'अमेरिका फर्स्ट' के नाम पर खुद में मगन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तमीज और तहजीब की धज्जियां उड़ा दी. वैश्विक नेताओं और संस्थाओं को ऐसी चुनौतियां दीं कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हिल गई. अमेरिका संप्रुभता का उदंड प्रदर्शन करते हुए ट्रंप ने एक नहीं कई बार दुनिया के 'सरपंचों' के मुंह पर अवज्ञा, अवमानना और उपहास का 'पंच' मारा.
आठ जनवरी 2026 को ट्रंप ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में अमेरिकी सीनाजोरी की सीमा को लगभग परिभाषित करते हुए कहा, 'मुझे किसी अंतर्राष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है, मेरी शक्ति की सीमाएं केवल मेरी नैतिकता है.'
20 जनवरी 2025 को सत्ता में आने के बाद ट्रंप ने अमेरिकी विदेश नीति को मनमाने ढंग से परिभाषित करना शुरू कर दिया. ट्रंप के इन कदमों के आगे संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, जी-20 जैसी संस्थाएं अपना पसीना पोंछ रही हैं. ये संस्थाएं, जो खुद को विश्व शांति और कानून-व्यवस्था का रखवाला मानती थीं, ट्रंप 2.0 के हाथों बेनकाब या बेबस हो गईं.
राष्ट्रपति के बेडरूम में आर्मी भेजने वाला सनकी
तीन जनवरी को जब ट्रंप ने कहा कि आधी रात को एक ऑपरेशन में वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अमेरिकी सैनिकों ने उठवा लिया है तो दुनिया हैरान रह गई. गौरतलब है कि उस वक्त निकोलस मादुरो अपने बेडरूम में थे. ट्रंप ने इन दोनों नारको-टेररिज्म और ड्रग ट्रैफिकिंग का आरोप बताया.
ट्रंप ने अपने पोस्ट में कहा कि, "Last night and early today, at my direction, the United States armed forces conducted an extraordinary military operation in the capital of Venezuela."
ट्रंप ने यह नहीं बताया कि वेनेजुएला पर हमला करने का निर्देश देने का अधिकार उनको किसने दिया. इस सनकी राष्ट्राध्यक्ष ने UN से इसकी चर्चा करनी भी जरूरी नहीं समझी. न ही ट्रंप ने अपने देश की कांग्रेस को बताना जरूरी समझा कि अमेरिकी सेना वेनेजुएला पर हमला करने जा रहे हैं.
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब वेनेजुएला को चलाएगा. उन्होंने दुनिया के दारोगा की तरह घोषणा की, "हम तब तक देश चलाएंगे जब तक हम एक सुरक्षित, सही और समझदारी भरा ट्रांज़िशन नहीं कर लेते."
ट्रंप की इस घोषणा पर विश्व के दूसरे कथित सरदार जैसे रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस सिर्फ मन मसोस कर रह गए. इन देशों ने वर्ल्ड लॉ ऑर्डर को ध्वस्त करने वाले इस कदम पर कड़ी निंदा से काम चला लिया.
इन सब कामों के बाद ट्रंप ने बड़े ही दीदादिलेरी से कहा कि वेनेजुएला के तेल को दोहन अमेरिका करेगा.
टैरिफ से सबको टारगेट किया
पिछले एक साल में ट्रंप का एक और अहमकाना फैसला दुनिया के देशों पर टैरिफ लगाना रहा. इसका शिकार भारत भी हुआ. ट्रंप ने WTO के नियमों के खिलाफ जाते हुए, बहुपक्षीय व्यापार के सिद्धांतों को ठेंगा दिखाते हुए कई देशों पर भारी टैरिफ लगा दिया.
18 फरवरी को एक लंबे पोस्ट में उन्होंने एक्स पर लिखा, "ट्रेड के मामले में, मैंने निष्पक्षता के लिए यह तय किया है कि मैं रेसिप्रोकल टैरिफ लगाऊंगा, जिसका मतलब है कि जो भी देश यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका से चार्ज करेंगे, हम भी उनसे उतना ही चार्ज करेंगे - न ज़्यादा, न कम!"
अप्रैल 2025 में ट्रंप ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट के तहत सभी देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया. इससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ. ट्रंप का दावा है कि इससे अमेरिका ने अरबों डॉलर कमाए. यह फैसला WTO नियमों के खिलाफ माना जाता है, जो ट्रंप की मनमानी दिखाता है, जहां उन्होंने बहुपक्षीय व्यापार को नजरअंदाज किया.
