मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है. हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट तक कहा जाने लगा है. वजह सिर्फ मिसाइल और ड्रोन हमले नहीं, बल्कि वो रणनीति है जिसमें अब सीधे नागरिक बुनियादी ढांचे जैसे- पुल, बिजलीघर, पानी के प्लांट और अस्पताल को निशाना बनाया जा रहा है.
इतिहास गवाह है कि जब-जब युद्ध अपनी चरम सीमा पर होता है, तो निशाने पर सिर्फ सरहदें नहीं, बल्कि उस देश की धमनियां यानी उसके पुल, उसके बांध और उसके पावर प्लांट होते हैं. अमेरिका ने ईरान के B1 ब्रिज को जब मिट्टी में मिलाया, तो दुनिया को इतिहास के वो दो खौफनाक पन्ने याद आ गए, जब 'सिविलियन स्ट्रक्चर' को गिराकर पूरे देश की कमर तोड़ दी गई थी.
पहले और दूसरे विश्व युद्ध में डैम तक उड़ा दिए गए. शहरों को तबाह कर दिया गया. इस युद्ध में भी पुल उड़ा दिया गया. नागरिक इलाकों में हमले हो रहे हैं. विश्व युद्ध के दौरान भी बिजली घरों पर हमले हुए. अब ट्रंप भी पावर स्टेशनों को निशाना बनाकर ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी दे रहे हैं. विश्व युद्ध के दौरान भी रेलवे और अस्पतालों पर हमले हुए. अब ईरान के 20 अस्पतालों पर हमले की बात खुद WHO ने बताई है.
इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
एक फिर विश्व युद्ध जैसे हालात किस तरह बन रहे हैं, उसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है. 16 मई, 1943 में ऑपरेशन 'चैस्टाइस' के दौरान ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स के लांकेस्टर बमवर्षक विमानों ने 'बाउंसिंग बम' की तकनीक से जर्मनी के मोहने और एडर डैम को उड़ा दिया था. नतीजन 30 फीट ऊंची मौत की लहरें उठीं, 1600 लोग मारे गए, बिजली कटी और नाजी जर्मनी की वॉर मशीनरी हमेशा के लिए अपंग हो गई.
अब ईरान के पुल पर जो अमेरिका का हुआ हमला है, ठीक उसी 'सप्लाई चेन' को काटने की रणनीति का हिस्सा है. ऐसा ही वियतनाम युद्ध यानी 1972 में हुआ था. 'ऑपरेशन लाइनबैकर' के दौरान अमेरिकी लेजर-गाइडेड बमों ने थान होआ जैसे मजबूत पुलों और हनोई के हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट्स को निशाना बनाया. सैकड़ों रेलगाड़ियां और सामान ले जा रहे डिब्बे वहीं ठहर गए. तब भी मकसद वही था जो आज ईरान में है- दुश्मन को 'पाषाण युग' में धकेल देना और उसे समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर करना.
सवाल यही है क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? क्या ये हमले ईरान को सरेंडर कराएंगे या प्रतिशोध की एक नई ज्वाला भड़काएंगे? एक बार फिर ऐसा लग रहा है जैसे इस युद्ध में नैतिकता पूरी तरह मर चुकी है. ईरान के मीनाब स्कूल में 175 नन्ही बच्चियों की मौत को कौन भूल सकता है. इतिहास के पन्ने पलटें, तो ये क्रूरता नई नहीं है. ठीक 81 साल पहले, फरवरी 1945 में जर्मनी का खूबसूरत शहर ड्रेसडेन भी ऐसी ही 'टार्गेटेड तबाही' का गवाह बना था. जहां कोई बड़ा सैन्य ठिकाना नहीं था, वहां ब्रिटिश और अमेरिकी विमानों ने 4000 टन बारूद बरसाकर 'फायरस्टॉर्म' पैदा कर दिया था. 25,000 से ज्यादा लोग, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे, जलकर खाक हो गए. मकसद सिर्फ एक था मनोबल तोड़ना.
