
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है. दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है और इस बीच तुर्की-पाकिस्तान के रक्षा संबंध चर्चा का विषय बने हुए हैं. इसी रविवार को तुर्की नौसेना का एक युद्धपोत TCC BUKUKADA कराची बंदरगाह पर पहुंचा है जो 7 मई तक वहां रहेगा. यह पोत पाकिस्तान में तुर्की के राजदूत डॉ. इरफान नेजिरोग्लू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच हुई मुलाकात के बाद कराची पहुंचा है जिसमें तुर्की के दूत ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता दिखाई है.
पाकिस्तान की सेना का कहना है कि युद्धपोत के पाकिस्तान आने का मकसद दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग को और गहरा करना है. लेकिन युद्धपोत के पाकिस्तान पहुंचने की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
TCC BUKUKADA को 2013 में तुर्की के MİLGEM नेशनल वॉरशिप प्रोग्राम के हिस्से के रूप में कमीशन किया गया था. ये युद्धपोत समुद्र की सतह पर युद्ध करने, पनडुब्बी रोधी ऑपरेशन और गश्ती अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है. यह उन्नत रडार सिस्टम, 76 मिमी की नौसैनिक बंदूक, जहाज रोधी मिसाइलों और टारपीडो लांचर से लैस है.
इस युद्धपोत से पहले तुर्की के C-130 एयरक्राफ्ट ने कराची में लैंड किया था. पाकिस्तान की मीडिया में दावा किया गया कि एयरक्राफ्ट में लड़ाकू हथियार हैं. लेकिन तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने उन दावों को खारिज करते हुए कहा कि एयरक्राफ्ट ईंधन भरने के लिए कराची में उतरा था न कि उससे पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई की गई.
'भारत पहले सांप को दूध पिलाता है फिर...'
भले ही तुर्की ने पाकिस्तान को हथियार देने से इनकार किया हो लेकिन पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बीच तुर्की का पाकिस्तान की रक्षा मदद करना कई सवाल खड़े कर रहा है.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो सुशांत सरीन ने इस संबंध में कहा है कि हालिया घटनाओं को देखते हुए भारत का तुर्की के साथ सहयोग देखकर वो निराश हैं.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में वो कहते हैं, 'भारत गंभीर देश नहीं है. हम पहले सांप को दूध पिलाते हैं, फिर सोचते हैं कि सांप ने हमें डस क्यों लिया. हम अपने दुश्मनों को फायदा पहुंचाते हैं और दोस्तों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं. हम खुद को यह भ्रम देते हैं कि तुर्की जैसे देश अपनी दुश्मनी छोड़ देंगे. वे हमसे फायदा उठाते हैं और फिर खुलेआम हमें चाकू मार देते हैं.'

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच तुर्की के पाकिस्तान को मदद करने को लेकर विदेश मामलों के जानकार और नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक The Imagindia Institute के संस्थापक रोबिंदर सचदेवा कहते हैं कि तुर्की ऐसा अपने आर्थिक और भू-राजनीतिक फायदे के लिए कर रहा है. तुर्की के इस्लामवादी नेता रेचेप तैय्यप एर्दोगन खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में स्थापित करने के लिए कश्मीर के मुद्दे को जोर-शोर से उठाते रहते हैं.
आजतक डॉट इन से बातचीत में वो कहते हैं, 'पहली बात ये है कि इस्लामिक दुनिया में तुर्की अपना अहम रोल अदा करना चाहता है. वो पाकिस्तान के साथ मिलकर कश्मीर मुद्दे को वैश्विक मंच और मुस्लिम दुनिया में उठाता रहता है. इसके साथ ही भारत ने यूरोप-मिडिल ईस्ट कॉरिडोर (IMEC) बनाने का जो प्लान किया है, उसका लैंडिंग प्वॉइंट ग्रीस में रखा गया है. ग्रीस और तुर्की के बीच संबंध ऐसे हैं जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच हैं. यह एक बड़ी वजह है कि तुर्की पाकिस्तान को ज्यादा मदद कर रहा है. '
तुर्की ने पाकिस्तान को दिया ड्रोन, भारत को कर दिया मना
तुर्की ने 2022 में पाकिस्तान को Bayrakter TB2 ड्रोन्स भी बेचे थे. इसके बाद 2023 में इन ड्रोन्स को बनाने वाली दिग्गज कंपनी Baykar टेक्नोलॉजी ने पाकिस्तान के राष्ट्रीय एयरोस्पेस विज्ञान और प्रौद्योगिकी पार्क के साथ संयुक्त रूप से इन ड्रोन्स को विकसित करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था.