खास बात यह है कि टैरिफ लगाने के ट्रंप के फैसले खिलाफ अमेरिका के ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है कि ये सब जायज है भी या नहीं.
गाजा में पंच भी बने, पंचायती खर्चा भी मांगा
राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रंप ने गाजा को अपनी प्राथमिकताओं की सूची में रखा था. लेकिन गाजा का पीस प्लान उनकी महात्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबा रहा. ट्रंप जनवरी 2025 से ही कहते रहे हैं कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार चाहिए.
ट्रंप ने गाजा में शांति के लिए हमास और इजरायल को तो राजी कर लिया, लेकिन यहां भी उन्होंने तगड़ी डील कर ली. ट्रंप गाजा में शांति स्थापित करने के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' का गठन किया और स्वयं उसके चेयरमैन बन बैठे. इसमें टोनी ब्लेयर जैसे नेता शामिल हैं. हद तो तब हो गई जब ट्रंप ने इस बोर्ड ऑफ पीस में दूसरे देशों को शामिल करने के लिए 1 अरब डॉलर की फीस मांगनी शुरू कर दी. उन्होंने भारत को भी ये ऑफर दिया है.
ट्रंप के प्लान में गाजा को'मॉडर्न मिरेकल सिटी' बनाना शामिल है, जो US कंपनियों को रिकंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट्स दे सकता है, और ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति से जुड़ा है. मतलब ट्रंप यहां से भी मुनाफा कमाना चाहते हैं.
ईरान पर निकाली खुन्नस
वर्ष 2025 में ईरान पर ट्रंप का हमला अंतरराष्ट्रीय कायदे कानूनों को ठेंगा दिखाने वाला एक और भड़काऊ कदम था. संयुक्त राष्ट्र चार्टर मूल रूप से इस बात पर आधारित है कि राष्ट्रों पर बल केवल तभी प्रयोग में लाया जा सकता है जब प्रत्यक्ष हमला हुआ हो या यूएन सुरक्षा परिषद की अनुमति हो.
यूएस ने ईरान पर हमला बिना स्पष्ट उकसावे की कार्रवाई के की और इसके लिए यूएन सुरक्षा परिषद से कोई मंज़ूरी नहीं ली. इस हमले को साफ तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुच्छेद 2(4) और अनुच्छेद 51 के तहत अवैध माना गया.
लेकिन चूंकि अमेरिका शक्तिशाली है इसलिए यूएन समेत दूसरे ताकतवर देश और संस्थाएं इस मसले पर चुप्पी का चादर ओढ़ी रहीं. और महज आलोचना से अमेरिका की मजम्मत कर दी.
अमेरिका ने हमला यह कहते हुए सही ठहराने की कोशिश की कि यह “आगामी खतरे” के खिलाफ किया गया लेकिन इस सिद्धांत पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कोई स्पष्ट कानूनी सहमति नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह 'आने वाले खतरे' का कॉन्सेप्ट तभी लागू होता है जब एक साफ, त्वरित और सबूत-आधारित खतरा मौजूद हो, लेकिन अमेरिका ने ऐसे किसी ठोस खतरे को सार्वजनिक नहीं किया.
जी-20 से दक्षिण अफ्रीका को जबरन बाहर किया
ट्रंप ने नवंबर 2025 में G-20 से दक्षिण अफ्रीका को बाहर करके अपनी मनमानी का परिचय दिया. दक्षिण अफ्रीका में हुए G-20 समिट का अमेरिका ने बहिष्कार किया, क्योंकि ट्रंप ने वहां गोरे किसानों पर हमलों का आरोप लगाया.
ट्रंप को लगता है कि जिस संस्थान में अमेरिका नहीं है, उसमें किसी दूसरे देश को नहीं होना चाहिए. ये दादागीरी की अमेरिकी परिभाषा है.
नवंबर 2025 में ट्रंप ने एक्स पर लिखा, "साउथ अफ्रीका ने यह साबित कर दिया है कि वह कहीं भी मेंबरशिप के लायक देश नहीं है, और हम सभी पेमेंट और सब्सिडी बंद करने जा रहे हैं."
यही नहीं ट्रंप ने 2026 में अमेरिका के मियामी में होने वाले जी-20 सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका को न्योता नहीं दिया.
