टाटा सन्स (TATA Sons) का आईपीओ शेयर मार्केट में लिस्ट कराया जाए या कंपनी का ढांचा ही बदल दिया जाए? देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक टाटा ग्रुप (TATA Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स में इन दिनों यही बड़ा सवाल बना हुआ है. एक तरफ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के चलते कंपनी पर शेयर मार्केट में खुद को लिस्ट कराने का दबाव बढ़ा है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स (TATA Trusts) के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) इसके पक्ष में नहीं हैं.
इसी बीच टाटा सन्स के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन (N Chandrasekaran) को पांच साल के लिए फिर चेयरमैन बनाने का फैसला भी कर लिया है, जिसका नोएल टाटा ने विरोध किया है. अब टाटा सन्स की शेयर मार्केट में लिस्टिंग के साथ-साथ उसे कई हिस्सों में बांटने यानी रीस्ट्रक्चरिंग का विकल्प भी चर्चा में है.
टाटा सन्स में आखिर चल क्या रहा है?
पूरे मामले को आसान भाषा में समझें तो टाटा सन्स के सामने अभी दो बड़े सवाल हैं. पहला- क्या कंपनी को शेयर बाजार में उतारा जाए? दूसरा- अगर लिस्टिंग नहीं करनी है तो RBI के नियमों का पालन किस दूसरे तरीके से किया जाए? RBI ने टाटा सन्स को अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (NBFC) की कैटेगरी में रखा है. ऐसे मामलों में लिस्टिंग से जुड़े नियम लागू होते हैं.
टाटा सन्स ने इससे बचने के लिए अपनी कोर इंवेस्टमेंट कंपनी (CIC) का सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन (CoR) बदलने का रास्ता तलाशा था. लेकिन 11 सितंबर 2026 को RBI ने टाटा सन्स की इस मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद कंपनी के लिए आईपीओ लाकर शेयर मार्केट में लिस्ट होने का रास्ता और महत्वपूर्ण हो गया है.
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बोर्ड ने लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाया
टाटा सन्स के बोर्ड की 17 सितंबर को बैठक हुई. इसमें बोर्ड ने शेयर मार्केट में लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया. रिपोर्टस के मुताबिक, कंपनी ने RBI के नियमों का पालन करने और लिस्टिंग से जुड़े कदमों पर आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. अंदरूनी तौर पर फरवरी 2027 के आसपास संभावित लिस्टिंग का टारगेट भी रखा गया है. हालांकि इसे टाटा सन्स के IPO की अंतिम तारीख नहीं माना जाना चाहिए. यहीं से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा सन्स के बीच मतभेद खुलकर सामने आया. टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि उसने लिस्टिंग को मंजूरी नहीं दी है और सभी विकल्पों पर विचार होना बाकी है. ट्रस्ट्स की पुरानी स्थिति रही है कि टाटा सन्स को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए.
नोएल टाटा लिस्टिंग के पक्ष में क्यों नहीं?
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा का तर्क है कि RBI के निर्देश के बाद भी शेयर बाजार में लिस्टिंग ही एकमात्र रास्ता नहीं है. उनका पक्ष है कि कंपनी दूसरे विकल्प तलाश सकती है और RBI के साथ इस मामले पर आगे बातचीत की जा सकती है. इसी संदर्भ में टाटा सन्स को कई अलग-अलग कंपनियों या इकाइयों में बांटने का सुझाव सामने आया है. यानी जिस कंपनी के अंदर टाटा ग्रुप की इतनी बड़ी होल्डिंग्स हैं, उसके पूरे ढांचे को ही इस तरह बदला जाए कि RBI के नियमों का पालन किया जा सके और टाटा सन्स को सीधे शेयर बाजार में उतारने की जरूरत न पड़े. यह फिलहाल एक प्रस्तावित विकल्प है, अंतिम फैसला नहीं.
बड़ी कंपनी के 'स्प्लिट' का क्या मतलब?
इसे आम भाषा में ऐसे समझिए. टाटा सन्स आज एक बड़ी होल्डिंग कंपनी है, जिसके पास टाटा ग्रुप की कई कंपनियों में हिस्सेदारी है. अगर इसे स्प्लिट या रीस्ट्रक्चर किया जाता है, तो इन कारोबारों और संपत्तियों को अलग-अलग इकाइयों में बांटने, कुछ कंपनियों को मर्ज करने या संपत्तियों को दूसरी इकाइयों में ट्रांसफर करने जैसे विकल्पों पर काम करना पड़ सकता है. लेकिन यह आसान प्रक्रिया नहीं होगी. इतने बड़े कारोबारी ढांचे को बदलने में कंपनी लॉ, टैक्स, रेगुलेटरी मंजूरी और शेयरहोल्डिंग से जुड़े कई सवाल सामने आ सकते हैं. इसलिए स्प्लिट को अभी सिर्फ एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
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बैठक में चंद्रशेखरन पर हुआ बड़ा फैसला
टाटा सन्स के बोर्ड की 17 सितंबर को हुई बैठक में सिर्फ कंपनी की लिस्टिंग पर आगे बढ़ने का ही फैसला नहीं हुआ. एन. चंद्रशेखरन को टाटा सन्स के कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर अगले पांच साल के लिए फिर नियुक्त करने का प्रस्ताव भी आया.
