'मैं रावण का वध करूंगा...', रामायण के ट्रेलर में श्रीराम की कसम पर सवाल, क्या है सच?

रामायण फिल्म के ट्रेलर में रणबीर कपूर द्वारा निभाए गए श्रीराम के किरदार में क्रोध और रावण वध के प्रण को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है.

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रणबीर कपूर की आने वाली फिल्म रामायण का ट्रेलर चर्चा में है रणबीर कपूर की आने वाली फिल्म रामायण का ट्रेलर चर्चा में है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 01 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:39 AM IST

रामायण फिल्म (रामायणा) का ट्रेलर आए दो दिन हो चुके है. निर्माता नमित मल्होत्रा और निर्देशक नितेश तिवारी की मच अवेटेड इस फिल्म के फर्स्ट लुक और इंप्रेशन को लेकर पब्लिक डोमेन में काफी बज है. ट्रेलर को मिक्स रेस्पांस मिल रहे हैं और इसमें जितने भी किरदारों की झलकियां दिखाई दे रही हैं, सभी के लुक, उनकी स्क्रीन प्रजेंस, कॉस्ट्यूम, डॉयलॉग डिलिवरी, एक्शन और एक्सप्रेशन पर खूब बातें हो रही हैं.

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इन तमाम चर्चाओं के बीच एक बात पर निगाह जाकर टिक जाती है. ट्रेलर के एक हिस्से में श्रीराम बने रणबीर कपूर बहुत गुस्से में धनुष उठाते हुए प्रण करते हैं कि 'वह रावण का तीनों लोकों के सामने वध करेंगे.' इस सीन को देखने के बाद सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा भी चल पड़ी है कि श्रीराम ने कब ऐसा प्रण लिया कि वह रावण का वध करेंगे? क्या उन्होंने कभी बहुत गुस्से में ऐसा कुछ कहा था? क्या पौराणिक ग्रंथों और किताबों में कहीं ऐसा जिक्र मिलता है?

श्रीराम को रामायण-रामचरित मानस और अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी युद्ध में भी स्थिर रहने वाला, कभी विचलित न होने वाला, भुवन मोहिनी मुस्कान वाला, कोमल और सौम्य वाणी बोलने वाला, महावीर और हर कौशल में निपुण होने के बावजूद अतिविनम्र और दीनदयालु बताया गया है. बल्कि बड़े-बड़े निशाचरों का भी वध उन्होंने कभी क्रोध में नहीं किया. उन्हें अंतिम से अंतिम समय तक मौका देने की कोशिश की.

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ताड़का वध में भी नहीं दिखा था श्रीराम का क्रोध
श्रीराम ने सबसे पहले ताड़का वध किया था. इस वध में भी उनके क्रोध और भुजाओं के फड़कने-गर्जने का कहीं जिक्र नहीं है. रामचरित मानस में तो  संत तुलसी लिखते हैं कि वन के मार्ग में जब ताड़का हमला करने के लिए दौड़ी आई तो विश्वामित्र के इशारे पर श्रीराम ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिए और फिर उसे मरने से पहले दीन मानकर अपना देवस्वरूप भी दिखा दिया. 

चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥3॥ (ताड़का वध, बालकांड)

महर्षि वाल्मीकि इसी बात को श्लोक में लिखते हैं कि

स तया ताडितो बाणैर्मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः।
पपात भुवि ताडका सा प्राणैः संपरिवर्जिता।।

 

अर्थ: श्रीराम द्वारा मर्मभेदी बाणों से घायल होने पर, ताड़का धरती पर गिर पड़ी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए.

कहने का मतलब है कि श्रीराम ने राक्षसों का वध करते हुए कहीं भी क्रोध, क्षोभ, अनावश्यक बल प्रदर्शन, गर्जना आदि काम नहीं किए. उन्होंने सावधान करने के लिए चेताया जरूर, लेकिन किसी का वध करने जैसा प्रण नहीं लिया और रावण के वध का प्रण उन्होंने लिया हो, ऐसा भी जिक्र नहीं आता है.

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श्रीराम ने प्रण भी करुणा में लिया था, क्रोध में नहीं

अरण्य कांड में एक जगह जिक्र आता है, जहां श्रीराम राक्षसों और पापियों से धरती की मुक्ति का प्रण लेते हैं. लेकिन यहां भी 'वध' शब्द नहीं आता है. जब श्रीराम वन में बिखरे हड्डियों और कंकालों को देखकर पूछते हैं कि ये किसके हैं तो डरे हुए ऋषि-मुनि बताते हैं कि राक्षसों ने जिन मुनियों को खा डाला है यह उनके ही कंकाल हैं. श्रीराम यह सब देखकर करुणा से भर उठते हैं.  तब संत तुलसी एक दोहे में उनका प्रण बताते हैं -

'निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥' (अरण्य कांड)

 

भाव: श्री रामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूंगा. फिर समस्त मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उनको (दर्शन एवं सम्भाषण का) सुख दिया.

इसी तरह वाल्मीकि रामायण में भी ऐसा स्पष्ट जिक्र नहीं मिलता है कि श्रीराम ने सीधे रावण वध की बात की हो. लेकिन उन्होंने शरणागत की हर प्रकार से रक्षा और ऋषि-मुनि व संत समाज की हर प्रकार से रक्षा-सुरक्षा का वचन कई जगह लिया. 

जैसे जब विभीषण के आने की खबर उन्हें लगती है तो वह स्पष्ट कहते हैं कि 'जो मेरी शरण में आ गया तो मैं उसे अभय देता हूं. यही मेरा व्रत है. फिर अगले श्लोक में वह कहते हैं कि "हे सुग्रीव! उसे यहां ले आओ. वह विभीषण हो या खुद रावण ही क्यों न हो, मैंने उसे अभय दे दिया है.'

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सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
(युद्धकाण्ड, सर्ग 18, श्लोक 33 – गीता प्रेस)

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम्॥  (युद्धकाण्ड, सर्ग 18, श्लोक 34 – गीता प्रेस)

सुग्रीव के आपा खोने और क्रोधित होने का है जिक्र

मचरित मानस और रामायण दोनों में ही ऐसा जिक्र मिलता है कि सुग्रीव जरूर क्रोध में आकर ऐसा कहते हैं कि वह रावण का वध करेंगे या राक्षस कुल का समूल नाश कर देंगे. बल्कि जब सुग्रीव पहली बार रावण को देखते हैं तो आपा खो देते हैं और बिना युद्ध की घोषणा के ही रावण पर हमला कर देते हैं. तब श्रीराम इसे मर्यादा के विपरीत बताते हैं और भविष्य में कभी भी ऐसा न करने के लिए कहते हैं.

वाल्मीकि रामायण में सुग्रीव, श्रीराम के साथ मित्रता करते हुए संकल्प लेते हैं और कहते हैं कि हे रघुनन्दन! आपकी कृपा से मैं अपहृत हुई माता सीता को ठीक उसी तरह वापस लेकर आऊंगा, जैसे खोए हुए वेदों को वापस लाया गया था.मैं संपूर्ण लोक को पीड़ित करने वाले उस कांटे रूपी रावण का उसके पूरे दल-बल (वंश) सहित विनाश करने में आपका पूर्ण साथ दूंगा,

अहं तद् रघुनन्दन।
आनयिष्यामि तां सीतां नष्टां वेदश्रुतीमिव ॥
प्रसादात् तव राघव।
हनिष्यामि सगणं रावणं लोककण्टकम् ॥ 

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रामचरित मानस के किष्किंधा कांड में यही बात सुग्रीव ऐसे कहते हैं- 

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥
सब प्रकार करिहउं सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥

भाव- सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुनिए, आप शोक का त्याग कर दीजिए और मन में धैर्य धारण कीजिए. मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूंगा और वह हर उपाय करूंगा जिससे जानकी जी (माता सीता) आपको वापस मिल जाएं.

कुल मिलाकर बात ये है कि ट्रेलर में रणबीर कपूर श्रीराम के किरदार के रूप में जो प्रण ले रहे हैं, उसका ठीक-ठीक जिक्र या वर्णन प्रचलित ग्रंथ परंपरा में नहीं दिखता है. हालांकि रामकथा के कई तरह के वर्जन हैं. सबमें लेखकों ने अपने-अपने अनुसार रचनात्मक स्वतंत्रता ली है. लेकिन नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी ने किस वर्जन से ये प्रसंग चुना होगा, इसे ठीक-ठीक समझना अभी तो मुश्किल है. 

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