WHO से पहले से ही चिढ़े थे ट्रंप
राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप का पहला बड़ा प्रहार WHO पर था. वे चुनाव के दौरान ही WHO के खिलाफ बयानबाजी कर रहे थे और इसे चाइनीज इशारे पर चलने वाला संगठन बता रहे थे. राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने WHO की रगड़ना शुरू कर दिया और आखिरकार अमेरिका को इससे बाहर कर लिया. ट्रंप ने इसके कोविड महामारी में इसकी नाकामी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि "ये संगठन चीन के इशारे पर नाचते हैं."
WHO से अमेरिका के बाहर निकलने की वजह से WHO को फंडिंग की समस्या आ गई है. WHO का सालाना बजट करीब 6-7 बिलियन डॉलर है, जिसमें अमेरिका का योगदान 400-500 मिलियन डॉलर सालाना था. लेकिन अब ये पैसा रुक गया है. इसकी वजह से WHO के प्रोग्राम्स जैसे वैक्सीन डिस्ट्रीब्यूशन, डिजीज सर्विलांस और इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रभावित हो रहे हैं. अमेरिका की अनुपस्थिति से WHO में लीडरशिप वैक्यूम पैदा हुआ, जो चीन या अन्य देशों को ज्यादा प्रभाव दे सकता है. इससे वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग कमजोर हुआ है.
इसके अलावा अब मानवीय स्वास्थ्य, जेनेटिक्स, क्लोनिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अमेरिका WHO की निगरानी से बाहर हो गया है.
बेकार, मिसमैनेज्ड बताकर 66 संगठनों से बाहर हुआ अमेरिका
जनवरी 2026 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को कई वैश्विक संस्थाओं से बाहर निकालने की बड़ी कार्रवाई की, जो उनके 'America First' एजेंडे का हिस्सा थी.7 जनवरी 2026 को ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल मेमोरेंडम साइन किया, जिसमें अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का निर्देश दिया गया. ये संगठन UN से जुड़े और गैर-UN दोनों थे, और ट्रंप प्रशासन ने इन्हें "अमेरिकी हितों के खिलाफ", "बेकार", "मिसमैनेज्ड" या "सॉवरेन्टी के लिए खतरा" बताया.
ट्रंप की फैसले की वजह से अमेरिका जिन वैश्विक संस्थाओं से बाहर हो गया उनमें पेरिस जलवायु समझौता, UN Framework Convention on Climate Change, Intergovernmental Panel on Climate Change जैसी संस्थाएं शामिल हैं.
भारत दुनिया भर में इंटरनेशनल सोलर अलायंस को लीड कर रहा था. ट्रंप ने इसी महीने इस अलायंस से बाहर आने की घोषणा कर दी.
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ये संगठन अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे बर्बाद करते हैं, "ग्लोबलिस्ट" एजेंडे को बढ़ावा देते हैं (जैसे क्लाइमेट चेंज, जेंडर इक्वालिटी), और अमेरिकी सॉवरेन्टी को कमजोर करते हैं.
ट्रंप ने वर्षों से चले आ रहे परंपराओं और प्रथाओं को झटके में खत्म करते हुए एक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर में कहा कि अमेरिका "अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौतों में America First" रखेगा, और ऐसे समझौतों से बाहर निकलेगा जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं."
अब ग्रीनलैंड पर ट्रंप की निगाहें
ट्रंप की विस्तारवादी और साम्राज्यवादी मिशन का अगला स्टॉपेज ग्रीनलैंड है. ट्रंप को ग्रीनलैंड चाहिए क्योंकि ट्रंप के मुताबिक अमेरिका की सुरक्षा के लिए उन्हें ग्रीनलैंड चाहिए. और अगर अमेरिका ग्रीनलैंड नहीं लेता है तो रूस और चीन ले लेंगे. इसलिए अमेरिका ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है. आश्चर्यजनक यह है कि चीन और रूस भी अमेरिका के इन कदमों का औपचारिक विरोध के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
स्पष्ट है कि ट्रंप का एक साल का कार्यकाल 'वैश्विक नियम आधारित व्यवस्था' के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है. उन्होंने अमेरिकी नीतियां तय करने में मनमानी की. विरोध करने वालों को टैरिफ का 'पंच' जड़ा. कई पुराने समझौतों और संस्थाओं से दूरी बनाई, कुछ पर प्रतिबंध लगाया और अमेरिका-प्रथम नीतियों का ज़ोरदार प्रचार किया.
इसका असर वैश्विक कानून, न्याय और सहयोग पर पड़ रहा है. आलोचक इसे “विश्व स्तर पर कायदे-कानून की अवहेलना” के रूप में देखते हैं.