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शेख हसीना, जमात और NCP... बांग्लादेश के नतीजों से सब खुश!

बांग्लादेश चुनाव में जीत का सेहरा भले तारिक रहमान की पार्टी BNP के सिर सजा. लेकिन राजनीति के अन्य किरदार भी खाली हाथ नहीं रहे. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जमात-ए-इस्लामी और छात्रों की पार्टी NCP सब ने कुछ न कुछ हासिल किया. किसके पास खुशी मनाने की कौन सी वजह है.

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शेख हसीना, NCP के नाहिद इस्लाम और जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान (फाइल फोटो- ITG)
शेख हसीना, NCP के नाहिद इस्लाम और जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान (फाइल फोटो- ITG)

बांग्लादेश के चुनाव नतीजों में तारिक रहमान बॉस साबित हुए. सत्रह साल बाद वतन लौटे तारिक के लिए यह सिर्फ चुनाव नहीं, सियासी पुनर्जन्म है. जिन गलियों से कभी सियासी निर्वासन की खबरें आती थीं, वहीं से अब जीत के नारे गूंजे.

जनता ने उनके इंतजार का हिसाब शायद ब्याज समेत चुकता कर दिया. इसी वजह से उनकी पार्टी BNP की झोली में 212 सीटें आईं. 

हालांकि, नतीजे सिर्फ विजेता की कहानी नहीं लिखते… वे हारने वालों (बाकी किरदारों) के लिए भी संदेश छोड़ जाते हैं. मतलब... शेख हसीना, कट्टरपंथी दल जमात ए इस्लामी और छात्र की पार्टी NCP, सबके लिए इस रिजल्ट में कुछ न कुछ छिपा है.

सबसे पहले बात करते हैं जमात-ए-इस्लामी की.
1941 में अबुल आला मौदूदी ने इसकी नींव रखी थी. मकसद साफ था- शरिया पर चलने वाला इस्लामी राज्य.

पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) की सियासत में दाखिल हुई जमात ने विचारधारा को राजनीति बनाया. लेकिन 1971 की मुक्ति जंग में उसकी भूमिका ने उसे बांग्लादेश के इतिहास के सबसे विवादित और काले अध्यायों में शामिल कर दिया.

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Bangladesh's Jamaat-e-Islami
जमात-ए-इस्लामी के नेता शफीकुर रहमान की जनसभा (AP Photo)

1971 की जंग में जमात ए इस्लामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था. उससे जुड़ी मिलिशिया (रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स) पर पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर व्यापक अत्याचार करने के आरोप लगे. बुद्धिजीवियों की टार्गेट किलिंग, हिंदू अल्पसंख्यकों के नरसंहार और महिलाओं के साथ सामूहिक हिंसा... जमात को सब में लिप्त पाया गया.

दरअसल, जमात की छात्र इकाई 'इस्लामी छात्र शिविर' अल-बद्र की रीढ़ जैसा था. वही अल-बद्र, जिस पर युद्ध के आखिरी दिनों में बंगाली बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर खत्म करने के आरोप लगे.

बांग्लादेश बनते ही पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान (शेख हसीना के पिता) ने जमात पर पाबंदी लगा दी गई थी. लेकिन वक्त बदला तो सियासी समीकरण भी बदले. तारिक रहमान के पिता जियाउर्रहमान के राज में BNP की सरकार में यह बैन हटा.

बाद के दौर में शेख हसीना ने जमात को आतंकी संगठन बताते हुए इसपर रोक लगाई. फिर मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली सरकार ने वह पाबंदी हटा दी, जिसके बाद जमात को दोबारा चुनावी मैदान में उतरने का रास्ता मिल गया.

खैर, इतिहास कितना भी काला हो. फिलहाल जमात इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती है. अलग-अलग वक्त पर लगे बैन की वजह से जमात-ए-इस्लामी ने पूरे 18 साल बाद आधिकारिक तौर पर अपने चुनाव चिन्ह (या गठबंधन के तहत) पर चुनाव लड़ा था.

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इस बार जमात-ए-इस्लामी 11 दलों के गठबंधन के साथ मैदान में थी... छात्र पार्टी NCP समेत. जमात ने अकेले 68 सीटें, और गठबंधन के साथ मिलकर 77 सीटें जीत लीं.

वह इस चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, साथ ही अब तक का उसका सबसे मजबूत प्रदर्शन.

इसका सियासत में संदेश साफ है. जमात ने बस वापसी नहीं की है, वह ताकत के साथ लौटी है. और इसका मतलब है कि ‘नया बांग्लादेश’ अब उसकी विचारधारा और उसकी राजनीति की छाया में अपनी अगली करवट लेगा.

चलिए अब कहानी को शेख हसीना की तरफ मोड़ते हैं.

2024 के Gen-Z उबाल ने सत्ता की नींव हिला दी. छात्र आंदोलन, राजनीतिक सुनामी बन गया. नतीजा... तख्तापलट. कुर्सी गई.

हालात ऐसे बने कि हसीना को जान बचाकर भारत का रुख करना पड़ा. बांग्लादेश की सियासत में यह सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं थी... यह सत्ता के एक लंबे अध्याय का अचानक बंद हो जाना था. उनकी पार्टी अवामी लीग पर अलग-अलग आरोप लगाकर चुनाव लड़ने तक पर बैन लगा दिया.

लेकिन नतीजों में शेख हसीना के लिए एक राहत की बात भी है. वह ये कि सत्ता सीधे Jamaat-e-Islami के हाथ नहीं गई. अवामी लीग और जमात की अदावत नई नहीं है. हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान ने ही सबसे पहले जमात पर बैन लगाया था.

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साथ-साथ हसीना सरकार के पतन में सिर्फ छात्र संगठन NCP का रोल नहीं था. खबरों के मुताबिक, जमात और उसकी छात्र इकाई 'इस्लामी छात्र शिविर' ने छात्र प्रदर्शनों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाने थी. एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिविर से जुड़े कैडर विश्वविद्यालयों में दाखिल होकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में सक्रिय थे.

लास्ट बट नॉट द लीस्ट.... अब बात छात्र संगठन नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) की.

2024 के सत्ता-विरोधी छात्र उभार के बाद NCP का जन्म हुआ. जब शेख हसीना सरकार के खिलाफ सड़कों पर उठी लहर ने राजनीतिक शक्ल लेनी शुरू की, तब कुछ छात्र नेताओं ने फैसला किया कि गुस्सा सिर्फ नारों में नहीं रहेगा, उसे संसद तक ले जाया जाएगा. इसी सोच के साथ 2024 के आखिर में NCP का औपचारिक ऐलान हुआ.

National Citizen Party
NCP के सपोर्टर्स ((AP Photo)

पार्टी के तीन बड़े चेहरे थे... नाहिद इस्लाम, हसनात अब्दुल्ला और सार्जिस आलम. इसमें से नाहिद (संयोजक) और हसनात (चीफ ऑर्गनाइज़र) ने पहली बार चुनाव में जीत हासिल कर ली है. साथ ही वह जमात गठबंधन का हिस्सा तो है ही. मतलब संसद में NCP को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलने वाला है.

दरअसल, NCP ने अपने दम पर नहीं, बल्कि जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत पाई सिर्फ 6 सीटें. अब NCP के नेता अच्छी तरह समझ रहे होंगे कि पहली कोशिश में थोड़ी कम सफलता जरूर मिली है, लेकिन राजनीति में हर परिणाम एक नई शुरुआत भी होता है.

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