पाकिस्तान जिस इलाके को "आजाद जम्मू-कश्मीर" कहता है, वहां पिछले कुछ वर्षों से एक शब्द लगातार चर्चा में है "पंजाबाइजेशन". हाल में POK में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के विरोध प्रदर्शनों के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को धीरे-धीरे पंजाब के राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव में ढाल दिया है?
पंजाबाइजेशन का मतलब सिर्फ पंजाबी भाषा का बढ़ता प्रभाव नहीं है. आलोचकों और स्थानीय अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिए पाकिस्तान की पंजाबी-प्रभुत्व वाली सेना, नौकरशाही और राजनीतिक व्यवस्था ने POK और गिलगित-बाल्टिस्तान पर अपना नियंत्रण मजबूत किया है.
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सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पूरा POK हमेशा से एक जैसा नहीं रहा. इस क्षेत्र में कई जातीय और भाषाई समूह रहते हैं. गुर्जर, जाट, राजपूत, सुधान, अवान, मुगल और पश्तून समुदाय यहां की आबादी का हिस्सा हैं. इसी तरह कश्मीरी, पहाड़ी, पंजाबी, हिंदको, बलती और शीना जैसी भाषाएं भी यहां बोली जाती रही हैं.
विशेषज्ञ बताते हैं कि POK के दक्षिणी हिस्से जैसे मीरपुर, भीम्बर और कोटली का सांस्कृतिक संबंध ऐतिहासिक रूप से पंजाब के पोठोहार क्षेत्र से रहा है. इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि पूरा POK कभी केवल कश्मीरी भाषी था. हालांकि आलोचकों का दावा है कि पिछले कई दशकों में पंजाब से आए लोगों की संख्या बढ़ने और सरकारी नीतियों के कारण स्थानीय पहचान कमजोर हुई है.
इस बहस की जड़ें 1949 के कराची समझौते तक जाती हैं. इस समझौते के तहत रक्षा, विदेश नीति और कश्मीर से जुड़े कई अहम मामलों का नियंत्रण पाकिस्तान की केंद्र सरकार को दे दिया गया. आलोचकों का कहना है कि इसके बाद से POK की वास्तविक सत्ता स्थानीय लोगों के हाथ में नहीं रही.
समय-समय पर पाकिस्तान ने POK के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव किए, लेकिन स्थानीय जनता की राय को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया. भले ही वहां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और विधानसभा मौजूद हैं, लेकिन बड़े फैसले आज भी इस्लामाबाद और रावलपिंडी में लिए जाते हैं. यही कारण है कि स्थानीय संगठन लंबे समय से अधिक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं.
JAAC जैसे संगठनों का आरोप है कि POK के प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था और नौकरशाही में पंजाब से आने वाले अधिकारियों का प्रभाव जरूरत से ज्यादा है. उनका कहना है कि स्थानीय नेताओं को चुन तो लिया जाता है, लेकिन असली शक्ति उनके पास नहीं होती.
गिलगित-बाल्टिस्तान में यह विवाद और भी गहरा है. दशकों तक इस क्षेत्र को सीधे इस्लामाबाद से चलाया गया. वहां के लोगों को न तो पाकिस्तान की संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला और न ही संवैधानिक अधिकार. कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी कहा गया है कि क्षेत्र से जुड़े बड़े फैसले स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना लिए जाते रहे हैं.
पंजाबाइजेशन की बहस में जनसंख्या बदलाव का मुद्दा भी अहम है. 1974 में पाकिस्तान ने ऐसे नियम खत्म कर दिए, जो बाहरी लोगों के जमीन खरीदने और बसने पर कुछ सीमाएं लगाते थे. इसके बाद पंजाब और अन्य क्षेत्रों से लोगों के आने का रास्ता खुल गया. स्थानीय समूहों का आरोप है कि इससे क्षेत्र की डेमोग्राफी बदलनी शुरू हुई.
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गिलगित-बाल्टिस्तान में सांप्रदायिक संतुलन को लेकर भी चिंताएं जताई जाती रही हैं. कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि सरकारी नीतियों और बाहरी आबादी के बसने से स्थानीय सामाजिक ढांचे पर असर पड़ा है. हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है.
असल में, पंजाबाइजेशन सिर्फ भाषा का मुद्दा नहीं है. यह सत्ता, प्रशासन, संसाधनों और पहचान से जुड़ा सवाल बन चुका है. POK में विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि उनके क्षेत्र का भविष्य तय करने वाले फैसले स्थानीय लोगों के बजाय पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता लेती है.
यही वजह है कि POK में जब भी स्वायत्तता, अधिकारों या पहचान की बात उठती है, पंजाबाइजेशन का मुद्दा फिर चर्चा में आ जाता है. समर्थक इसे प्रशासनिक व्यवस्था बताते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक नियंत्रण और जनसांख्यिकीय बदलाव की लंबी प्रक्रिया मानते हैं. फिलहाल इतना तय है कि यह बहस आने वाले समय में भी POK की राजनीति के केंद्र में बनी रहने वाली है.