पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उसे कूटनीति कहें या कुछ और, यह समझ पाना मुश्किल है. एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता का कहीं कोई नामो-निशान नहीं है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार ने पूरे शहर में ऐसा 'लॉकडाउन' लगा दिया है जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीतने की तैयारी हो. ईरान पहले ही कह चुका है कि वह पाकिस्तान की मेजबानी में किसी भी चर्चा का हिस्सा नहीं बनेगा. लेकिन शायद शहबाज सरकार को लगता है कि अगर वे राजधानी को पूरी तरह सील कर देंगे, तो बिगड़े हुए हालात खुद-ब-खुद सुधर जाएंगे. फिलहाल आलम यह है कि सुरक्षा के नाम पर लगी पाबंदियों ने आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है.
हकीकत तो यह है कि इस्लामाबाद की यह 'शांति वार्ता' शुरू होने से पहले ही बेनतीजा साबित होती दिख रही है. ईरान ने दोटूक लहजे में कह दिया है कि वह अमेरिका के साथ किसी भी मेज पर नहीं बैठने वाला. अब कायदे से तो पाकिस्तान को अपनी बिछाई हुई कुर्सियां समेट लेनी चाहिए थी, लेकिन वहां की सरकार ने तो मामला ही उलट दिया. बातचीत की मेज सजाने के बजाय उन्होंने पूरी राजधानी को 'रेड जोन' घोषित कर उसे छावनी बना दिया. यह वैसी ही बात हुई कि मुख्य मेहमान ने आने से मना कर दिया है, लेकिन मेजबान अभी भी दरवाजे पर पहरा लगाकर स्वागत की जिद पर अड़ा है.
पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक, आज यानी 20 अप्रैल को रेड जोन के सभी सरकारी दफ्तरों और मंत्रालयों पर ताले लटक रहे हैं. कर्मचारियों को 'वर्क फ्रॉम होम' थमा दिया गया है, सिर्फ दफ्तर ही नहीं, इस इलाके के स्कूलों और कॉलेजों को भी बंद कर दिया गया है. सड़कें ऐसी सूनी पड़ी हैं जैसे वहां कोई रहता ही न हो. जनता परेशान है, पर सरकार अपनी अजीब जिद पर अड़ी है.
बातचीत का ठिकाना नहीं, फिर राजधानी में पहरा क्यों?
पाकिस्तानी प्रशासन इन सख्त पाबंदियों को बचाव का तरीका बताकर अपना पल्ला झाड़ रहा है. लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि जब ईरान ने आने से ही मना कर दिया, तो फिर पूरी राजधानी को ठप करके किसे दिखाया जा रहा है? रेड जोन में भारी संख्या में जवानों को तैनात करना और कंटेनर लगाकर रास्ते रोकना पाकिस्तान की उस पुरानी आदत का हिस्सा है, जिस पर दुनिया अक्सर सवाल उठाती है. पाकिस्तान को लगा था कि इस बातचीत से दुनिया में उसकी साख बन जाएगी, पर अब हालत यह है कि मेजबान ने तो पूरी तैयारी कर ली है, लेकिन मुख्य मेहमान ही नहीं आ रहा.
बता दें कि 28 फरवरी से जारी अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग ने पूरी दुनिया की नाक में दम कर रखा है. तेल और ऊर्जा का संकट गहराता जा रहा है. पाकिस्तान को बड़ी उम्मीद थी कि वह इस जंग को रुकवाकर अपनी डूबती साख बचा लेगा, लेकिन फिलहाल उसकी यह कोशिश पूरी तरह नाकाम होती दिख रही है. एक तरफ कूटनीति के मोर्चे पर सन्नाटा पसरा है, तो दूसरी तरफ सुरक्षा के नाम पर इस्लामाबाद की जनता इन पाबंदियों के बीच पिस रही है. कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में बातचीत का तो कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन पहरा ऐसा है जैसे कोई बड़ा खतरा सिर पर हो.