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ममता बनर्जी vs बागी MLA-MP... TMC पर किसका होगा कब्जा, क्या कहता है कानून?

तृणमूल कांग्रेस का संकट अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक लड़ाई का रूप ले चुका है. एक तरफ ममता बनर्जी का गुट है, दूसरी ओर बागी विधायक और सांसद. सवाल यह है कि असली TMC कौन है, पार्टी के सिंबल पर किसका हक होगा और क्या दल-बदल कानून बागियों को बचा पाएगा?

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दो-तिहाई का खेल या असली दल की लड़ाई, TMC संकट ने खड़े किए संवैधानिक सवाल. (File Photo: ITG)
दो-तिहाई का खेल या असली दल की लड़ाई, TMC संकट ने खड़े किए संवैधानिक सवाल. (File Photo: ITG)

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नजरिए से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम ने नई संवैधानिक बहस छेड़ दी है. ये मामला अब केवल राजनीतिक वर्चस्व का नहीं रह गया है, बल्कि संविधान, दल-बदल विरोधी कानून, पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्न पर अधिकार जैसे गंभीर सवालों तक पहुंच गया है.

सोमवार शाम तक TMC के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने घोषणा कर दी कि उन्होंने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ विलय करने का फैसला किया है. बागी सांसदों का तर्क है कि लोकसभा में TMC के दो-तिहाई से अधिक सांसद उनके साथ हैं. उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है.

इसी बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर एक अलग तस्वीर उभरकर सामने आई. यहां नए चुने गए TMC विधायक दो विरोधी गुटों में बंट गए. विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि वो असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि, सांसदों से अलग उनका गुट NCPI में विलय के पक्ष में नहीं है. 

उनका दावा सीधे पार्टी के नाम, संगठन और राजनीतिक पहचान पर है. इस पूरे घटनाक्रम ने TMC को अभूतपूर्व स्थिति में ला खड़ा किया है. फिलहाल पार्टी के भीतर तीन अलग-अलग शक्ति केंद्र दिखाई दे रहे हैं. पहला, ममता बनर्जी का गुट, जिसमें अभिषेक बनर्जी समेत पार्टी के पुराने और वफादार नेता शामिल हैं. 

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दूसरा, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी विधायक गुट, जो विधानसभा में विधायी दल पर नियंत्रण का दावा कर रहा है. TMC के नाम व चुनाव चिह्न पर भी दावा जता रहा है. तीसरा, काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाला सांसदों का गुट, जो लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के आधार पर NCPI में विलय का दावा कर रहा है. 

संविधान का सवाल

इस पूरे विवाद का केंद्र संविधान की दसवीं अनुसूची है. इसे आमतौर पर एंटी-डिफेक्शन लॉ यानी दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है. इस कानून के तहत कोई सांसद या विधायक अपनी मूल पार्टी छोड़ता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है. लेकिन पैराग्राफ 4 में विलय की स्थिति में एक अपवाद दिया गया है.

सबसे बड़ा कानूनी विवाद इसी बात को लेकर है कि क्या केवल विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय वैध माना जा सकता है, या फिर मूल राजनीतिक दल की सहमति भी जरूरी है. यही वह प्रश्न है, जिस पर देश की अदालतों में कई राय सामने आ चुके हैं. उसका अंतिम समाधान सुप्रीम कोर्ट को करना है.

दो केस में दो राय

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि केवल विधायकों के दावे के आधार पर नहीं माना जा सकता कि विलय हो गया है. अदालत के अनुसार स्पीकर को पहले यह देखना होगा कि क्या मूल राजनीतिक दल ने भी विलय की दिशा में कोई कदम उठाया था. 

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इसके विपरीत गोवा कांग्रेस दल-बदल मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के तहत विधायक दल के सदस्य खुद किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला कर सकते हैं. इस फैसले को कांग्रेस नेता गिरीश चोडनकर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. हालांकि उस विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया.

साल 2025 में नई याचिका के जरिए इस संवैधानिक प्रश्न को फिर से उठाया गया था. ये मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इस साल के अंत तक सुनवाई की संभावना है.

स्पीकर का पावर

महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट से जुड़े सुभाष देसाई मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं. कोर्ट ने कहा था कि लेजिस्लेचर पार्टी और ओरिजिनल पॉलिटिकल पार्टी दो अलग-अलग इकाइयां हैं. उसने माना था कि राजनीतिक दल अपनी स्थापित नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे से संचालित होता है.

वही विधायी दल के नेता और चीफ व्हिप जैसे पदाधिकारियों की नियुक्ति करता है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब दो विरोधी गुट खुद को एक ही राजनीतिक दल का प्रतिनिधि बताते हैं, तब स्पीकर को पहले यह तय करना होगा कि वास्तव में असली राजनीतिक दल कौन है. हालांकि, कोर्ट ने दो-तिहाई विलय नियम की अंतिम व्याख्या नहीं की थी.

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दो-तिहाई नियम 

विवाद का सबसे अहम हिस्सा दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4(2) में मौजूद डीमिंग प्रोविजन है. इसमें कहा गया है कि यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय के पक्ष में हैं, तो यह माना जा सकता है कि विलय हुआ है. लेकिन यहां बड़ा सवाल ये है कि क्या यह प्रावधान मूल राजनीतिक दल से अलग होकर लागू हो सकता है?

क्या पहले मूल राजनीतिक दल का विलय होना जरूरी है. TMC संकट ने इस संवैधानिक अस्पष्टता को और अधिक उजागर कर दिया है. यहां सांसदों का एक गुट किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा कर रहा है, जबकि विधायकों का दूसरा गुट खुद को असली TMC बता रहा है.

पार्टी की ओनरशिप

सुभाष देसाई फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करने वाले किसी भी गुट को केवल सांसदों या विधायकों का समर्थन दिखाना पर्याप्त नहीं होगा. उन्हें पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, जिला इकाइयों, राज्य इकाइयों और राष्ट्रीय कार्यकारिणी का समर्थन भी साबित करना होगा. 

इसके लिए चुनाव आयोग के समक्ष शपथपत्र और पार्टी का प्रस्ताव देना होगा. सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न का विवाद और अयोग्यता की कार्यवाही, अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, लेकिन साथ-साथ चल सकती हैं. सांसदों और विधायकों की अयोग्यता का फैसला स्पीकर या चेयरमैन करते हैं.

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एक्सपर्ट्स की राय

वहीं पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला चुनाव आयोग (ECI) करता है. लोकसभा के पूर्व महासचिव और संवैधानिक विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचार्य का कहना है कि अभी तक किसी भी गुट ने चुनाव आयोग के समक्ष खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करने की औपचारिक मांग नहीं की है.

आचार्य के अनुसार शिवसेना विवाद अलग था, क्योंकि वहां शिंदे गुट ने सीधे चुनाव आयोग के सामने पार्टी पर स्वामित्व का दावा किया था. लेकिन यहां बागी सांसद फिलहाल केवल स्पीकर के पास अलग बैठने की मांग लेकर गए हैं. उन्होंने कहा कि स्पीकर मूल दल के विलय के किसी समूह को मान्यता नहीं दे सकते.

उनका ये भी कहना है कि केवल दो-तिहाई सांसदों या विधायकों का किसी दूसरी पार्टी में जाने का फैसला उन्हें स्वतः पैराग्राफ 4 के तहत संरक्षण नहीं देता. छूट तभी मिलेगी, जब मूल राजनीतिक दल भी दूसरी पार्टी में विलय कर चुका हो और दो-तिहाई विधायक या सांसद उस विलय का समर्थन करें.

सीनियर एडवोकेट निजाम पाशा का भी मानना है कि महाराष्ट्र मामले के बाद कानूनी स्थिति यह संकेत देती है कि विलय का दावा करने वाले गुट को दोहरी शर्त पूरी करनी होगी. उसे दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन भी दिखाना होगा. मूल दल का प्रतिनिधित्व करने का वैध दावा भी साबित करना होगा.

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कई मोर्चों पर लड़ाई

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि 10वीं अनुसूची का उद्देश्य दल-बदल के संवैधानिक पाप को हतोत्साहित करना और दंडित करना है. TMC का मौजूदा संकट इसी सिद्धांत की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है. एक तरफ विलय का दावा है, दूसरी तरफ असली पार्टी होने का दावा. 

ऐसे में यह विवाद अब पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर, लोकसभा स्पीकर, चुनाव आयोग और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता दिखाई दे रहा है. जब तक अदालतें यह स्पष्ट नहीं कर देतीं कि 10वीं अनुसूची के तहत विधायी दल और मूल दल के बीच संबंधों की संवैधानिक स्थिति क्या है, तब तक TMC का संकट बहस के केंद्र में बना रहेगा.

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