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जान‍िए उस अंतरराष्ट्रीय समझौते के बारे में जिसकी कीमत अब तक चुका रहे हैं भारतीय क‍िसान

India-US Trade Deal: भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी क्षेत्र को लेकर असमंजस है, खासकर जेनेटिकली मोडिफाइड सोयाबीन और मक्का के आयात को लेकर. डब्ल्यूटीओ समझौते के तहत भारत किसानों को एक सीमित सब्सिडी दे सकता है, लेकिन विकसित देश अपने किसानों को अधिक सब्सिडी देते हैं. जानिए किसके राज में हुआ था ये समझौता?

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 World Trade Organization Agreement on Agriculture (Getty Image)
World Trade Organization Agreement on Agriculture (Getty Image)

जनवरी 2022 में अमेर‍िका के 28 सांसदों ने अपने तत्कालीन राष्ट्रपत‍ि जो बाइडन को पत्र लिखकर भारत के खिलाफ व‍िश्व व्यापार संगठन (WTO) में मुकदमा चलाने की मांग उठाई थी. आरोप लगाया गया था क‍ि भारत डब्ल्यूटीओ के तय नियम का उल्लंघन करते हुए गेहूं के उत्पादन मूल्य पर 10 फीसदी से ज्यादा सब्सिडी दे रहा है. इस वजह से व‍िश्व बाजार में भारत का अनाज कम कीमत पर उपलब्ध है, इससे अमेर‍िका के किसानों को नुकसान हो रहा है. अब आप सोच रहे होंगे क‍ि आख‍िर अमेर‍िका के सांसद भारत को ऐसी धमकी कैसे दे सकते हैं? दरअसल, ऐसा एक अंतरराष्ट्रीय समझौते की वजह से हुआ था, ज‍िस पर कांग्रेस की सरकार ने हस्ताक्षर क‍िए थे. हम बात कर रहे हैं डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते (AOA) की. 

भारत-अमेर‍िका ट्रेड डील की तस्वीर जब साफ होगी तब उसके नफे-नुकसान पर भी बात जरूर होगी. लेक‍िन उस कृषि समझौते को याद करना जरूरी है ज‍िस पर भारत के क‍िसानों के हाथ बांधने के आरोप लगते हैं. दरअसल, डब्ल्यूटीओ की स्थापना के साथ ही इसका कृषि समझौता भी 1 जनवरी 1995 को लागू हो गया था. भारत डब्ल्यूटीओ का संस्थापक सदस्य है. आरोप है क‍ि इस एग्रीमेंट की वजह से ही आज ऐसे हालात हो गए हैं कि भारत अपने किसानों को थोड़ी सी भी सब्सिडी देता है तो कई विकसित देशों के पेट में दर्द हो जाता है. यह अलग बात है क‍ि वो व‍िकस‍ित देश अपने किसानों को भारत से कई गुना अध‍िक सब्सिडी दे रहे हैं.

ट्रेड डील और सवाल 

इस वक्त अमेर‍िका के साथ हुई भारत की ट्रेड डील सुर्ख‍ियों में है. इस डील में कृष‍ि क्षेत्र और डेयरी को लेकर अब तक असमंजस कायम है. वाण‍िज्य मंत्री पीयूष गोयल और कृष‍ि मंत्री श‍िवराज स‍िंह चौहान ने क‍िसानों के ह‍ितों के साथ समझौता न क‍िए जाने की सफाई तो दी है लेक‍िन उन्होंने यह नहीं बताया क‍ि इस डील के तहत अमेर‍िका का जेनेट‍िकली मोड‍िफाइड (GM) सोयाबीन और मक्का भारत में आयात क‍िया जाएगा या सरकार अपने पुराने स्टैंड पर ही कायम है. यही बात क‍िसानों की धड़कन बढ़ा रही है. 

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इसी मुद्दे को लेकर व‍िपक्ष हमलावर है. नेता विपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी ट्रेड डील में आपकी मेहनत के खून-पसीने को बेच दिया है. उन पर बहुत प्रेशर है. हालांक‍ि, जब तक डील के डॉक्यूमेंट सामने नहीं आते हैं तब तक सोयाबीन और मक्के पर कोई भी व्यक्त‍ि दावे के साथ यह नहीं कह सकता क‍ि भारत ने इसके ल‍िए दरवाजे खोले हैं या नहीं. लेक‍िन, इतना तो तय है क‍ि व‍िश्व व्यापार संगठन में जो समझौता कांग्रेस करके आई थी उसकी कीमत क‍िसान अब तक चुका रहे हैं.


भारतीय क‍िसानों पर अंतरराष्ट्रीय शर्त

बहरहाल, बात करते हैं डब्ल्यूटीओ की. इस समय ज्यादातर क‍िसान संगठनों की मांग भारत को WTO से बाहर न‍िकालने की है, ताक‍ि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देने पर लगाई गई अंतरराष्ट्रीय शर्तों से सरकार मुक्त हो जाए और उसका क‍िसानों को फायदा म‍िले. डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते (AOA) के मुताब‍िक, भारत जैसे विकासशील देश अपने यहां होने वाली फसलों की कुल कीमत पर एमएसपी को मिलाकर अधिकतम 10 फीसदी ही सब्सिडी दे सकते हैं. वो निर्धारित सीमा से अधिक सब्सिडी देने वाले देशों को अंतरराष्‍ट्रीय कारोबार बिगाड़ने वाले देश के तौर पर देखने लगते हैं.

