कहते हैं कि भारत का वर्किंग कल्चर कई बार इंसान को सिर्फ टारगेट, डेडलाइन और मुनाफे तक सीमित कर देता है. वर्कप्लेस ऐसी जगह बन जाती है, जहां नैतिकता और संवेदनशीलता धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती है. इन बातों को सच साबित करती एक वायरल होती कहानी सामने आई है, जो भारतीय कॉरपोरेट कल्चर की सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के उजागर कर देती है.
मामला भारत के एक निजी बैंक से जुड़ा बताया जा रहा है. आरोप है कि यहां काम करने वाली एक महिला कर्मचारी की मां गंभीर रूप से बीमार थीं. हालात इतने खराब थे कि उन्हें लगातार देखभाल की जरूरत थी. ऐसे में महिला ने अपने मैनेजर से कुछ दिनों की छुट्टी मांगी, ताकि वह अपनी मां के पास रह सके, लेकिन उसे जो जवाब मिला, उसने उसे अंदर तक तोड़ दिया.
यह पूरी बात रेडिट के r/IndianWorkplace सबरेडिट पर ‘Mr_Moulick’ नाम के यूजर ने एक पोस्ट के जरिए शेयर की. पोस्ट के मुताबिक, महिला ने साफ तौर पर बताया था कि गलत दवा दिए जाने की वजह से उसकी मां की तबीयत और बिगड़ गई है. वह कोई लंबी छुट्टी नहीं, सिर्फ कुछ दिनों का समय चाहती थी. लेकिन आरोप है कि मैनेजर का रवैया न सिर्फ बेरहम था, बल्कि बेहद अमानवीय भी.
‘काम पहले, मां बाद में’
कहा जा रहा है कि मैनेजर ने महिला से यहां तक कह दिया. अगर तुम्हारी मां की हालत ठीक नहीं हो रही है, तो उन्हें किसी मेडिकल सेंटर या वृद्धा आश्रम में छोड़ दो और ऑफिस आ जाओ. यह बात सुनकर महिला के सामने जैसे जिंदगी का सबसे मुश्किल फैसला आ खड़ा हुआ. एक तरफ जॉब और दूसरी तरफ मां.
पोस्ट में बताया गया है कि महिला ने आखिरकार अपनी मां के साथ रहना चुना. उसने ऑफिस जाना बंद कर दिया और कुछ समय बाद उसे मजबूरी में इस्तीफा देना पड़ा. यह वही महिला थी, जिसने उस संस्थान में कई साल मेहनत से काम किया था.
देखें पोस्ट
वर्किंग कल्चर पर उठते सवाल
इस घटना ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी. पोस्ट के आखिर में सवाल किया गया था. अगर आप उस महिला की जगह होते, तो क्या करते? इस सवाल पर लोगों की भावनाएं खुलकर सामने आ गईं.
एक यूजर ने लिखा कि ऐसे मैनेजर से सारी बातें लिखित में मांगनी चाहिए थीं, ताकि उसकी असलियत सामने आ सके. किसी ने कहा कि जो कंपनी अपने कर्मचारी के सबसे मुश्किल वक्त में साथ नहीं खड़ी हो सकती, वहां वफादारी निभाने का कोई मतलब नहीं. कई लोगों का मानना था कि महिला ने बिल्कुल सही फैसला लिया और अगर मैनेजर खुद उस स्थिति में होता, तो शायद वह भी काम छोड़कर अपनी मां को ही चुनता.
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं है. यह उस सिस्टम पर सवाल है, जहां इंसान की मजबूरी, भावनाएं और रिश्ते कई बार एक्सेल शीट के आंकड़ों से भी कम अहम समझे जाते हैं.