तेल अवीव का डिजेंगॉफ स्क्वायर आमतौर पर यहूदी पर्व ‘पुरिम’ के दिन रंगों, से भर जाता है. आप इसे इजरायल की या यों कहें कि यहूदियों की 'होली' कह सकते हैं. मजेदार बात ये है कि ये त्योहार आता भी फरवरी-मार्च में लगभग उसी समय है, जब भारतीय होली मनाते हैं. अगर ये जंग का माहौल न होता तो यहां कदम रखने की भी जगह नहीं मिलती.
बच्चे और बड़े तरह-तरह के रंगीन कपड़ों में सड़कों पर उमड़ पड़ते, छतें तेज संगीत से गुलजार रहतीं और रात भर चलने वाली पार्टियों के बीच शहर सचमुच अपने एक दूसरे नाम ‘द सिटी दैट नेवर स्टॉप्स’ को सही साबित करता सा नजर आ सकता था.
अलर्ट और सायरन के बीच पसरी खामोशी
लेकिन इस बार तस्वीर इससे बिल्कुल उलट है. शनिवार को इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमला किया और तबसे हालात बदल गए. सोमवार शाम जब 'पुरिम' की शुरुआत हुई, तो डिजेंगॉफ स्क्वायर पर शांति थी. दुकानें बंद, फुटपाथ खाली और कुछ खुले कैफे में गिने-चुने लोग थे, लेकिन वे 'पुरिम' मनाने के मूड-माहौल में बिल्कुल नहीं थे. कई लोग घरों से केवल धूप देखने भर को बाहर निकले, वह भी दहशत और बदहवासी के साथ, जहां एयर रेड सायरन कीं गूंजती आवाज उन्हें फिर से अंदर जाने को मजबूर कर देती थी.

CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्क्वायर के सामने रहने वाली राइटर डैफना लुस्टिंग कहती हैं 'अगर ये नॉर्मल दिनों की तरह का टाइम होता तो यहां 'पुरिम' के माहौल के बीच चलना भी मुश्किल हो जाता.' उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके फोन पर ‘होम फ्रंट कमांड’ का अलर्ट बज उठा. कुछ ही मिनटों में पूरा इलाका खाली हो गया. शनिवार से अब तक ईरान की ओर से इज़रायल पर दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलें दागी जा चुकी हैं. हर सायरन के साथ लोग अपने-अपने शेल्टर और सुरक्षित कमरों की ओर दौड़ पड़ते हैं. कई बार अंडरग्राउंड शेल्टर में अनजान लोग एक-दूसरे के साथ घंटों गुजारते हैं.
ढाई-तीन साल से जंग का माहौल
दिलचस्प यह है कि इस बार दहशत का स्तर पहले जैसा नहीं दिखता. लुस्टिग कहती हैं, 'घबराहट जैसी कोई बात नहीं है. पिछली बार की तरह लोग अचानक डरकर उछल नहीं पड़ते. अब उन्हें पता है कि कुछ सेकंड का समय मिलता है. एक अलग तरह का डेली रुटीन बन गई है, भले ही यह ‘डेली रुटीन’ शब्द सुनने में उदास और अजीब महसूस कराए.'
दरअसल, इज़रायल के लोगों के लिए यह प्रैक्टिस अब नई नहीं रही. पिछले ढाई वर्षों से लगातार संघर्ष ने उन्हें सायरन की आवाज का आदी बना दिया है. 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले के बाद से इजरायल को गाजा से रॉकेट हमलों, लेबनान में सक्रिय हिज़्बुल्लाह से मिसाइलों, यमन के हूती विद्रोहियों और ईरान से ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइलों का सामना करना पड़ा है.
बोस्टन मूल की रॉबिन इसबर्ग, जो अपने दो दोस्तों के साथ स्क्वायर में बैठी थीं, कहती हैं, 'मुझे पिछले सभी दौरों की तुलना में इस बार ज्यादा शांति महसूस हो रही है. जून 2025 में ईरान के साथ जो संघर्ष हुआ था, वह हमारे लिए बूट कैंप जैसा था. हमें सेकंडों में तैयार रहना पड़ता था, एक बैग, पावर बैंक, स्नैक्स, पानी सब साथ रखना होता था. शायद हमने फ्लैक्सिबिलिटी डेवलप कर ली है. या फिर यह सब ‘न्यू नॉर्मल बन गया है.'
पुरिम पर लोगों का जमावड़ा, बीते दिनों की बात!
