वेस्ट एशिया में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से पैदा हुी ग्लोबल क्राइसिल के बीच सऊदी अरब के रुख ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. लंबे समय तक अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाने वाला सऊदी अरब अब खुले तौर पर वॉशिंगटन और इजरायल की रणनीति से दूरी बनाता दिख रहा है. इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह सामने आई है सऊदी शाही परिवार के वरिष्ठ सदस्य और पूर्व खुफिया प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैसल का बयान, जिसमें उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
सरकारी अखबार ‘अरब न्यूज’ में लिखे अपने लेख में प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल का युद्ध दरअसल नेतन्याहू की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था. उनका आरोप है कि नेतन्याहू लगातार कोशिश कर रहे थे कि सऊदी अरब और ईरान के बीच सीधा टकराव हो जाए, ताकि पूरे पश्चिम एशिया में एक बड़ा युद्ध छिड़ सके. लेकिन सऊदी नेतृत्व ने इस 'जाल' में फंसने से इनकार कर दिया.
अमेरिका की योजना को सऊदी अरब ने क्यों रोका?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ नाम से एक सैन्य योजना बनाई थी. इसका मकसद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसे तेल टैंकरों को अमेरिकी सैन्य सुरक्षा देकर सुरक्षित बाहर निकालना था. इसके लिए अमेरिका को सऊदी अरब के एयरस्पेस और सैन्य ठिकानों की जरूरत थी, लेकिन रियाद ने साफ इनकार कर दिया.
NBC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरी समय में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत कर उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन सऊदी अरब अपने फैसले पर अड़ा रहा. इसके बाद अमेरिका को ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ठंडे बस्ते में डालना पड़ा. यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय तक माना जाता रहा कि ईरान को लेकर सऊदी अरब ही अमेरिका को सख्त कदम उठाने के लिए उकसाता रहा है. लेकिन अब पहली बार रियाद खुलकर युद्ध से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है.
प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने CNN से बातचीत में भी कहा था, 'यह नेतन्याहू का युद्ध है. उन्होंने किसी तरह ट्रंप को अपनी सोच का समर्थन करने के लिए तैयार कर लिया.'
प्रिंस तुर्की ने अपने आर्टिकल में लिखा है कि सऊदी अरब चाहता तो ईरान पर जवाबी हमला कर सकता था. उसके पास ईरान के तेल ठिकानों और सामरिक केंद्रों को निशाना बनाने की क्षमता भी है. लेकिन ऐसा करने से पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झोंक दिया जाता. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सऊदी अरब सीधे युद्ध में उतरता, तो ईरान सऊदी तेल प्रतिष्ठानों, समुद्री वाटर ट्रीटमेंट प्लांट और खाड़ी तट के कई अहम ठिकानों पर बड़े हमले कर सकता था. इससे सऊदी अर्थव्यवस्था और नागरिक सुरक्षा दोनों को भारी नुकसान होता.
क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है. दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मच गई. सऊदी अरब पहले ही तेल निर्यात में भारी दबाव झेल रहा है. ऐसे में उसे डर था कि अगर युद्ध और बढ़ा तो यमन के हूती विद्रोही भी संघर्ष में शामिल हो सकते हैं. इससे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी प्रभावित हो सकता था, जो लाल सागर के रास्ते होने वाले व्यापार के लिए बेहद अहम है.
अगर बाब-अल-मंदेब भी बंद होता, तो सऊदी अरब के पश्चिमी बंदरगाहों से होने वाला निर्यात भी रुक जाता. यानी होर्मुज के बाद रेड सी का रास्ता भी बाधित हो सकता था. यही वजह है कि सऊदी अरब ने किसी भी सैन्य टकराव से दूरी बनाए रखना बेहतर समझा.
UAE और सऊदी अरब के बीच बढ़ता तनाव
जहां सऊदी अरब ने सतर्क रुख अपनाया, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ज्यादा आक्रामक नीति दिखाई. UAE ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के समर्थन में था क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात काफी हद तक होर्मुज पर निर्भर हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, UAE ने ईरानी निगरानी से बचने के लिए अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर तक बंद कर दिए थे. इसके बावजूद ईरान ने उसके कुछ ठिकानों को निशाना बनाया.
विशेषज्ञ मानते हैं कि होर्मुज संकट ने सऊदी अरब और UAE के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा कर दिया है. दोनों देशों के बीच यमन, सोमालिया और सूडान जैसे मुद्दों पर पहले से ही अलग-अलग रणनीतियां रही हैं. अब यह नया विवाद दोनों रिश्तों को और जटिल बना सकता है. पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है. सऊदी अरब अब खुद को केवल अमेरिका के सहयोगी के रूप में पेश नहीं करना चाहता, बल्कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाकर चलने की रणनीति अपना रहा है.
प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने अपने लेख में ईरान को “दर्द देने वाला पड़ोसी” जरूर कहा, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि मौजूदा समय में अमेरिका और इजरायल की नीतियां क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अब युद्ध की राजनीति से हटकर आर्थिक स्थिरता और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है. यही कारण है कि उसने इस बार अमेरिका और इजरायल की सैन्य रणनीति का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया.