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अलीगढ़ में सरकारी स्कूल के बच्चों का कमाल, ‘यूएफ-22 रैप्टर’ जैसा उड़ने वाला मॉडल बनाकर चौंकाया

अलीगढ़ के एक सरकारी स्कूल के बच्चों ने सीमित संसाधनों में ‘यूएफ-22 रैप्टर’ जैसा उड़ने वाला एयरक्राफ्ट मॉडल तैयार कर सबको चौंका दिया. कक्षा 4 से 8 तक के पांच छात्रों ने टीचर के नेतृत्व में करीब 6 हजार रुपये में यह प्रोजेक्ट बनाया. साधारण सामग्री से तैयार इस मॉडल ने सरकारी स्कूलों की क्षमता और बच्चों की प्रतिभा को नई पहचान दी.

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, ‘यूएफ-22 रैप्टर’ जैसा उड़ने वाले मॉडल के साथ बच्चे व टीचर (Photo ITG)
, ‘यूएफ-22 रैप्टर’ जैसा उड़ने वाले मॉडल के साथ बच्चे व टीचर (Photo ITG)

सरकारी स्कूलों की चर्चा अक्सर सीमित संसाधनों और सुविधाओं की कमी को लेकर होती है, लेकिन अलीगढ़ के एक छोटे से गांव के बच्चों ने इस धारणा को बदलने की कोशिश की है. ब्लॉक अकराबाद के भिलावली गांव स्थित एक प्राइमरी स्कूल के छात्रों ने ऐसा काम कर दिखाया है, जिसने न सिर्फ इलाके बल्कि पूरे जिले में उत्सुकता और गर्व का माहौल बना दिया है. सोशल मीडिया पर ये बच्चे छाए हुए हैं. यहां पढ़ने वाले बच्चों ने असली फाइटर जेट की तर्ज पर एक उड़ने वाला मॉडल तैयार किया है, जिसे ‘यूएफ-22 रैप्टर’ से प्रेरित बताया जा रहा है. खास बात यह है कि यह मॉडल किसी बड़े संस्थान या आधुनिक लैब में नहीं, बल्कि एक साधारण सरकारी स्कूल के माहौल में तैयार हुआ है.

छोटी टीम, बड़ा सपना

इस अनोखे प्रोजेक्ट के पीछे कक्षा 4 से 8 तक के पांच छात्रों की एक टीम है. इसमें कक्षा 8 की प्रांशी कुमारी, आशी और हृदेश कुमार, कक्षा 7 की रंजना कुमारी और कक्षा 4 के कार्तिक शर्मा शामिल हैं. इन बच्चों ने मिलकर अपने स्कूल में ही इस मॉडल को तैयार किया. उनके लिए यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सीखने और कुछ नया करने का अवसर था. बच्चों की उम्र भले कम हो, लेकिन उनके विचार और उत्साह ने इस काम को खास बना दिया.

शिक्षक बने मार्गदर्शक

इस पूरे प्रयास में स्कूल में तैनात सहायक शिक्षक आशीष कुमार की भूमिका अहम रही. उन्होंने बच्चों को विज्ञान के बुनियादी सिद्धांत समझाए और उन्हें प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया. आशीष कुमार बताते हैं कि बच्चों में जिज्ञासा पहले से थी, बस उसे सही दिशा देने की जरूरत थी. जब बच्चों को समझ आया कि चीजें कैसे काम करती हैं, तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर इसे बनाने की ठानी. 

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सीमित साधन, बड़ा परिणाम

इस मॉडल को तैयार करने में करीब 6 हजार रुपये का खर्च आया. इसमें लकड़ी, थर्माकोल और अन्य सामान्य सामग्री का इस्तेमाल किया गया. बच्चों ने उपलब्ध संसाधनों के भीतर रहकर डिजाइन तैयार किया और धीरे-धीरे उसे आकार दिया. किसी महंगे उपकरण या तकनीक के बिना, सिर्फ समझ और मेहनत के आधार पर इस मॉडल को तैयार करना ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है.

कैसे तैयार हुआ ‘रैप्टर’ मॉडल

बच्चों ने पहले फाइटर जेट की बनावट और उसके काम करने के तरीके को समझा. इसके बाद उन्होंने उसका एक सरल मॉडल डिजाइन किया, जिसे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से बनाया जा सके. डिजाइन तैयार करने के बाद टीम ने हिस्सों को अलग-अलग बनाया और फिर उन्हें जोड़कर पूरा ढांचा तैयार किया. इस दौरान कई बार मॉडल को ठीक करना पड़ा, लेकिन बच्चों ने हार नहीं मानी और लगातार सुधार करते रहे. स्कूल परिसर में जब इस मॉडल को पहली बार उड़ाने की कोशिश की गई, तो सभी की निगाहें उसी पर टिकी थीं. बच्चों की मेहनत उस समय सफल होती नजर आई, जब मॉडल ने हवा में संतुलन बनाते हुए उड़ान भरी. यह पल बच्चों के लिए खास था, क्योंकि उन्होंने जो सोचा था, वह हकीकत में बदलता दिखा.

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स्कूल और गांव में खुशी का माहौल

इस उपलब्धि के बाद स्कूल में उत्साह का माहौल है. शिक्षक और छात्र दोनों इस सफलता को लेकर गर्व महसूस कर रहे हैं. स्थानीय लोग भी बच्चों की इस उपलब्धि की सराहना कर रहे हैं. गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने पहली बार किसी सरकारी स्कूल के बच्चों को इस तरह का काम करते देखा है. यह सिर्फ एक मॉडल नहीं, बल्कि बच्चों की क्षमता का उदाहरण बन गया है. जैसे ही इस उपलब्धि की जानकारी शिक्षा विभाग तक पहुंची, अधिकारियों ने भी बच्चों की तारीफ की. उनका कहना है कि ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि अन्य स्कूलों के बच्चे भी प्रेरित हो सकें. उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में इन छात्रों को और बेहतर संसाधन और मंच मिलेंगे.

 

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