नागरिक ठिकाने भी निशाने पर
आज मीनाब स्कूल की उन 175 मासूमों की चीखें, ड्रेसडेन की उस आग की याद दिला रही हैं. तब जर्मनी को झुकाने के लिए रिहायशी इलाकों को श्मशान बनाया गया था, और आज ईरान में शिक्षा के मंदिर मलबे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं. वक्त बदला, तकनीक बदली, लेकिन मासूमों के खून से जीत लिखने की ये घिनौनी फितरत नहीं बदली. इसे 'कोलेटरल डैमेज' कहकर भुलाया नहीं जा सकता है.
जिस तरह विश्व युद्ध में पुलों और नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाया जा रहा था. उसी तरह अमेरिका ईरान के पुल, पानी और बिजली के ठिकाने नष्ट करने की धमकी दे रहा है. कल बुधवार को अमेरिका ने ईरान के सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित B1 ब्रिज को तबाह कर दिया. खुफिया सूत्रों और शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पुल का इस्तेमाल ईरानी सेना अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को पश्चिमी ईरान ले जाने के लिए कर रही थी. पश्चिमी ईरान से इजरायल की दूरी कम है और वहां से कम दूरी की मिसाइलों के हमले का प्लान था. यही वजह मानी जा रही है कि अमेरिका ने इसे 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत उड़ा दिया और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप इसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बता रहे हैं.
ट्रंप ने ईरान को फिर दी धमकी
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर उन्होंने दो बेहद सख्त पोस्ट साझा कर पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है. उन्होंने सीधे शब्दों में ईरान को चेतावनी दी है. उन्होंने लिखा, 'ईरान का सबसे बड़ा पुल ताश के पत्तों की तरह ढह गया है, अब इसका इस्तेमाल कभी नहीं हो पाएगा. ईरान के लिए अब भी समय है कि वो डील कर ले, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए और वहां कुछ भी न बचे. ईरान एक महान देश बन सकता है, लेकिन वक्त कम है!'
दूसरी पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, 'हमारी सेना, जो दुनिया में सबसे शक्तिशाली है, उसने अभी ईरान में तबाही शुरू भी नहीं की है. पहले पुल, फिर पावर प्लांट! ईरान के नए नेतृत्व को पता है कि क्या करना है, और वो भी बहुत जल्दी!' यानी ट्रंप ताकत से ईरान को सुलह के लिए झुकाना चाहते हैं जबकि वो इसके लिए तैयार नहीं है. जहां तक ईरान के इस पुल पर हमले की बात है तो ये किसी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं था. रिपोर्ट्स के अनुसार, B1 ब्रिज को निशाना बनाने के लिए बेहद सटीक और गाइडेड मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया.
खास बात ये कि पुल पर करीब एक घंटे के अंतराल में दो बार हमले किए गए. पहला हमला पुल के ढांचे को कमजोर करने के लिए था, जबकि दूसरा हमला तब हुआ जब वहां राहत कार्य और आकलन चल रहा था. इस हमले में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई है और 95 लोग घायल हुए हैं. राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से साझा किए गए वीडियो में पुल को धुआं-धुआं होते और गहरे नाले में गिरते देखा जा सकता है. ये केवल एक पुल नहीं था, बल्कि ईरान की इंजीनियरिंग शक्ति का प्रतीक था. इसकी विशेषताएं इसे मिडिल ईस्ट में सबसे अलग बनाती थीं.
ये मिडिल ईस्ट का सबसे ऊंचा पुल है जिसकी ऊंचाई 136 मीटर है, लंबाई 1,050 मीटर और लागत लगभग $400 मिलियन जो करीब 3,300 करोड़ रुपये बैठती है. तेहरान से ईरान के करज शहर को जोड़ने वाला ये पुल हाल ही में खुला था. इसके कुछ हिस्से का काम बाकी था जो चल रहा था. इस पुल के टूटने से ईरान के लिए मिसाइलों को शिफ्ट करना बेहद मुश्किल हो गया है. वहीं राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अगर कूटनीतिक समझौता नहीं हुआ तो अगला निशाना ईरान के बिजली घर हो सकते हैं. ईरान ने पुल हमले को अमेरिका का नैतिक पतन और हार करार दिया है.