भारत के क‍िसानों को 'सजा'

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भारतीय क‍िसान डब्ल्यूटीओ में कांग्रेस की ही गलतियों की सजा आज तक भुगत रहे हैं, ज‍िसकी वजह से सरकार एक तय सीमा से अध‍िक एमएसपी नहीं दे पाती. केंद्र सरकार किसानों को सब्सिडी के तौर पर जो एमएसपी देती है, हर वर्ष उसकी जानकारी डब्ल्यूटीओ को देनी होती है. डब्ल्यूटीओ में अमेर‍िका का दबदबा है. इसी समझौते की वजह से ही अमेर‍िका सह‍ित कई व‍िकस‍ित मुल्क भारत पर अक्सर दबाव बनाते रहते हैं.

पीस क्लाज के बावजूद धमकी

भारत सरकार ने इस न‍ियम पर आपत्त‍ि जाह‍िर करते हुए विशेष छूट की मांग रखी थी. क्योंक‍ि देश में खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम लागू करने पर सब्सिडी 10 फीसदी से बढ़ने का अनुमान था. इसके लिए साल 2013 में बाली में हुई डब्ल्यूटीओ की बैठक में 'पीस क्लॉज’ नाम से एक अस्थायी समाधान निकाला गया. इसके तहत व्यवस्था दी गई कि कोई भी विकासशील देश अगर अपनी पैदावार की कीमत का 10 परसेंट से अध‍िक सब्सिडी देता है तो दूसरा कोई इसका व‍िरोध नहीं करेगा. पीस क्लाज के तहत म‍िली छूट के बावजूद अमेर‍िका ने साल 2022 में भारत को उसी समझौते को याद द‍िलाते हुए धमकी दी थी जो कांग्रेस के वक्त हुआ था. 

नाइंसाफी का स‍िलस‍िला

जब भारत ने एग्रीकल्चर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर क‍िए थे तब यहां कांग्रेस की सरकार थी और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री पद पर बैठे हुए थे. कांग्रेस ने न जाने क‍िस मजबूरी या झांसे में आकर डब्ल्यूटीओ में सरकार के हाथ बांध द‍िए़, ज‍िसकी वजह से आज भी भारतीय किसानों के साथ नाइंसाफी का स‍िलस‍िला जारी है. एमएसपी बढ़ानी होती है तो यह समझौता एक बाधा बनकर सामने आता है. एक सवाल के ल‍िख‍ित जवाब में खुद केंद्रीय कृष‍ि मंत्री श‍िवराज स‍िंह चौहान ने संसद में एमएसपी को लेकर डब्ल्यूटीओ द्वारा लगाई गई शर्तों की जानकारी दी थी.

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सरकार का क्या है रुख?

सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने क‍िसान तक के पोडकास्ट 'अन्नगाथा' में डब्ल्यूटीओ की भेदभावपूर्ण नीत‍ियों पर व‍िस्तार से बातचीत की थी. धर के मुताब‍िक, भारत लंबे समय से यह कहता आ रहा है क‍ि डब्ल्यूटीओ में जो एग्रीकल्चर एग्रीमेंट है उसको बदलना चाहिए. भारत सरकार किसानों को जो सब्सिडी दे रही है उसके ऊपर इस समझौते के तहत एक सीलिंग लगी हुई है. हम नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत गरीबों को जो सस्ता अनाज दे रहे हैं उसके ऊपर भी डब्ल्यूटीओ ने कहा है कि हम इतना नहीं दे सकते हैं. सवाल यह है क‍ि एक इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन का क्या हक बनता है कि वो हमें बताए क‍ि एक हम अपने क‍िसानों और गरीब लोगों क्या दें और क्या न दें.

कुल म‍िलाकर भारत सरकार की कोश‍िश यही है क‍ि डब्ल्यूटीओ का एग्रीकल्चर एग्रीमेंट बदला जाए. उसे क‍िसानों का ह‍ितैषी बनाया जाए. भारत सरकार अपने किसानों के समर्थन में डब्‍ल्‍यूटीओ की बैठकों में लगातार आवाज उठा रही है. लेक‍िन, क‍िसानों का सबसे बड़ा ह‍ितैषी बताने वाले दलों को बताना चाह‍िए क‍ि उन्होंने भारतीय क‍िसानों को बेहद भेदभावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय न‍ियमों की बेड़‍ियों में क्यों बांधा?

इतना बड़ा भेदभाव

अमेर‍िका प्रत‍ि क‍िसान सालाला 61286 यूएस डॉलर से ज्यादा की सब्स‍िडी देता है. वहीं भारत साल भर में स‍िर्फ 282 यूएस डॉलर ही सब्स‍िडी दे पाता है. इसके बावजूद डब्ल्यूटीओ भारत पर कृषि सब्स‍िडी कम करने और किसानों को एमएसपी न देने का दबाव बनाता रहता है. वर्ष 2018-19 में डब्ल्यूटीओ की बैठक के दौरान अमेरिका, कनाडा, ब्राजील, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया आदि देशों ने आरोप लगाया था कि भारत ने धान खरीद के दौरान किसानों को तय सीमा से ज्यादा सब्सिडी दी है. विकसित देशों का ऐसा मानना है कि यद‍ि भारत अपने किसानों को ज्यादा सरकारी सपोर्ट यानी सब्सिडी देगा तो इसका असर वैश्व‍िक कृषि कारोबार पर पड़ेगा. जिससे उनके हित प्रभावित होंगे.

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