आम तौर पर पुरिम के दिन यही डिज़ेंगॉफ़ स्क्वायर लोगों से खचाखच भरा होता है. लेकिन इस बार सन्नाटा है. फिर भी, इज़रायली जनता का एक बड़ा वर्ग मिलिट्री ऑपरेशन का समर्थन करता नजर आता है. फरवरी में तेल अवीव स्थित ‘इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में 78 प्रतिशत लोगों ने ईरान को सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती बताया. सर्वे में शामिल 50.5 प्रतिशत लोगों ने यह भी कहा कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता हो जाए, तब भी इज़रायल को स्वतंत्र रूप से सैन्य कार्रवाई का अधिकार होना चाहिए.
तेहरान के साथ टकराव की आशंका कई हफ्तों से बन रही थी. जनवरी की शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के समर्थन का वादा किया था. इस बयान के बाद से क्षेत्र में तनाव बढ़ता गया. इजरायल में लोगों ने मानसिक और भौतिक, दोनों स्तरों पर खुद को तैयार करना शुरू कर दिया था.
ऑरलैंडो से दो साल पहले इजरायल आई टेलर सांचेज ने बताया कि उन्होंने पुरिम के लिए खास ड्रेस तैयार की थी. 'मैं सोच रही थी कि भले ही कोई उत्सव न हो, फिर भी उसे पहनकर बाहर निकलूं. हम जब भी संभव हो, बाहर निकलने की कोशिश करते हैं. हमें पता है कि शेल्टर कहां हैं और सुरक्षित जगहें कौन-सी हैं.'

दूसरी ओर, फ्लोरिडा मूल की सोफी लेब ने इस बार रात बिताने के लिए पास के डिज़ेंगॉफ़ सेंटर मॉल में एक टेंट लगा लिया. वह कहती हैं, 'इस बार, पिछली बारों के उलट, हमें कई हफ्तों से पता था कि यह होने वाला है. ऐसा लगता है जैसे, चलो, कम से कम अनिश्चितता खत्म हुई. लेकिन शरीर हर आवाज़ पर प्रतिक्रिया देता है. खुद को इस स्थिति का अभ्यस्त बनाना बेहद कठिन है.'
अब लोग इस युद्ध से थक गए हैं...
लगातार दो वर्षों से अधिक चले संघर्ष ने लोगों के भीतर सहनशीलता तो पैदा की है, लेकिन थकान भी बढ़ाई है. कुछ इज़रायली मानते हैं कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो सार्वजनिक असंतोष बढ़ सकता है. तेल अवीव निवासी सैन ब्लेइचर कहते हैं, 'किसी बिंदु पर लोग धैर्य खो देंगे, खासकर अगर उन्हें लगे कि हम जिन लक्ष्यों पर हमला कर रहे हैं, वे अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रहे.'
फिलहाल, कई लोग इसे ‘जरूरी युद्ध’ मान रहे हैं. ब्लेइचर कहते हैं, 'मुझे लगता है कि यह एक क्षेत्रीय अवसर है, जिसे इज़रायल को भुनाना था. अभी यह सही दिशा में बढ़ता हुआ कदम लगता है.'
डिज़ेंगॉफ़ स्क्वायर का सन्नाटा केवल एक खाली चौक की कहानी नहीं है. यह उस समाज का आईना है, जो लगातार संघर्ष के बीच भी खुद को सामान्य बनाए रखने की कोशिश कर रहा है. जहां एक ओर बच्चे पुरिम की ड्रेस पहनने का सपना देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके माता-पिता शेल्टर का रास्ता याद कर रहे हैं.
सायरन की आवाझ और त्योहार की धुन, दोनों एक साथ मौजूद हैं. फर्क बस इतना है कि इस बार संगीत की जगह चेतावनी का शोर ज्यादा तेज़ है. फिर भी, इज़रायल के लोग अपने रोजमर्रा के जीवन को थामे हुए हैं कैफे में बैठकर कॉफी पीते, दोस्तों से मिलते और धूप के छोटे-छोटे पलों को सहेजते हुए. पुरिम का संदेश बुराई पर अच्छाई की जीत का है. शायद इसी प्रतीकात्मकता में लोग अपने वर्तमान को देखने की कोशिश कर रहे हैं, यह विश्वास रखते हुए कि यह दौर भी बीत जाएगा, और डिज़ेंगॉफ़ स्क्वायर फिर कभी उसी शोर और रंगों से भर उठेगा, जैसा वह हमेशा से रहा है.