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पीएम मोदी को लग गई थी 'ट्रंप ट्रैप' की भनक, भारत ने वो किया जो दुनिया के बाकी मुल्क नहीं कर पाए

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अस्थिर ट्रेड डिप्लोमेसी में भारत ने संयम और सतर्कता से काम लिया. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के दबावों के बावजूद धैर्य रखा और बैक-चैनल कूटनीति जारी रखी. भारत ने ट्रंप की मनचाही शर्तों को समझते हुए अपने रणनीतिक विकल्पों को मजबूत किया और 'ट्रंप ट्रैप' से बचा रहा.

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भारत ने ट्रंप को पहले ही परख लिया था (Photo: AFP)
भारत ने ट्रंप को पहले ही परख लिया था (Photo: AFP)

अमेरिका के सहयोगियों और उसका सहयोगी बनने की चाह रखने वालों (यानी पाकिस्तान) के लिए चेतावनी! जब डोनाल्ड ट्रंप आपसे नाराज होते हैं, तो करीबी दोस्त भी नहीं बख्शे जाते. मंगलवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और नाटो प्रमुख मार्क रुट को यह कड़वी सच्चाई तब पता चली जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ते तनाव के बीच किसी नाराज एक्स लवर की तरह उनकी निजी बातचीत सार्वजनिक कर दी. 

यहां तक कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टारमर भी, ट्रंप से अपनी दोस्ती का ढोल पीटने के कुछ ही घंटे बाद, चागोस द्वीप डील को लेकर उनकी 'भारी मूर्खता' पर लताड़े गए. इससे एक सख्त सच्चाई सामने आई- ट्रंप के लिए वफादारी सम्मान की गारंटी नहीं है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक चुप्पी और चालें, ट्रंप की अस्थिर ट्रेड डिप्लोमेसी के बीच, भारत को 'ट्रंप ट्रैप' से बचाने में मददगार रहीं.

नए साल की शुरुआत से ही ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर है. वेनेजुएला में ट्रंप ने शासन परिवर्तन कर दिया और उनकी इस कोशिश से ग्रीनलैंड कब्जाने की उनकी मंशा को और बल मिला है.

दुनिया राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर स्तब्ध रह गई और यूरोप ने बेहद कमजोर प्रतिक्रिया दी. लेकिन कुछ दिन बाद, जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप के ही एक देश को निशाना बनाया और 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी, तब यूरोप को एक कड़वा सबक मिला. ट्रंप को जब कुछ चाहिए होता है तो वो आपके दोस्त नहीं बल्कि एक कारोबारी होते हैं.

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ट्रंप ने पिछले ही साल यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ एक व्यापार समझौता किया था, बावजूद इसके, उन्होंने ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ लगाने का फैसला किया है. इसका मतलब है कि ट्रंप को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी करीबी सहयोगी ने उनके साथ व्यापार समझौते किए हैं या फिर अमेरिकी सामानों के लिए अपने बाजार खोल दिया है, वो टैरिफ लगाकर ही दम लेंगे.

भारत ने पहले ही वो बात समझ ली थी जिसे यूरोप अब समझ रहा है

इस पृष्ठभूमि में भारत ने शायद वो बात पहले ही समझ ली थी, जिसे यूरोप अब महसूस कर रहा है. ‘ट्रंप 2.0’ के दौर में टैरिफ महज व्यापार का औजार नहीं, बल्कि निजी और भू-राजनीतिक लक्ष्यों को साधने का हर मौसम में काम आने वाला हथियार हैं.

इसीलिए, 50 प्रतिशत तक के सबसे हाई टैरिफ झेलने और अमेरिकी मांगों के आगे झुकने के प्रेशर के बावजूद भारत ने ट्रेड डील पर जल्दबाजी नहीं की.

मई 2025 में भारत ने ट्रंप के अटपटे बयानों का स्वाद तब चखा जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह निराधार दावा किया कि उन्होंने टैरिफ की धमकियों से पाकिस्तान के साथ संघर्ष रुकवाया. ट्रंप के इस निराधार दावे के छिपे मैसेज को भारत तुरंत समझ गया कि ट्रेड को भू-राजनीतिक दिखावे और ट्रंप की मनचाही शर्तें मनवाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

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भारत ने ट्रंप के दावे का खंडन किया और कहा कि युद्धविराम दोनों देशों के बीच आपसी बातचीत से हुआ. वहीं पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति की मध्यस्थता का स्वागत किया. विरोध के बावजूद भारत ने संयम रखा और ट्रंप पर सीधे हमला नहीं किया.

भारत के रुख से बौखला गए ट्रंप

इससे ट्रंप का धैर्य जवाब देने लगा. 17 जून को राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हुई तीखी फोन बातचीत ने तनाव और बढ़ा दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि युद्धविराम में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी. उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार पर भी ट्रंप से बातचीत से इनकार किया, जबकि पाकिस्तान ने ट्रंप की खूब प्रशंसा की.

नतीजे तुरंत दिखे. कुछ हफ्तों बाद ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिए, जिनमें रूस से तेल खरीद पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भी शामिल था. पाकिस्तान पर सिर्फ 19 प्रतिशत टैरिफ लगा. चीन का मुकाबला करने के लिए ट्रंप से पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भारत से रिश्ते सुधारने के लिए जितनी कोशिश की थी, सब पर पानी फिरता दिखा.