बोर्ड ने इस प्रस्ताव को 4-1 के बहुमत से मंजूरी दी. अकेले नोएल टाटा ने एन. चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल देने का विरोध किया. चंद्रशेखरन ने इससे पहले 12 अगस्त, 2026 को मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दूसरा कार्यकाल नहीं लेने की बात कही थी. बाद में बोर्ड ने उनसे दोबारा पद पर बने रहने का आग्रह किया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया.
नोएल टाटा ने फैसले को बताया अमान्य
यहीं से विवाद और गंभीर हो गया. टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा सन्स के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) यानी कंपनी के आंतरिक नियमों के तहत ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की जरूरी मंजूरी के बिना ऐसा फैसला वैध नहीं माना जा सकता. नोएल टाटा ने वोटिंग में इसका विरोध किया और टाटा ट्रस्ट्स ने बाद में बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया. ट्रस्ट्स का दावा है कि सिर्फ बोर्ड की साधारण बहुमत वाली वोटिंग से इस शर्त को दरकिनार नहीं किया जा सकता. दूसरी ओर टाटा सन्स की ओर से इस प्रक्रिया की अलग कानूनी व्याख्या सामने आई है. इसलिए फिलहाल इसे कानूनी और कॉरपोरेट गवर्नेंस का विवाद कहना ज्यादा सही है.
टाटा सन्स के पास बहुत बड़ा कारोबार
टाटा सन्स को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह टाटा ग्रुप की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है. इसके पोर्टफोलियो में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा कैपिटल, टाटा कम्युनिकेशंस, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, एअर इंडिया, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और टाटा डिजिटल जैसी कंपनियां शामिल हैं. यानी टाटा सन्स की लिस्टिंग सिर्फ एक कंपनी के IPO की बात नहीं है. इसके जरिए टाटा ग्रुप की इतनी बड़ी संपत्तियों और कारोबार की होल्डिंग कंपनी सीधे शेयर बाजार के दायरे में आ सकती है.
शापूरजी पालोनजी ग्रुप का रुख क्या है?
इस पूरे मामले में शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप भी अहम हिस्सेदार है. उसके पास टाटा सन्स की करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है और वह लंबे समय से अपनी हिस्सेदारी से कुछ पैसा निकालने यानी मोनेटाइजेशन की मांग करता रहा है. SP ग्रुप लिस्टिंग का समर्थन करता है. उसके लिए टाटा सन्स की लिस्टिंग का मतलब अपनी हिस्सेदारी के लिए एक ज्यादा स्पष्ट मार्केट वैल्यू और भविष्य में हिस्सेदारी से बाहर निकलने का आसान रास्ता भी हो सकता है.
इस मामले में आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल टाटा सन्स के सामने लिस्टिंग की दिशा में बढ़ने और दूसरे विकल्प तलाशने के बीच रास्ता चुनने का सवाल है. बोर्ड लिस्टिंग की तैयारी की दिशा में कदम बढ़ा चुका है, जबकि नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट्स दूसरे विकल्पों पर विचार चाहते हैं. इसीलिए कंपनी को स्प्लिट करने का सुझाव महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर यह रास्ता आगे बढ़ता है तो टाटा सन्स के मौजूदा ढांचे में बड़ा बदलाव हो सकता है. लेकिन अभी यह सिर्फ चर्चा और अध्ययन के स्तर पर है.
दूसरी तरफ चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर भी टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं. आने वाले समय में दो चीजें खास तौर पर देखने वाली होंगी- टाटा सन्स RBI के लिस्टिंग नियमों का पालन किस तरीके से करता है और चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर उठे वैधता के सवाल किस तरह आगे बढ़ते हैं. इन दोनों मुद्दों का असर सिर्फ टाटा सन्स पर नहीं, बल्कि पूरे टाटा ग्रुप के कॉरपोरेट ढांचे और गवर्नेंस पर पड़ सकता है.
आजतक बिजनेस डेस्क