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आंखों देखी: पोस्टमार्टम हाउस, नम आंखें और अनगिनत सवाल... प्रतीक की मौत के बाद कुछ ऐसा था KGMU का मंजर

लखनऊ के केजीएमयू पोस्टमार्टम हाउस में प्रतीक यादव की मौत के बाद पूरा माहौल गम, सन्नाटा और बेचैनी से भरा रहा. परिवार और करीबी लोग टूटे हुए नजर आए, जबकि बाहर मीडिया और सुरक्षा के बीच लगातार हलचल बनी रही. हर किसी के चेहरे पर एक ही सवाल था कि आखिर प्रतीक यादव के साथ ऐसा कैसे हो गया?

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प्रतीक यादव की मौत के बाद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर पुलिस सुरक्षा (Photo: ITG)
प्रतीक यादव की मौत के बाद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर पुलिस सुरक्षा (Photo: ITG)

प्रतीक यादव की मौत की खबर  एक पल के लिए यकीन करना मुश्किल था. राजनीति और सामाजिक हलकों में हमेशा सक्रिय रहने वाले प्रतीक यादव अब इस दुनिया में नहीं रहे. ये बात खुद मेरे लिए भी बेहद भारी थी. मैंने तुरंत अपर्णा यादव को फोन किया. मैंने तुरंत अपर्णा यादव को फोन किया. दूसरी तरफ से टूटी हुई आवाज आई, 'हां, बात सच है.' बस इतना सुनते ही मैं सीधे उनके आवास की तरफ निकल पड़ा. वहां पता चला कि डॉक्टरों ने पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. इसके बाद मैं सीधे केजीएमयू लखनऊ के पोस्टमार्टम हाउस पहुंचा.

पोस्टमार्टम हाउस के अंदर का माहौल बिल्कुल अलग था, सन्नाटा, बेचैनी और आंखों में तैरता दर्द. सुबह के वक्त वहां सबसे पहले मेरी नजर अमन बिष्ट पर पड़ी, जो अपर्णा के भाई हैं. उनके साथ अपर्णा यादव के पिता अरविंद सिंह और परिवार के करीबी हिमांशु समेत कुछ रिश्तेदार मौजूद थे. सभी लोग पोस्टमार्टम हाउस के अंदर फर्श से लगी पत्थर की सीटों पर चुपचाप बैठे थे. आंखें लाल थीं, चेहरों पर रातभर की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी. मेरी इन लोगों से पहले भी मुलाकात होती रही है, इसलिए मैंने बात करने की कोशिश की, लेकिन जवाब में सिर्फ खामोशी मिली. किसी के पास शब्द नहीं थे.

थोड़ी ही देर में पुलिस का भारी फोर्स वहां पहुंच गया. पूरे पोस्टमार्टम हाउस को बैरिकेडिंग कर घेर लिया गया. अंदर डॉक्टरों की टीम तैयार की जा रही थी. तीन वरिष्ठ डॉक्टरों की निगरानी में पांच सदस्यीय टीम बनाई गई और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू हुई. बाहर मीडिया का जमावड़ा लगातार बढ़ता जा रहा था. कैमरे, लाइव यूनिट, रिपोर्टर, हर कोई एक अपडेट के इंतजार में था. जो भी शख्स पोस्टमार्टम हाउस के अंदर आता, मीडिया तुरंत उसे घेर लेती. अंदर एक परिवार अपने सबसे करीबी सदस्य को खोने के दर्द में टूटा हुआ था और बाहर पूरे प्रदेश की नजरें उसी बिल्डिंग पर टिकी थीं.

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इसी बीच समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और बीजेपी के नेता भी पहुंचने लगे. क्योंकि यादव परिवार का राजनीतिक और सामाजिक दायरा बेहद बड़ा है, इसलिए हर दल के लोग वहां शोक जताने आ रहे थे. समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मामले की गहन जांच की मांग की, वहीं बीजेपी विधायक भी पहुंचे और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की. लगातार नेताओं का आना-जाना जारी था. पोस्टमार्टम हाउस अब सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया की जगह नहीं रह गया था, बल्कि प्रदेश की राजनीति और संवेदनाओं का केंद्र बन चुका था.

इसी दौरान अचानक पुलिस अलर्ट मोड में आ गई. सूचना मिली कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पोस्टमार्टम हाउस पहुंचने वाले हैं. पुलिस ने तुरंत मीडिया को पीछे किया और रास्ता खाली कराया. कुछ ही मिनटों बाद अखिलेश यादव वहां पहुंचे. उन्होंने हाथ जोड़कर मौजूद लोगों का अभिवादन किया और सीधे डॉक्टरों के कमरे में चले गए. करीब 15 मिनट तक उन्होंने डॉक्टरों से पूरी स्थिति समझी. बाहर निकलने के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि दो महीने पहले ही उनकी प्रतीक यादव से मुलाकात हुई थी और उन्होंने उन्हें अपने स्वास्थ्य और बिजनेस पर ध्यान देने की सलाह दी थी. उन्होंने यह भी कहा कि 'जब बिजनेस में नुकसान होता है तो इंसान मानसिक दबाव में आ जाता है'. जांच के सवाल पर उनका जवाब था कि 'परिवार जैसा चाहेगा, कानून उसी हिसाब से आगे बढ़ेगा.'

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अखिलेश यादव के जाने के बाद भी पोस्टमार्टम हाउस में लोगों का आना-जाना जारी रहा. लखनऊ की मेयर, विधायक, समाजवादी पार्टी के पदाधिकारी और कई करीबी लोग परिवार के साथ खड़े नजर आए. बाहर कार्यकर्ताओं की भीड़ थी, अंदर परिवार का दर्द. हर कोई एक ही सवाल कर रहा था 'आखिर ऐसा कैसे हो गया?' कई लोग अब भी इस खबर पर यकीन नहीं कर पा रहे थे.

समय धीरे-धीरे बीत रहा था और हर किसी की नजर इस बात पर थी कि पार्थिव शरीर कब आवास के लिए रवाना होगा. इस बीच मुझे अधिकारियों से जानकारी मिली कि अपर्णा यादव असम से लौट रही हैं और उनके आने के बाद ही शरीर को घर ले जाया जाएगा. दोपहर करीब दो बजे अपर्णा यादव लखनऊ पहुंचीं. उनके पहुंचते ही सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई. मेडिकल कॉलेज की एंबुलेंस में प्रतीक यादव के पार्थिव शरीर को रखा गया और फिर विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास के लिए रवाना किया गया.

उस वक्त पोस्टमार्टम हाउस के बाहर खड़े होकर मैं सिर्फ कैमरे से तस्वीरें नहीं देख रहा था. मैं उस दर्द को महसूस कर रहा था जो एक परिवार की आंखों में था. राजनीति, सुरक्षा, मीडिया, बयान, इन सबके बीच सबसे ज्यादा भारी अगर कुछ था, तो वो था एक परिवार का टूट जाना. वहीं दूसरी तरफ डॉक्टरों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सीएमओ कार्यालय और वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी गई थी, जबकि विसरा सुरक्षित रख लिया गया था. लेकिन उस दिन वहां मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर सिर्फ एक ही सवाल था कि क्या सच कभी पूरी तरह सामने आ पाएगा?
 

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