इसके बावजूद भारत ने धीरज रखना चुना. टैरिफ लगने के बाद प्रधानमंत्री मोदी या उनके मंत्री ट्रंप के साथ शब्दों की जंग में नहीं उतरे. भारत ऐसे वक्त भी अपने रुख पर कायम रहा जब ट्रंप के सहयोगी लगभग रोज नए आरोप लगा रहे थे, भारत को 'क्रेमलिन के लिए लॉन्ड्रोमैट' बताने से लेकर 'ब्लड मनी' के आरोप लगा रहे थे. दूसरी ओर, ट्रंप प्रधानमंत्री की तारीफ करते रहे और उन्हें 'सच्चा', प्रिय' और 'महान' मित्र कहते रहे.

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'गुड कॉप-बैड कॉप' के खेल में नहीं फंसा भारत

भारत 'गुड कॉप-बैड कॉप' के खेल में नहीं फंसा. इसलिए टैरिफ के प्रेशर और दबाव की राजनीति के बावजूद भारत ने ऐसा कोई एकतरफा व्यापार समझौता करने की जल्दी नहीं दिखाई, जिससे उसका संवेदनशील कृषि और डेयरी सेक्टर अमेरिका के लिए खुल जाए. साथ ही, भारत ने रूसी तेल आयात भी नहीं रोका.

महत्वपूर्ण यह भी कि भारत ने अमेरिका से दूरी नहीं बनाई. पीयूष गोयल और एस. जयशंकर जैसे वरिष्ठ मंत्री पर्दे के पीछे कूटनीति और व्यापार वार्ताएं जारी रखते रहे. देश में विपक्ष के हमलों के बीच, प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका की 'आर्थिक स्वार्थपरता' के जवाब में 'स्वदेशी' पर जोर फिर से दिया.

यह भी नहीं कि भारत ने खुद को डराने-धमकाने दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा कर और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ निजी कार यात्रा कर ट्रंप को संकेत दिए कि भारत के पास अमेरिका और पश्चिम से परे भी रणनीतिक विकल्प हैं. यह दशकों से भारत की आधारशिला रही 'गुटनिरपेक्ष' विदेश नीति का उदाहरण है.

इसी समय, भारत ने ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ अहम व्यापार समझौते किए. यूरोपीय संघ के साथ एक बड़ा समझौता भी जल्द होने वाला है. भारत ने बिना किसी शोर-शराबे के अमेरिकी दालों पर 30 प्रतिशत टैरिफ भी लगाया. यह एक ऐसा कदम था जो ट्रंप को और नाराज कर सकता था.

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ट्रंप से पहले भारत ने कर लिया नैरेटिव पर कब्जा

तीसरी बात, भारत ने दोनों नेताओं की बातचीत में नैरेटिव अपने हाथ में रखा. दो विदेशी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 17 जून की बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के चार फोन कॉल इग्नोर किए. अमेरिका भारत के साथ आंशिक व्यापार समझौता करना चाहता था, लेकिन भारत सरकार जानती थी कि अतिशयोक्ति के शौकीन ट्रंप बातचीत के नतीजों को कैसे तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकते हैं.

आखिरकार, 17 सितंबर को प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ट्रंप ने उनसे बातचीत की. इस दौरान पीएम मोदी ने इस बात का ध्यान रखा कि बातचीत का भारत का पक्ष पहले सामने आए. ट्रंप हर बातचीत को तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं लेकिन पीएम मोदी ने उनके ही खेल में उन्हें मात दे दी.

अगर मैक्रों ने मोदी का तरीका अपनाया होता, तो शायद वो उस बेइज्जती से बच सकते हैं जो ट्रंप के चैट लीक होने से हुई थी. ट्रंप ने मैक्रों से साथ हुई निजी बातचीत को लीक कर दिया था.

पाकिस्तान भी, तमाम क्रिप्टोकरेंसी और रेयर अर्थ डील्स और मीठी-मीठी बातें करने के बावजूद, अमेरिकी इमिग्रेंट वीजा पर रोक की लिस्ट से नहीं बच पाया.

भारत ने ट्रंप को कैसे पहचान लिया?

भारत की इसी संयम रखने और अपने रुख पर कायम रखने की संतुलन वाली रणनीति ने उसे ट्रंप ट्रैप से बचा लिया. भारत कभी ट्रंप के दबाव में नहीं झुका. इसकी पुष्टि हाल ही में अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक के बयान से भी हुई, जिन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से सीधे बात करने से इनकार कर दिया.

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किसी झगड़े में न फंसने और हालात को सावधानी से मैनेज करने की रणनीति को भू-राजनीतिक विशेषज्ञ और लेखक फरीद जकरिया ने भी सराहा. दावोस में इंडिया टुडे से बातचीत में जकारिया ने कहा कि ट्रंप के साथ बेकार की लड़ाई से बचकर भारत से सही किया है.

उन्होंने कहा, 'धैर्य रखें. ट्रंप अस्थिर हैं. ट्रंप स्वभाव से अलग हैं. जहां तक हो सके, उन्हें संभालिए. उन्हें थोड़ा खुश रखने की कोशिश कीजिए.'

यूरोप और अमेरिका के बीच चल रहा टकराव भारत की सतर्क रणनीति को दिखाता है. टैरिफ और व्यापार के दबाव के बावजूद न तो ट्रंप की निंदा की, न हीआलोचना की और न ही व्यक्तिगत हमले किए. इसके साथ ही, भारत ने अपने मूल हितों की रक्षा की और बैक-चैनल डिप्लोमेसी खुली रखी.

‘टैरिफ किंग’ ट्रंप के कोई स्थायी व्यक्तिगत लगाव नहीं हैं. उनकी दिलचस्पी सिर्फ अमेरिका के लिए अगली बड़ी डील करने में है. भारत ने ट्रंप को बहुत पहले सही पढ़ लिया था. यूरोप और बाकी देश अब भी यह सबक सीख रहे हैं. 

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