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मंडप सजा था, कुछ ही घंटों में चिता भी सज गई… अलीगढ़ के इस गांव की वो रात जिसने सबको रुला दिया

अलीगढ़ के गांव बेरमगंज में एक मार्मिक घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया. दो बेटियों का कन्यादान करने वाले पिता ने कुछ ही घंटों बाद दम तोड़ दिया. ससुराल पहुंच चुकी बेटियां पिता के निधन की खबर सुनकर वापस मायके लौटीं और उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुईं. खुशी से सजा घर देखते ही देखते शोक में डूब गया.

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बेटियों की डोली विदा करते ही पिता की मौत हो गई (Photo: ITG)
बेटियों की डोली विदा करते ही पिता की मौत हो गई (Photo: ITG)

अलीगढ़ जिले के टप्पल क्षेत्र का छोटा सा गांव बेरमगंज रोशनी, रौनक और रिश्तों की गर्माहट से भरा हुआ था. घर के आंगन में झालरें टंगी थीं, दरवाजे पर बारातियों की चहल-पहल थी और रसोई से पकवानों की खुशबू उठ रही थी. उस घर में दो बेटियों की शादी थी एक साथ, एक ही दिन, एक ही मंडप में. पिता ने वर्षों से जिस पल की तैयारी की थी, वह सामने था. नम आंखों के साथ उन्होंने दोनों बेटियों का हाथ वरों के हाथ में सौंपा. मंत्रों के बीच, अग्नि की साक्षी में, उन्होंने कन्यादान किया. विदाई के समय आंखें भर आईं, लेकिन चेहरे पर संतोष था एक जिम्मेदारी पूरी होने का संतोष. किसी ने नहीं सोचा था कि यही उनकी बेटियों के साथ आखिरी मुलाकात होगी.

कुछ घंटों में सब बदल गया

देर रात, जब बारात विदा हो चुकी थी और घर वाले थकान के बीच राहत की सांस ले रहे थे, तभी अचानक पिता की तबीयत बिगड़ने लगी. पहले हल्की घबराहट समझी गई, फिर स्थिति गंभीर होती चली गई. परिजन उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी में जुटे, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया. शादी के गीतों से गूंजता आंगन अचानक सन्नाटे में बदल गया. जिस घर में कुछ घंटे पहले शहनाई बज रही थी, वहां अब रोने की आवाजें थीं. रिश्तेदार, पड़ोसी और गांव के लोग स्तब्ध थे. खुशी इतनी जल्दी गम में कैसे बदल सकती है ?

ससुराल से मायके तक का दर्दनाक सफर

सबसे मार्मिक क्षण तब आया जब ससुराल पहुंच चुकी दोनों बेटियों को पिता के निधन की सूचना मिली. वे अभी अपने नए घर में कदम ही रख पाई थीं. शादी की थकान, नए रिश्तों की झिझक और भविष्य के सपनों के बीच अचानक यह खबर वज्रपात की तरह गिरी. दोनों बेटियां बिना देर किए वापस मायके लौटीं. जिस दहलीज से वे कुछ घंटों पहले विदा हुई थीं, उसी दहलीज पर लौटते समय हालात बिल्कुल अलग थे. उस समय उनके हाथों में मेहंदी थी, अब आंखों में आंसू थे. उस समय पिता ने उन्हें विदा किया था, अब वे पिता को अंतिम विदाई देने आई थीं. श्मशान घाट पर जब अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही थी, तब गांव के लोगों की आंखें भी नम थीं. बेटियां बार-बार पिता के पार्थिव शरीर को देख रही थीं. जैसे यकीन ही नहीं हो रहा हो कि यह वही हाथ हैं, जिन्होंने कुछ घंटों पहले सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया था.

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जिम्मेदारी निभाकर गए

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पिता पिछले कई महीनों से बेटियों की शादी की तैयारियों में लगे हुए थे. रिश्तों की बात, इंतजाम, मेहमानों की सूची, हर छोटी-बड़ी बात पर उनकी नजर रहती थी. वे चाहते थे कि बेटियों की शादी में कोई कमी न रह जाए. रविवार को जब कन्यादान हुआ, तो उन्होंने संतोष की सांस ली थी. कई लोगों ने उन्हें भावुक होते देखा. शायद मन में कहीं थकान भी थी, शायद जिम्मेदारी पूरी होने का भार भी उतर रहा था. लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि यह जिम्मेदारी निभाने के बाद वे खुद इस दुनिया से विदा हो जाएंगे.

गांव में पसरा सन्नाटा

बेरमगंज गांव में इस घटना के बाद गहरा सन्नाटा छा गया. जिन घरों में शादी की मिठाइयां बांटी जा रही थीं, वहीं अब लोग सांत्वना देने पहुंच रहे हैं. महिलाएं बेटियों को ढांढस बंधा रही हैं, पुरुष परिवार के साथ खड़े हैं. एक बुजुर्ग ने कहा, भगवान ने उन्हें बेटियों का फर्ज निभाने का मौका दिया, लेकिन उनकी खुशहाल जिंदगी देखने का वक्त नहीं दिया. यह वाक्य सुनते ही कई आंखें भर आईं.

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