अमेरिका की अगुवाई वाले सैन्य संगठन उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के एक फैसले से चीन की चिंता बढ़ गई है. खबर है कि नाटो जल्द ही जापान में अपना दफ्तर खोलने जा रहा है. यह एशिया में नाटो का पहला ऑफिस होगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस कार्यालय के जरिए नाटो को जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे प्रमुख भागीदार देशों के साथ समय-समय पर विचार-विमर्श करने में मदद मिलेगी. ये वही देश हैं, जिनके समक्ष चीन की बढ़ती ताकत से खतरा बना हुआ है.
लेकिन चीन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जियोपॉलिटिकल प्रतिस्पर्धा के लिए एशिया को अखाड़ा नहीं बनने देना चाहिए. चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि बीजिंग इसके पक्ष में नहीं है. इससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता को कमतर करेगा और इससे टकराव बढ़ेगा.
माओ ने कहा कि एशिया शांति और स्थिरता का केंद्र है. यह सहयोग एवं विकास की भूमि है, ना कि जियोपॉलिटकल प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा. उन्होंने कहा कि एशिया पैसिफिक में नाटो का विस्तार और यहां के क्षेत्रीय मामलों में उसकी दखलअंदाजी से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बाधित होगी और टकराव भी बढ़ेगा. इसलिए क्षेत्रीय देशों को इस मामले में चौकस होने की जरूरत है.
जापान के विदेश मंत्री योशइमासा हयाशी ने पहले कहा था कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नाटो के सदस्य देशों की भागीदारी का स्वागत करता है क्योंकि यहां चीन सैन्य स्तर पर काफी आक्रामक हो गया है. पिछले महीने ब्रसेल्स में नाटो के विदेश मंत्री स्तर की दो दिवसीय बैठक के दौरान हयाशी ने अस्थिर वैश्विक माहौल के बीच ट्रांस अटलांटिक गठबंधन के साथ जापान का सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी में नाटो के महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने जापान की यात्रा की थी. इस दौरान टोक्यो में प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के साथ मुलाकात में स्टोलटेनबर्ग ने जापान में नाटो कार्यालय खोलने का प्रस्ताव रखा था. इस मामले से वाकिफ एक शख्स ने बताया कि अप्रैल में नाटो ने अपने 31 सदस्यों के बीच एक मसौदा प्रस्ताव पारित करवा लिया था, जिसमें जापान में नाटो का ऑफिस खोलने पर सदस्यों की रजामंदी ली गई थी.
बता दें कि जापान, भारत का बहुत करीबी साझेदार देश है. दोनों देशों के बीच करीबी सैन्य संबंध हैं. भारत और चीन क्वाड संगठन के भी सदस्य हैं. इस संगठन को एक तरह से चीन विरोधी माना जाता है.