उत्तर प्रदेश की एक खबर ने हड़कंप मचा दिया है, राजधानी लखनऊ में एक मामूली विवाद में पुलिस ने एक शख्स मोहित पांडेय को हिरासत में लिया था. रात में 11 बजे पुलिस ने आरोपी को उठाया, और रात डेढ़ बजे जानकारी सामने आई कि उसकी तबीयत खराब हो गई थी, इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत हो गई, अब पुलिस की हिरासत में हुई इस मौत पर हंगामा मचा हुआ है. आरोप लग रहे हैं कि पुलिस की पिटाई के चलते युवक की जान गई है. ये मामला लखनऊ के चिनहट थाने का है. इस घटना के बाद युवक के परिवार का आरोप है कि चिनहट थाने के पुलिसवालों ने मोहित को इतना पीटा कि उसकी जान चली गई.
बता दें कि आदेश नाम के शख्स से मोहित का बहुत छोटा सा विवाद हुआ था, आरोप है कि आदेश के चाचा स्थानीय नेता हैं, इसलिए पुलिस ने दबाव में मोहित को हिरासत में ले लिया. मोहित से मिलने जब उसका भाई शोभाराम थाने पहुंचा तो उसे भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने मोहित को रात 11 बजे उठाया, लेकिन उठाने का समय रात के डेढ़ बजे लिखा. 11 बजे से डेढ़ बजे के बीच मोहित के साथ क्या हुआ, मालूम नहीं?
मगर रात के डेढ़ बजे की जो सीसीटीवी तस्वीरें सामने आई हैं, उसमें मोहित की तबीयत बिगड़ी हुई दिख रही है, बताया जा रहा है कि मोहित को लोहिया अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी जान चली गई.
घरवालों ने लगाए ये आरोप
घरवालों का आरोप है कि पुलिस ने मोहित को बहुत पीटा और फिर पीछे के रास्ते से परिजनों को बगैर बताए अस्पताल ले गई. पूरे परिवार ने मोहित की मौत की खबर सुनी तो सन्न रह गए. किसी ने सोचा भी नही होगा कि मामूली विवाद में पुलिस की हिरासत में मोहित की मौत हो जाएगी.
थाने के इंचार्ज पर एक्शन
इस पूरे मामले में थाने के इंचार्ज अश्विनी कुमार के खिलाफ धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया गया, इसके बाद उन्हें हटा दिया गया है, अब सब इंस्पेक्टर भरत कुमार पाठक को थाने का चार्ज दिया गया है.
क्या है परिवार की मांग?
इस घटना के बाद मोहित के परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है. परिवार मांग कर रहा है कि आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो. परिवार को भरण पोषण के लिए 50 लाख का मुआवजा मिले. मोहित की पत्नी को सरकारी नौकरी मिले. घटना की सीबीआई जांच हो.
पहले भी लगे हैं यूपी पुलिस के माथे पर ये दाग
यूपी पुलिस का स्लोगन है- सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा... लेकिन मालूम नहीं ये कैसी सुरक्षा है और कैसा संकल्प है कि हिरासत में आदमी की मौत हो जाती है. बता दें कि यूपी पुलिस के माथे पर ये दाग पहली बार नहीं लगा है और जिस तरह के हालात हैं, वैसे लगता नहीं कि आखिरी बार है.
कस्टोडियल डेथ के आंकड़े
ऐसा पहली बार नहीं है, जब यूपी पुलिस की कस्टडी में किसी की जान गई हो. साल 2018 से 2019 के बीच 12 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई थी. 2019 से 2020 के बीच 3 लोगों की जान पुलिस हिरासत में गई. 2020 से 2021 के बीच 8 लोगों ने पुलिस कस्टडी में दम तोड़ा. 2021 से 2022 के बीच भी पुलिस कस्टडी में 8 लोगों की जान गई. 2022 से 2023 के बीच 10 लोगों की जान पुलिस कस्टडी में गई. बात अगर इसी साल यानी 2024 की करें, तो अबतक 4 से ज्यादा लोगों की जान पुलिस हिरासत में जा चुकी है. अब कस्टडी में होने वाली इन मौतों पर यूपी की सियासत सुलग रही है, सरकार को घेरा जा रहा है.
पुलिस कस्टडी में मौत पर सियासी पारा हाई
पुलिस कस्टडी में मौत को लेकर सियासत गरम है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने X पर पोस्ट में कहा कि उप्र की राजधानी में पिछले 16 दिनों में पुलिस 'हिरासत में मौत (हत्या पढ़ा जाए)' का दूसरा समाचार मिला है. नाम बदलने में माहिर सरकार को अब 'पुलिस हिरासत' का नाम बदलकर 'अत्याचार गृह' रख देना चाहिए. पीड़ित परिवार की हर मांग पूरी की जाए, हम उनके साथ हैं.
प्रियंका गांधी ने साधा निशाना
वहीं, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने कहा कि लखनऊ में पुलिस ने दो युवकों को हिरासत में लिया और अगली सुबह एक की मौत हो गई. एक पखवाड़े में यूपी पुलिस की हिरासत में यह दूसरी मौत है. परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उनके बेटे की हत्या कर दी. यूपी, हिरासत में होने वाली मौतों के मामले में पूरे देश में पहले स्थान पर है. प्रदेश में भाजपा ने ऐसा जंगलराज कायम किया है, जहां पुलिस क्रूरता का पर्याय बन चुकी है. जहां कानून के रखवाले ही जान ले रहे हों, वहां जनता न्याय की उम्मीद किससे करें?