बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत को 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद बिहार की सबसे अहम राजनीतिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है. हालांकि इससे बीजेपी को तुरंत झटका लगा है क्योंकि उसने दशकों से अपना गढ़ रही एक सीट गंवा दी है, लेकिन इस नतीजे का बिहार की विपक्षी राजनीति पर भी उतना ही अहम असर पड़ सकता है. इस जीत ने एक ऐसी नई राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है जिसमें तेजस्वी यादव अब विपक्ष के अकेले प्रमुख नेता नहीं रह गए हैं.
कई वर्षों से तेजस्वी यादव बिहार में विपक्ष का मुख्य चेहरा रहे हैं. जब भी बिहार में एनडीए सरकार को राजनीतिक रूप से चुनौती मिली तो फोकस मुख्य रूप से आरजेडी पर ही रहा.
प्रशांत किशोर के एक चुने हुए विधायक के तौर पर बिहार विधानसभा में आने से विपक्ष के बीच मुकाबला और कड़ा हो गया है. अब बिहार को विपक्ष का एक और हाई-प्रोफाइल नेता मिल गया है, जिन्हें विधानसभा के अंदर सरकार से सवाल पूछने और एक वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव पेश करने का मौका मिलेगा.
अलग प्रोफाइल, अलग राजनीतिक सफर
बांकीपुर का नतीजा इसलिए भी अहम है क्योंकि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद दोनों नेताओं का राजनीतिक सफर अलग-अलग रहा. हालांकि प्रशांत किशोर को उस चुनाव में उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली, फिर भी वे राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे. पिछले कुछ सालों में उन्होंने पूरे बिहार का दौरा किया, पदयात्राएं कीं, जनसभाओं को संबोधित किया और जन सुराज पार्टी के संगठन को बढ़ाने पर काम किया.
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चुनाव के बाद लोगों से जुड़ना कम करने के बजाय, वे अलग-अलग जिलों में लोगों से मिलते रहे और जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया. उनके समर्थकों का मानना है कि लोगों तक लगातार पहुंचने की इसी कोशिश ने बांकीपुर में उनकी जीत की नींव रखी.
विदेश यात्रा पर थे तेजस्वी
बांकीपुर उपचुनाव के दौरान प्रचार में राजनीतिक गतिविधियों का अंतर भी साफ दिखा. चुनाव प्रचार के एक बड़े हिस्से के दौरान तेजस्वी यादव लगभग तीन हफ़्ते की विदेश यात्रा पर थे. वे प्रचार के आखिरी चरण में ही लौटे और RJD उम्मीदवार रेखा गुप्ता के समर्थन में रोड शो किए.
हालांकि चुनाव के नतीजे RJD के लिए निराशाजनक रहे. रेखा गुप्ता न सिर्फ़ आगे चल रहे उम्मीदवारों से पीछे रहीं, बल्कि उनकी जमानत भी जब्त हो गई. यह 2025 के विधानसभा चुनाव की तुलना में बड़ी गिरावट थी, जब उन्होंने इसी सीट से दूसरा स्थान हासिल किया था.
गवर्नेंस और पॉलिसी पर पीके की मास्टरी
बांकीपुर के फैसले ने RJD के लिए नए राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं. जो पार्टी कभी बिहार में NDA की मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के तौर पर उभरी थी, उसे अब विपक्ष के भीतर ही मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है. विधानसभा में प्रशांत किशोर की मौजूदगी का मतलब है कि सरकार को अब एक और विपक्षी नेता से चुनौती मिलेगी, जिन्होंने अपना राजनीतिक अभियान गवर्नेंस, शिक्षा, रोज़गार, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित किया है. उनके भाषण आम तौर पर नीतिगत मुद्दों पर केंद्रित होते हैं और वे लोगों से बातचीत के दौरान राजनीतिक और गवर्नेंस से जुड़े मामलों को विस्तार से समझाने के लिए जाने जाते हैं.
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प्रशांत किशोर का एक चुने हुए विधायक के तौर पर सामने आने से विपक्ष के भीतर राजनीतिक अहमियत पाने की होड़ बढ़ सकती है. जहां तेजस्वी यादव RJD की अगुवाई कर रहे हैं, वहीं प्रशांत किशोर के पास अब विधानसभा के अंदर जन-मुद्दों को उठाने और सीधे सरकार को चुनौती देने का एक संवैधानिक मंच है. इससे बिहार में एक नई राजनीतिक स्थिति बन रही है, जहां विपक्ष के दो बड़े नेता भविष्य के चुनावों से पहले अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करेंगे.
विपक्ष का प्रतिनिधित्व कौन करेगा?
बांकीपुर उपचुनाव ने यह भी दिखाया है कि बिहार में चुनावी राजनीति में कॉम्पीटिशन बढ़ता जा रहा है. जिस सीट पर लंबे समय से बीजेपी का दबदबा था, वहां अब जन सुराज पार्टी के संस्थापक को चुना गया है. वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद RJD को निराशाजनक नतीजे मिले हैं. नतीजों से पता चलता है कि जब कोई मज़बूत विकल्प सामने आता है, तो शहरी सीटों पर वोटरों की पसंद तेज़ी से बदल सकती है.
यह देखना अभी बाकी है कि क्या प्रशांत किशोर इस जीत को पूरे बिहार में एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल पाते हैं या नहीं. इसी तरह तेजस्वी यादव भी एक मजबूत पार्टी संगठन के साथ राज्य के सबसे प्रभावशाली विपक्षी नेताओं में से एक बने हुए हैं. हालांकि बांकीपुर के नतीजों ने यह पक्का कर दिया है कि बिहार की विपक्षी राजनीति अब किसी एक चेहरे के इर्द-गिर्द नहीं सिमटी है. हाल के सालों में पहली बार तेजस्वी यादव को विपक्ष की जगह एक और बड़े नेता के साथ साझा करनी होगी जिन्होंने अब चुनावी वैधता और बिहार विधानसभा में एक सीट दोनों हासिल कर ली हैं.
बिहार के अगले चुनाव से पहले होने वाली राजनीतिक गतिविधियां यह दिखाएंगी कि यह नया समीकरण कैसे बनता है. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव से एक बात तो साफ़ हो गई है- प्रशांत किशोर की जीत सिर्फ़ बीजेपी के लिए ही झटका नहीं है; इसने बिहार के विपक्ष के भीतर सत्ता के संतुलन को भी बदल दिया है और राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक नई होड़ शुरू कर दी है.
रोहित कुमार सिंह