किसी स्कूल में जिले के DM पहुंच जाएं, तो आमतौर पर बच्चों और शिक्षकों के बीच हलचल मच जाती है. कोई रजिस्टर संभालने लगता है, कोई क्लासरूम की तरफ दौड़ता है, तो किसी के मन में यही सवाल आता है कि साहब आज क्या-क्या देखेंगे. लेकिन बिहार के कटिहार में एक स्कूल के बच्चों के लिए DM का दौरा कुछ अलग ही था.
डीएम जायजा लेने पहुंचे थे, मगर क्लास में पहुंचे तो बच्चों को पढ़ाया. फिर दोपहर के खाने का समय हुआ, तो बच्चों के बीच जमीन पर बैठकर खाना खाने लगे. खाना खत्म हुआ, तो थाली भी खुद धो डाली. बिहार में कटिहार के जिलाधिकारी आशुतोष द्विवेदी कोढ़ा प्रखंड के रौतारा मिडिल स्कूल के निरीक्षण पर पहुंचे थे. मगर उनके इस दौरे में सरकारी फाइलों और स्कूल की व्यवस्थाओं से आगे की एक तस्वीर भी दिखाई दी.
एक तरफ पढ़ाई का जायजा, दूसरी तरफ बच्चों के बीच बैठकर उन्हें अपने काम खुद करने का सबक. स्कूल के निरीक्षण के दौरान आशुतोष द्विवेदी दसवीं क्लास में पहुंचे. क्लास में बच्चों से बातचीत शुरू हुई. फिर बात फिजिक्स तक पहुंच गई. चैप्टर था 'ह्यूमन आई' यानी मानव आंख... इसी से जुड़ी रोशनी के प्रकारों पर सवाल पूछे.
अब क्लास में DM सामने हों, तो बच्चों के लिए यह रोज का पीरियड तो नहीं ही रहा होगा. लेकिन बच्चों ने भी सवालों के जवाब देने की कोशिश की. DM ने कुछ विद्यार्थियों को ब्लैकबोर्ड पर बुलाया. उनसे जवाब लिखवाए. बच्चों ने लिखकर, बोलकर और चित्र बनाकर अपनी समझ बताई.
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एक छात्रा ब्लैकबोर्ड पर चित्र बना रही थी. बाकी बच्चे भी सवाल-जवाब में शामिल थे. इस तरह निरीक्षण के दौरान क्लासरूम में पढ़ाई का माहौल बन गया. DM सिर्फ यह देखने नहीं आए थे कि स्कूल में पढ़ाई हो रही है या नहीं, बल्कि वह यह भी परख रहे थे कि बच्चे पढ़ाए गए विषय को कितना समझ पा रहे हैं.
निरीक्षण के बाद आशुतोष द्विवेदी ने बच्चों के जवाबों को लेकर अपनी राय भी दी. उन्होंने बताया कि करीब 80 फीसदी बच्चे सवालों के जवाब दे रहे थे. बाकी 20 फीसदी बच्चों के लिए उन्होंने रेमेडियल क्लास यानी अतिरिक्त कक्षाएं चलाने का निर्देश दिया.
इसका मकसद उन बच्चों पर अलग से ध्यान देना है, जिन्हें किसी विषय को समझने में ज्यादा मदद की जरूरत है. क्योंकि क्लास में कुछ बच्चों का जवाब दे देना ही काफी नहीं होता. यह भी देखना जरूरी है कि जो बच्चे पीछे रह रहे हैं, उन्हें आगे लाने के लिए क्या किया जा रहा है.
खाने की घंटी बजी, तो बच्चों के बीच पहुंच गए DM
क्लास में पढ़ाई चल ही रही थी कि स्कूल में मिड-डे मील यानी दोपहर के भोजन का समय हो गया. बच्चे खाना खाने के लिए बैठने लगे. अब तक DM साहब बच्चों से सवाल पूछ रहे थे. लेकिन खाने के वक्त उन्होंने बच्चों से दूरी बनाकर रखने के बजाय उनके बीच बैठना चुना. आशुतोष द्विवेदी स्कूल के बरामदे में पहुंचे और छात्र-छात्राओं के साथ जमीन पर बैठकर खाना खाने लगे.
आसपास बैठे बच्चों से बातचीत भी करते रहे. बच्चे भी उनसे बात करते हुए खाना खाते रहे. DM साहब ने खाने के बाद जो किया, उसने इस पूरे दौरे को एक और वजह से चर्चा में ला दिया. खाना खत्म हुआ. आशुतोष द्विवेदी ने अपनी थाली उठाई और पास में लगे नल की तरफ चल दिए. वहां उन्होंने अपनी थाली खुद धोई. किसी कर्मचारी से नहीं कहा. न ही इस काम को किसी दूसरे के जिम्मे छोड़ा.
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आशुतोष द्विवेदी ने कहा कि हर व्यक्ति को अपना काम खुद करना चाहिए. कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता. बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं, इसलिए बड़ों को अपने व्यवहार से भी उदाहरण पेश करना चाहिए. उनकी बात का सीधा मतलब था कि अगर बच्चे बचपन से ही अपने काम खुद करने की आदत डालें, तो उनमें आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. बच्चों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि अपने काम की जिम्मेदारी लेना किसी पद या हैसियत से छोटा नहीं होता.
और बात सिर्फ थाली धोने की नहीं है. घर हो या स्कूल, अपने आसपास के कामों को लेकर हमारी सोच कैसी है, यह भी बच्चों के सीखने का हिस्सा है. हम उन्हें आत्मनिर्भर बनने की सलाह तो दे सकते हैं, लेकिन जब वे हमें खुद अपने काम करते देखते हैं, तो उस सलाह का मतलब ज्यादा साफ होता है.
निरीक्षण में पढ़ाई भी, आत्मनिर्भरता का सबक भी
आशुतोष द्विवेदी इसके बाद स्कूल परिसर में बच्चों से मिले और उनसे बातचीत की. स्कूल के निरीक्षण के दौरान पढ़ाई के स्तर पर भी ध्यान दिया गया. दसवीं के विद्यार्थियों के जवाबों के आधार पर कमजोर बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं चलाने का निर्देश दिया गया.
रौतारा मिडिल स्कूल में उनके दौरे की तस्वीरों में एक अलग पहलू दिखाई दिया. वह क्लास में बच्चों से पढ़ाई के सवाल पूछते हैं, फिर उन्हीं के साथ बैठकर खाना खाते हैं और उसके बाद अपनी थाली भी खुद धोते हैं. इस पूरी कहानी में तीन बातें साथ-साथ चलती हैं. पहली, बच्चों की पढ़ाई का स्तर जानना. दूसरी, जिन बच्चों को मदद चाहिए, उनके लिए अतिरिक्त पढ़ाई की व्यवस्था करना. और तीसरी, अपने व्यवहार से बच्चों को यह बताना कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों से होती है.
शायद बच्चों को लंबे समय तक यही याद रहे कि उस दिन स्कूल में DM साहब आए थे. उन्होंने पढ़ाई भी कराई थी, साथ बैठकर खाना भी खाया था और जाते-जाते अपनी थाली खुद धोकर एक बात समझा गए थे- अपना काम खुद करना सीखिए. कोई काम छोटा नहीं होता.
बिपुल राहुल