तुर्की जहां इन ड्रोन्स को पाकिस्तान के साथ विकसित करने पर राजी हो गया, वहीं उसने भारत को ये ड्रोन्स देने से भी इनकार कर दिया था. Bayker टेक्नोलॉजी के सीईओ ने 2022 में कहा था कि उनकी कंपनी भारत को ये ड्रोन्स नहीं बेचेगी बल्कि यह ड्रोन पाकिस्तान, अजरबैजान, यूक्रेन जैसे मित्र देशों को ही दिया जाएगा. तुर्की के Bayrakter TB2 ड्रोन्स युद्ध क्षेत्र में बेहद शानदार प्रदर्शन करते हैं और रणनीतिक बढ़त प्रदान करते हैं.

रोबिंदर सचदेवा कहते हैं कि पाकिस्तान पर इस वक्त युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और उसकी सेना पर्याप्त हथियारों के लिए संघर्ष कर रही है. पाकिस्तान अपनी सैन्य जरूरतों के लिए चीन पर निर्भर है जो चीन से अपनी जरूरत का 81% रक्षा हथियार खरीदता है. पाकिस्तान तुर्की से भी अच्छी मात्रा में रक्षा हथियार खरीदता है और अब वो चाहेगा कि तुर्की से साथ और अधिक रक्षा समझौते हों. हथियार बेचकर तुर्की भी खूब पैसे कमाना चाहता है.
भारत-तुर्की के बीच अरबों डॉलर का व्यापार, फिर क्यों पाकिस्तान के साथ खड़े हैं एर्दोगन
भारत और तुर्की के बीच 2024 में 10.4 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था. भारत ने 6.66 अरब डॉलर के सामान तुर्की को बेचे थे जबकि 3.78 अरब डॉलर के सामान तुर्की से खरीदे थे.
वहीं, अगर तुर्की और पाकिस्तान के द्विपक्षीय व्यापार की बात करें तो, 2024 में दोनों देशों के बीच महज 1.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. आंकड़ों से साफ पता चलता है कि पाकिस्तान तुर्की से व्यापार के मामले में भारत के आगे कहीं नहीं टिकता. इतना बड़ा ट्रेड पार्टनर होने के बावजूद, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन पाकिस्तान की मदद क्यों कर रहा है?
इस सवाल के जवाब में रोबिंदर सचदेवा कहते हैं, 'कहां हमारी अर्थव्यवस्था और कहां पाकिस्तान... हमारी कंपनियां तुर्की में भी निवेश कर रही है. लेकिन एर्दोगन का भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान को सपोर्ट करना उनकी स्ट्रैटेजिक और पॉलिटिकल च्वॉइस है. वो ये नहीं सोच रहे कि व्यापार का क्या होगा. वो सोचते हैं कि मैं यूरोपीय यूनियन, अमेरिका, चीन और अरब दुनिया को साथ लेकर चलूं, भारत को लेकर ऐसा नहीं सोचते वो.'
ऐसे में भारत को कैसे जवाब देना चाहिए? रोबिंदर सचदेवा कहते हैं, 'सबसे पहले तो हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बॉयकॉट पाकिस्तान का कैंपेन चलाना चाहिए और देशों से कहना चाहिए कि वो पाकिस्तान का सामान न खरीदें, उसके यहां निवेश न करे. तुर्की से भी कहना चाहिए कि वो ऐसा करे और अगर वो ऐसा नहीं करता तो हमें तुर्की से रक्षा हथियार खरीदने तुरंत बंद कर देने चाहिए. अगर किसी रक्षा समझौते के लिए उससे बात चल रही हो तो उसे तुरंत रोक देना चाहिए. हमें तुर्की की डिफेंस कंपनियों को भी बैन कर देना चाहिए. '
भारत और तुर्की के डिफेंस ट्रेड की बात करें तो, ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के मुताबिक, 2024 में भारत ने तुर्की से 3.53 लाख डॉलर के हथियार खरीदे थे. भारत ने बम, ग्रेनेड, मिसाइल और अन्य तरीके के हथियार तुर्की से खरीदे.
