काम में 'अर्बन साइंस' हमारी मदद करता है. यह एक ऐसा तरीका है जो बिग डेटा, AI और पर्यावरण से जुड़ी जानकारियों को एक साथ जोड़ता है. इसकी मदद से शहर सिर्फ कंक्रीट और सीमेंट के बेजान ढांचे नहीं रहते, बल्कि समय और ज़रूरत के हिसाब से खुद को बदलने वाले एक जीवंत सिस्टम बन जाते हैं.

अर्बन साइंस के उपयोग के कुछ उल्लेखनीय उदाहरण भी हैं जो कई प्रणालियों को मिलाते हैं, उदाहरण के लिए, सिंगापुर का 'फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम' अचानक आने वाली बाढ़ का पूर्वाभास करने के लिए वर्षा रडार, जल निकासी सेंसर और पूर्वानुमानित हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग को एकीकृत करता है. इसके अलावा लॉस एंजिल्स है जो भूकंपीय गतिविधि का पता लगाने के लिए मशीन लर्निंग का उपयोग करता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सियोल, टोक्यो और बार्सिलोना जैसे शहरों में अत्यधिक गर्मी, वायु प्रदूषण या खतरनाक औद्योगिक उत्सर्जन को प्रबंधित करने के लिए भी इसी तरह के दृष्टिकोण का उपयोग किया जाता है.

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