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भाई की 'अंतिम इच्छा' और सड़कों पर एम्बुलेंस का सैलाब: उन्नाव में ऐसी शव यात्रा देख रो पड़े लोग

उन्नाव के पूरन नगर में एक छोटे भाई ने अपने बड़े भाई से किया वादा मौत के बाद कुछ इस तरह निभाया कि पूरा शहर दंग रह गया. लीवर की बीमारी से हारे कमलेश की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 16 एम्बुलेंस सायरन बजाते हुए उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुईं.

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उन्नाव में शव यात्रा में शामिल हुईं दर्जनों एम्बुलेंस (Photo- Screengrab)
उन्नाव में शव यात्रा में शामिल हुईं दर्जनों एम्बुलेंस (Photo- Screengrab)

Uttar Pradesh News: उन्नाव के सदर कोतवाली क्षेत्र के पूरन नगर निवासी राजमिस्त्री कमलेश कुमार लंबे समय से लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे. उनके छोटे भाई विमलेश, जो पेशे से एम्बुलेंस चालक हैं, उनका इलाज करवा रहे थे. बीमार कमलेश ने अंतिम समय में विमलेश से अपनी शव यात्रा कई एम्बुलेंस के साथ सायरन बजाते हुए निकालने की इच्छा जताई थी. शनिवार को कमलेश की मृत्यु के बाद रविवार दोपहर 2 बजे विमलेश ने अपने एम्बुलेंस चालक साथियों को बुलाकर 16 एम्बुलेंस के साथ यह यात्रा निकाली. यह अनोखी शव यात्रा शहर से होते हुए शुक्लागंज के मिश्रा कॉलोनी श्मशान घाट तक पहुंची.

बीमारी से जंग और भाई का अटूट प्रेम

कमलेश अपने तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर थे. छोटा भाई विमलेश न केवल उनका इलाज करा रहा था, बल्कि अपनी प्राइवेट एम्बुलेंस से उन्हें अस्पताल ले जाता था. विमलेश ने भाई को बचाने के लिए अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

बड़े भाई के प्रति विमलेश का यह समर्पण देख हर कोई भावुक है. मृतक की पत्नी सरला और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है, लेकिन भाई के इस प्रेम ने मिसाल पेश की है. मामला इलाके में चर्चा का विषय बन गया है. 

जब सायरन सुनकर सहम गया पूरा शहर

रविवार को जब एक साथ 16 एम्बुलेंस सायरन बजाती हुई सड़कों पर निकलीं, तो स्थानीय लोग किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से सहम गए. सड़कों पर मजमा लग गया और लोग घबराहट में पूछने लगे कि आखिर क्या हुआ है. हालांकि, जैसे ही लोगों को पता चला कि यह किसी हादसे की सूचना नहीं, बल्कि एक छोटे भाई द्वारा अपने बड़े भाई की 'अंतिम इच्छा' पूरी करने का तरीका है, तो देखने वालों की आंखें नम हो गईं.

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साथी चालकों ने दिया दोस्ती का सबूत

विमलेश के बुलावे पर उनके साथी एम्बुलेंस चालक तुरंत मदद के लिए आगे आए. उन्होंने न केवल अपनी गाड़ियां दीं, बल्कि पूरे सम्मान के साथ श्मशान घाट तक साथ चले. विमलेश ने बताया कि भाई की इच्छा उनके लिए सर्वोपरि थी. भले ही वह भाई को बीमारी से नहीं बचा सके, लेकिन उनके अंतिम सफर को वैसा ही यादगार बनाया जैसा बड़े भाई ने चाहा था. 

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