scorecardresearch
 

शादी के लिए मुसलमान बना, शादी टूट गई तो 'घर वापसी' की लड़ रहा जंग

मुस्लिम पत्नी से तलाक के बाद 45 साल के एक युवक ने इस्लाम को त्याग कर अपने मूल धर्म ईसाई में वापस लौटने के लिए मलेशिया के क्वालालंपुर उच्च न्यायाल में अपील दायर की थी. उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए उसकी अपील खारिज कर दी है कि सिविल अदालतों के पास शरिया अदालतों के फैसले की समीक्षा करने की कोई शक्ति नहीं है

Advertisement
X
मलेशिया का क्वालालंपुर हाई कोर्ट (फोटो-एफएमटी)
मलेशिया का क्वालालंपुर हाई कोर्ट (फोटो-एफएमटी)

दक्षिण पूर्व एशियाई देश मलेशिया में एक अनूठा मामला सामने आया है. 45 साल के एक क्रिश्चियन युवक ने 2010 में मुस्लिम धर्म अपनाकर एक मुस्लिम महिला से शादी की थी, लेकिन आठ साल पहले 2015 में दोनों के बीच तलाक हो गया. उसके बाद युवक ने फिर से क्रिश्चियन धर्म अपनाने के लिए कोर्ट में अर्जी दायर की, लेकिन कोर्ट ने उसकी अपील को खारिज कर दिया है. 

मलेशिया की एक अंग्रेजी वेबसाइट के मुताबिक, 45 साल के एक युवक ने अपनी मुस्लिम पत्नी को तलाक देने के बाद इस्लाम को त्याग कर अपने मूल धर्म ईसाई में वापस लौटने के लिए मलेशिया के कुआलालंपुर उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी. लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए उसकी अपील खारिज कर दी है कि सिविल अदालतों के पास शरिया अदालतों के फैसले की समीक्षा करने की कोई शक्ति नहीं है.

युवक ने 2010 में मुस्लिम युवती से शादी करने के लिए क्रिश्चन धर्म को त्यागकर इस्लाम धर्म अपनाया था. लेकिन 2015 में दोनों का तलाक हो गया. 

शरिया अदालत ने काउंसलिंग सेशन में हिस्सा लेना का दिया आदेश

रिपोर्ट के मुताबिक, तलाक होने के बाद युवक ने 2016 में इस्लाम धर्म छोड़ने के लिए शरिया अदालत में एक अर्जी दायर की थी. लेकिन उसे पहले काउंसलिंग सेशन में हिस्सा लेने का आदेश दिया गया. बाद में शरिया अदालत ने उसकी अपील को खारिज कर दिया और कहा कि व्यक्ति को आगे भी काउंसलिंग सेशन अटेंड करने की जरूरत है.

Advertisement

इसके बाद युवक ने शरिया अदालत के फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए सिविल अदालत की ओर रुख किया. सिविल कोर्ट में उसने मांग की कि वह अपने मूल धर्म ईसाई में वापस जाकर उस धर्म को मानने का हकदार है. और उसे इसकी अनुमति दी जाए. 

शरिया कोर्ट की ताकत सिविल कोर्ट से ज्यादा

सिविल कोर्ट के जज न्यायमूर्ति वान अहमद फरीद वान सलेह ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि सिविल अदालतें शरिया अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों की समीक्षा नहीं कर सकती हैं.

अदालत ने साल की शुरुआत में अपने द्वारा ही दिए गए एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सिविल अदालत के पास शरिया अदालत के फैसले की समीक्षा करने की कोई शक्ति नहीं है. ऐसे में शरिया अदालत के फैसले को रद्द करने, बदलने या फिर से मुकदमा दायर करने की तो बात ही नहीं है.

न्यायमूर्ति वान सलेह ने आगे कहा कि मैं न्यायालय के फैसले से बंधा हूं. शरिया अदालत के फैसले की समीक्षा नहीं की जा सकती है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement