बकरीद (Eid-ul-Adha) आने वाली है. 27 या 28 मई को यह त्योहार मनाया जाएगा. लेकिन पश्चिम बंगाल में इस बार जानवरों की कुर्बानी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. TMC की सांसद माहुआ मोइत्रा समेत कई लोग कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे. मांग थी कि गाय-भैंस की कुर्बानी की इजाजत दी जाए. कोर्ट ने गुरुवार को यह मामला सुना और एक बड़ा फैसला सुनाया.
TMC सांसद महुआ मोइत्रा और पार्टी MLA अखरुज्जमान ने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. इन्होंने पशु वध अधिनियम की धारा 12 के तहत छूट मांगी, यानी सिर्फ इस साल बकरीद के लिए खास रियायत दी जाए.
महुआ मोइत्रा ने कोर्ट के बाहर कहा कि यह सिर्फ मुस्लिम समुदाय का मुद्दा नहीं है. कई हिंदू व्यापारी भी बकरीद पर जानवर बेचकर अपना घर चलाते हैं. उन्होंने कहा कि हम सिर्फ भैंस या बैल की कुर्बानी की इजाजत मांग रहे हैं, गाय की नहीं.
याचिकाकर्ताओं के वकील शादान फरासत ने कोर्ट में दलील दी कि यह कानून धार्मिक कुर्बानी के खिलाफ है. उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही गाय पर रोक लगाई हो, लेकिन भैंस, बैल और बछड़ों पर ऐसी कोई रोक नहीं है.
कोर्ट में क्या हुआ?
गुरुवार यानी 21 मई को कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सुजॉय पाल और जस्टिस पार्था सारथी सेन शामिल थे, ने सभी पक्षों को सुना और फैसला सुरक्षित रख लिया.
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कोर्ट ने तीन बड़ी बातें कहीं. पहली बात - कोर्ट ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक किसी भी खुली या सार्वजनिक जगह पर गाय और भैंस समेत किसी भी जानवर को काटना पूरी तरह मना है.
दूसरी बात - कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला दिया. 1975 में मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम में जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है.
तीसरी बात - कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 24 घंटे के अंदर यह तय करे कि क्या पशु वध अधिनियम 1950 की धारा 12 के तहत कोई छूट दी जा सकती है या नहीं.
तो क्या मिली राहत?
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कोई तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि पशु वध अधिनियम 1950 एक 76 साल पुराना कानून है. जब तक इसे असंवैधानिक घोषित न किया जाए, इसकी वैधता बनी रहती है. इसलिए अभी कोई अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती.
साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह यह जांचे कि कुर्बानी के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, यानी बंद जगहें और सर्टिफिकेट देने की व्यवस्था, मौजूद है या नहीं.
पंचायत इलाकों में कानून लागू नहीं?
याचिकाकर्ता के वकील शमीम अहमद ने कोर्ट में दावा किया कि यह कानून पंचायत इलाकों में ठीक से लागू ही नहीं हुआ है. यानी गांव-देहात में दशकों से यह कानून नजरअंदाज होता रहा है.