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वार्ता सिर्फ बहाना, ईरान में ग्राउंड इनवेजन असल निशाना? रूस ने खोल दी अमेरिका की पोल

अमेरिका-ईरान के बीच चल रही बातचीत के बीच रूस ने बड़ा दावा किया है कि अमेरिका और तेल इजरायल ग्राउंड इनवेजन की तैयारी कर रहे हैं. मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सेना का भारी जमावड़ा इस आशंका को और मजबूत कर रहा है.

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अमेरिका लगातार मिडिल ईस्ट में सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है. (Photo- ITG)
अमेरिका लगातार मिडिल ईस्ट में सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है. (Photo- ITG)

मिडिल ईस्ट में इस वक्त जो कुछ हो रहा है, वो सिर्फ कूटनीति नहीं बल्कि एक बड़े सैन्य खेल का हिस्सा भी हो सकता है. एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की कोशिशें चल रही हैं, तो दूसरी तरफ रूस ने बड़ा अलर्ट जारी कर दिया है. रूस की सुरक्षा परिषद का कहना है कि ये बातचीत असल में एक "कवर" हो सकती है. यानी इसके पीछे अमेरिका का असली मकसद ईरान के खिलाफ ग्राउंड इनवेजन की तैयारी करना हो सकता है.

रूस का मानना है कि अमेरिका और इजरायल दोनों ही इस बातचीत का इस्तेमाल समय हासिल करने के लिए कर रहे हैं, ताकि जमीन पर अपनी सैन्य ताकत को मजबूत किया जा सके. यही वजह है कि पिछले कुछ हफ्तों में मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ी है.

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50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक, बड़ा जमावड़ा

रूसी रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय मिडिल ईस्ट में 50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. इनमें 11वीं एक्सपेडिशनरी कॉर्प्स के करीब 2,500 मरीन, 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 1,200 से ज्यादा सैनिक, डेल्टा फोर्स और 75वीं रेंजर रेजिमेंट जैसी एलीट यूनिट्स शामिल हैं. इनके अलावा पिछले दो दिनों में भी अमेरिका ने अतिरिक्त सैनिक मिडिल ईस्ट भेजे हैं.

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मिलिट्री एक्सरसाइज की तस्वीर. (Photo- Screengrab)

सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि हवा और समुद्र में भी अमेरिका ने अपनी ताकत बढ़ा दी है. करीब 500 एयरक्राफ्ट, जिनमें 250 से ज्यादा टैक्टिकल फाइटर जेट्स हैं, मिडिल ईस्ट के अलग-अलग एयरबेस पर तैनात हैं. इसके अलावा 20 से ज्यादा अमेरिकी युद्धपोत भी क्षेत्र में मौजूद हैं.

एयरक्राफ्ट कैरियर और मरीन फोर्स की एंट्री

हालिया सैन्य मूवमेंट्स से हालात और भी खराब होते नजर आ रहे हैं. यूएसएस बॉक्सर की अगुवाई में एक 2500 मरीन के साथ एम्फीबियस अटैक ग्रुप और यूएसएस जॉर्ज डब्ल्यू बुश एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अरब सागर की तरफ बढ़ रहे हैं. रूस का कहना है कि इनकी तैनाती का समय बेहद अहम है, क्योंकि ये उस वक्त हो रहा है जब अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर खत्म होने वाला है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ "प्रेशर टैक्टिक" है या फिर किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी?

कैसा हो सकता है ग्राउंड इनवेजन?

अगर अमेरिका सच में ग्राउंड ऑपरेशन करता है, तो ये पारंपरिक युद्ध जैसा नहीं होगा. आधुनिक युद्ध की रणनीति बदल चुकी है. अब सीधे टैंक और सैनिक भेजने के बजाय "स्मार्ट वॉरफेयर" पर जोर है. इसमें छोटे-छोटे लेकिन बेहद सटीक हमले किए जाते हैं. जैसे किसी अहम रडार सिस्टम को बंद कर देना, किसी पोर्ट की बिजली ठप कर देना, या कमांड नेटवर्क को हैक करना.

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मिलिट्री एक्सरसाइज की तस्वीर. समुद्र में तैरता आर्मर्ड व्हीकल. (Photo- Screengrab)

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इन छोटे-छोटे हमलों से दुश्मन की पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है. ईरान के लिए खार्ग आइलैंड जैसे रणनीतिक ठिकाने बेहद अहम हैं. अगर इन "चोक पॉइंट्स" पर हमला होता है, तो बिना बड़े युद्ध के ही ईरान को झुकने पर मजबूर किया जा सकता है.

ट्रंप का ट्रैक रिकॉर्ड से बढ़ा शक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रिकॉर्ड भी इस शक को मजबूत करता है. इससे पहले भी ट्रंप बातचीत के दौरान अचानक हमले कर चुके हैं. ऐसे में रूस का यह दावा पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता. ट्रंप ने खुद कहा है कि अमेरिकी सेना ईरान के पास तब तक तैनात रहेगी, जब तक तेहरान उनकी शर्तें नहीं मान लेता. इसका मतलब साफ है कि बातचीत के साथ-साथ दबाव की रणनीति भी जारी है.

मिलिट्री एक्सरसाइज की एरियल तस्वीर. शिप से बाहर निकलते सैनिक. (Photo- Screengrab)

रूस क्यों चिंतित है?

रूस और ईरान के बीच मजबूत रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं. ऐसे में अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो इसका असर सीधे रूस पर भी पड़ेगा. यही वजह है कि मॉस्को लगातार सैन्य कार्रवाई के खिलाफ चेतावनी देता रहा है और कूटनीति पर जोर देता है. रूस को डर है कि अगर यह संघर्ष बढ़ता है, तो पूरा मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की चपेट में आ सकता है, जिसका असर ग्लोबल ऑयल मार्केट और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा.

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फिलहाल हालात बेहद नाजुक हैं. एक तरफ बातचीत जारी है, दूसरी तरफ हथियारों का जमावड़ा बढ़ रहा है. यह तय करना मुश्किल है कि अमेरिका सच में शांति चाहता है या फिर यह सिर्फ एक रणनीतिक चाल है. लेकिन इतना साफ है कि आने वाले कुछ दिन बेहद अहम होंगे. अगर बातचीत सफल नहीं होती, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े युद्ध की चपेट में आ सकता है.

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