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'मदर ऑफ ऑल डील्स' के करीब भारत और EU... दुनिया की एक चौथाई GDP पर होगा समझौते का असर

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दावोस शिखर सम्मेलन में मंगलवार को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसके संकेत दिए. उन्होंने दावोस शिखर सम्मेलन में कहा कि कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहते हैं, ऐसा समझौता जो 2 अरब लोगों का बाजार बनाएगा और वैश्विक GDP के करीब एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करेगा.

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दिल्ली में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  (File Photo: Reuters)
दिल्ली में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (File Photo: Reuters)

यूरोपीय संघ (EU) भारत के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच गया है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दावोस शिखर सम्मेलन में मंगलवार को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसके संकेत दिए. उन्होंने कहा कि यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए वर्षों में सबसे अहम व्यापारिक उपलब्धियों में से एक साबित हो सकता है.

अपने भाषण में व्यापारिक साझेदारियों के विविधीकरण और जोखिम कम करने पर जोर देते हुए वॉन डेर लेयेन ने कहा, “अभी कुछ काम बाकी है, लेकिन हम एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बिल्कुल करीब हैं. कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहते हैं, ऐसा समझौता जो 2 अरब लोगों का बाजार बनाएगा और वैश्विक GDP के करीब एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करेगा.”

क्यों खास है यह समझौता?

इस प्रस्तावित समझौते का दायरा बेहद विशाल है. दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत को वैश्विक व्यापार के प्रमुख स्तंभ यूरोपीय संघ से जोड़कर यह डील ऐसे समय में सप्लाई-चेन की दिशा बदल सकती है, जब सरकारें अपनी आर्थिक निर्भरताओं पर नए सिरे से विचार कर रही हैं.

EU के लिए भारत, चीन पर निर्भरता घटाने और भरोसेमंद साझेदारों के साथ व्यापार बढ़ाने की रणनीति में अहम बन चुका है. वहीं भारत के लिए 27 देशों के इस ब्लॉक तक गहरी पहुंच, जो उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगी और विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठने की उसकी महत्वाकांक्षा को मजबूती देगी.

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लंबा सफर, लेकिन नई रफ्तार

भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन लगभग एक दशक तक ठप रहने के बाद 2022 में इसे फिर से गति मिली. इसके साथ-साथ भारत-EU ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल के जरिए अहम तकनीकों, डिजिटल गवर्नेंस और सप्लाई-चेन लचीलापन जैसे मुद्दों पर भी सहयोग बढ़ा है.

इस समानांतर मंच ने संवेदनशील नियामकीय मसलों पर मतभेद कम करने में मदद की है और बातचीत को केवल टैरिफ तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक स्वरूप दिया है.

अंतिम दौर की बातचीत को क्या चला रहा है?

भू-राजनीतिक बदलावों ने दोनों पक्षों में जल्दबाजी बढ़ा दी है. ब्रसेल्स एक-देशीय निर्भरता से तेजी से बाहर निकलना चाहता है, जबकि भारत खुद को बदली हुई वैश्विक सप्लाई-चेन का केंद्रीय केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

दोनों के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है. 2023 में वस्तुओं का व्यापार 124 अरब यूरो तक पहुंचा, जबकि डिजिटल और आईटी सेवाओं के नेतृत्व में सेवाओं का व्यापार करीब 60 अरब यूरो आंका गया है. वार्ताकारों का मानना है कि औपचारिक समझौता इससे कहीं अधिक संभावनाएं खोल सकता है, खासकर स्वच्छ ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, उन्नत विनिर्माण और डिजिटल सेवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों में.

अभी बाकी हैं कई अड़चनें

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दावोस में दिखी आशावादिता के बावजूद कई बड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं. यूरोपीय वार्ताकार ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स पर गहरे टैरिफ कटौती की मांग कर रहे हैं. ये ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें भारत घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए लंबे समय से बचाता आया है. वहीं भारत कुशल पेशेवरों की आवाजाही के लिए ज्यादा अनुकूल शर्तें चाहता है, जो EU में संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि वीजा और गतिशीलता के नियम सदस्य देशों में अलग-अलग हैं.

साथ ही स्थिरता मानकों, सार्वजनिक खरीद तक पहुंच और नियामकीय सामंजस्य जैसे विषय भी खुले हैं. इन्हीं राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों के चलते वॉन डेर लेयेन ने कहा कि अभी कुछ काम बाकी है.

अब आगे क्या?

वॉन डेर लेयेन की अगले सप्ताह की शुरुआत में भारत यात्रा को निर्णायक माना जा रहा है. राजनयिकों के अनुसार, यह दौरा सबसे विवादास्पद मुद्दों को राजनीतिक स्तर पर सुलझाने का मौका दे सकता है, जिससे वार्ताकारों को समझौता अंतिम रूप देने की दिशा मिलेगी. यह यात्रा इस महीने होने वाली भारत-EU नेताओं की बैठक से पहले हो रही है, जहां दोनों पक्ष ठोस प्रगति या संभव हो तो बड़ी घोषणा दिखाना चाहते हैं.

अंतिम समझौते का मतलब क्या?

अगर यह समझौता सफल होता है तो यह हाल के वर्षों में EU की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक उपलब्धियों में से एक होगा और भारत की वैश्विक सप्लाई-चेन में भूमिका को काफी मजबूत करेगा. यह वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के प्रवाह को बढ़ाएगा, बाजार तक अधिक भरोसेमंद पहुंच देगा, तकनीक और मानकों पर सहयोग को विस्तार देगा और उस समय रणनीतिक साझेदारी का संकेत देगा जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था तेजी से बदल रही है. करीब वैश्विक GDP के एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करने वाला संयुक्त बाजार इस समझौते को दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यापारिक ढांचों में से एक बना देगा.

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