कश्मीर मुद्दे पर हमेशा पाकिस्तान के साथ रहा है तुर्की
पहलगाम में जिस दिन हमला हुआ, उस दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तुर्की पहुंचकर कश्मीर का राग अलाप रहे थे. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तानी पीएम ने कश्मीर मुद्दे पर तुर्की के समर्थन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया.
इससे पहले फरवरी में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन पाकिस्तान पहुंचे थे जहां उन्होंने कहा कि कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए वो पाकिस्तान के प्रयासों का समर्थन करते हैं.
उन्होंने आगे कहा था कि कश्मीर का मुद्दा ऐसी बातचीत के जरिए हल हो सकता है जो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की इच्छा के अनुरूप हो. एर्दोगन ने कहा कि तुर्की लगातार कश्मीरी भाइयों के साथ एकजुटता रखेगा. साल 2020 में राष्ट्रपति एर्दोगन ने पाकिस्तान की संसद में भाषण देते हुए कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ दिया था.

उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर उसके विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करने पर कहा था, 'हमारे कश्मीरी भाइयों और बहनों ने दशकों तक परेशानियां झेली हैं और हाल के समय में लिए गए एकतरफा फैसलों के कारण उनकी दिक्कतें और बढ़ गई हैं. आज कश्मीर का मुद्दा हमारे उतना ही करीब है जितना पाकिस्तान के. इस मुद्दे का समाधान सभी संबंधित पक्षों के हित में होगा. तुर्की कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए न्याय, शांति और बातचीत के साथ खड़ा रहेगा.'
कश्मीर पर पाकिस्तान को तुर्की के समर्थन को लेकर रोबिंदर सचदेवा कहते हैं, 'ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने अभी भी तुर्की के साथ सामान्य दोस्ती बरकरार रखी है जबकि तुर्की खुद ही हमारे खिलाफ हो गया है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि एर्दोगन खुद को इस्लामिक दुनिया का नेता मानते है और इसमें उनकी प्रतिस्पर्धा सऊदी अरब से भी रही है. तुर्की कश्मीर मुद्दे पर दुनिया में खुद को चैंपियन दिखाना चाहता है.'
खुद घरेलू अस्थिरता से जूझ रहा तुर्की पाकिस्तान का कितना साथ दे पाएगा?
पाकिस्तान की मदद करने चले एर्दोगन खुद घरेलू अस्थिरता का सामना कर रहे हैं. तुर्की में लोकप्रिय विपक्षी नेता एकरेम इमामोग्लू को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेज दिया गया है जिसके बाद देशभर में एर्दोगन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं. तुर्की में महंगाई, बेरोजगारी भी चरम पर है. ऐसे में अगर भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू होती है तो तुर्की पाकिस्तान की कितनी मदद कर पाएगा?
रोबिंदर सचदेवा कहते हैं, 'दो बातें हैं- तुर्की के अंदर जो राजनीतिक अस्थिरता चल रही है, वो एर्दोगन को और मजबूर करता है कि देश के अंदर भारत विरोधी और कश्मीर समर्थन की भावना बढ़ाएं. एर्दोगन अपने लोगों का भावात्मक सपोर्ट लेने के लिए भारत के और खिलाफ हो रहे हैं. दूसरी बात ये है कि पाकिस्तान तुर्की से हथियार खरीदेगा तो फायदा तुर्की को ही होगा. युद्ध अगर होता है तो इससे तुर्की की अर्थव्यवस्था को फायदा ही होगा क्योंकि पाकिस्तान उससे और अधिक हथियार और गोला-बारूद खरीदेगा.'