गुजरात में रेंट बिल पर बवाल, हड़ताल पर वकील, विरोध में निकाली बाइक रैली

वकील संगठनों का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल वकीलों के हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि किरायेदारों और मकान मालिकों से जुड़े विवादों में न्यायिक सुनवाई की भूमिका बनाए रखने को लेकर भी है.

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गुजरात में किराया कानून बदलने पर विरोध (Photo-ITG) गुजरात में किराया कानून बदलने पर विरोध (Photo-ITG)

अतुल तिवारी

  • नई दिल्ली ,
  • 05 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:34 PM IST

गुजरात किराया विधेयक-2026 को लेकर राज्य में वकीलों का विरोध तेज हो गया है. राज्य के अलग-अलग बार एसोसिएशन इस विधेयक के विरोध में कोर्ट की कार्यवाही से दूर रहने का ऐलान कर चुके हैं. गुजरात बार काउंसिल ने भी राज्यभर में वकीलों से न्यायिक कार्य से दूर रहने की अपील की है. वकीलों का मुख्य विरोध किराये से जुड़े विवादों की सुनवाई और निपटारे के अधिकार को न्यायिक अदालतों से हटाकर राजस्व प्रशासन के अधिकारियों को देने के प्रस्ताव को लेकर है. गुजरात विधानसभा ने यह विधेयक 11 सितंबर 2026 को पारित किया था.

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गुजरात किराया विधेयक-2026 राज्य में किराये से जुड़े पुराने कानूनी ढांचे को बदलने के लिए लाया गया है. यह कानून मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंधों को नए तरीके से विनियमित करने का प्रावधान करता है. इसके तहत किराये का लिखित समझौता जरूरी, सिक्योरिटी डिपोजिट को अधिकतम तीन महीने के किराये तक सीमित करने और किराया विवादों के निपटारे के लिए रेंट अथॉरिटी, रेंट कोर्ट और Rent Tribunal जैसी तीन स्तरीय व्यवस्था बनाने का प्रावधान है. इसका उद्देश्य किरायेदार और मकान मालिक दोनों के अधिकारों को स्पष्ट करना और किराये से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए एक अलग व्यवस्था तैयार करना है.

वकीलों को किस प्रावधान पर आपत्ति?

वकीलों का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि किराये से जुड़े विवादों की सुनवाई में न्यायपालिका की भूमिका कम हो जाएगी और प्रशासनिक अधिकारियों को महत्वपूर्ण अधिकार मिल जाएंगे. प्रस्तावित व्यवस्था में किराये से जुड़े विवादों पर डिप्टी कलेक्टर और एडिशनल कलेक्टर स्तर के अधिकारी सुनवाई और फैसला कर सकेंगे. वकीलों का कहना है कि इससे न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका प्रभावित हो सकती है और पहले से प्रशासनिक काम के बोझ से दबे अधिकारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आने से मामलों के निपटारे में देरी की आशंका है.

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वकीलों के मुताबिक, अब तक किराये से जुड़े कई विवादों की सुनवाई स्मॉल कॉज कोर्ट और संबंधित सिविल कोर्ट में होती थी. नए विधेयक के तहत अलग रेंट अथॉरिटी और रेंट कोर्ट की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है. वकीलों का सवाल है कि जब किरायेदार और मकान मालिक के विवादों के लिए न्यायिक व्यवस्था पहले से मौजूद है, तो इन मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों को अधिकार देने की जरूरत क्यों है, हालांकि, सरकार की ओर से विधेयक का उद्देश्य पुराने किराया कानून की जगह एक आधुनिक और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना बताया गया है.

वकीलों का दावा है कि नए सिस्टम में आम लोगों को अपने किराया विवाद के समाधान के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के सामने जाना पड़ सकता है, उनका कहना है कि अधिकारियों के पास पहले से बड़ी संख्या में प्रशासनिक जिम्मेदारियां हैं, इसलिए किरायेदारों और मकान मालिकों के मामलों की सुनवाई में देरी हो सकती है.

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