
आजकल शाम के हैंगआउट्स का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका है. वो दौर गया जब महफिलों का मतलब सिर्फ भारी-भरकम शराब और धुएं से भरी रातें हुआ करती थीं. आज जेन-जी ने इस पूरी पार्टी वाइब को रिसेट कर दिया है. अब नशा सिर्फ कूल नहीं रह गया है, बल्कि होश में रहना यानी सोबर होना एक नया फ्लेक्स बन गया है. यह बदलाव सिर्फ लाइफस्टाइल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने शराब के ग्लोबल बिजनेस में एक तगड़ा मार्केट क्रैश ला दिया है.
फोर्ब्स में जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शराब कंपनियों के शेयरों से करीब 830 मिलियन डॉलर की वैल्यू साफ हो चुकी है. यहां तक कि जिम बीम (Jim Beam) जैसे लीजेंडरी ब्रांड्स को भी अपना प्रोडक्शन रोकना पड़ गया है, जो इस बात का सुबूत है कि पुरानी शराब का जादू अब नई पीढ़ी पर नहीं चल रहा है.
इस बदलाव के पीछे जो सबसे बड़ा डेटा है, वो नीलसन आईक्यू (NIQ) की 2025 की ऑन-प्रेमाइसेस रिपोर्ट से आता है. इसके मुताबिक, जेन-जी अपनी पिछली पीढ़ी यानी मिलेनियल्स के मुकाबले प्रति व्यक्ति 20% कम अल्कोहल कन्ज़्यूम कर रही है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने बाहर जाना बंद कर दिया है. आज का युवा क्वालिटी ओवर क्वांटिटी के मंत्र पर चलता है. करीब 56% जेन-जी कंज्यूमर्स अब चार-पांच सस्ते ड्रिंक्स के बजाय एक या दो हाई-क्वालिटी प्रीमियम कॉकटेल पर पैसा खर्च करना पसंद करते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि अब पार्टी का टाइम भी बदल गया है. रात 11 बजे के बाद वाले स्लॉट्स के बजाय, शाम 4 से 7 बजे के बीच बार और कैफे जाने वाले युवाओं की तादाद में 34% का उछाल आया है. वे अपनी नींद और अगली सुबह की प्रोडक्टिविटी के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते.

आज के हसल कल्चर और स्टार्टअप माइंडसेट वाले युग में, शराब को करियर का दुश्मन माना जाने लगा है. टाइम मैगजीन और बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट्स बताती हैं कि शराब कम पीने का सीधा कनेक्शन बढ़ती हुई वर्क-एफिशिएंसी से है. जब आप सुबह बिना किसी हैंगओवर के उठते हैं, तो आपकी क्रिएटिविटी और फोकस का लेवल अलग ही होता है. मिंटेल की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि जेन-जी अब फूड एज़ मेडिसिन के कॉन्सेप्ट को फॉलो कर रही है. वे ऐसे ड्रिंक्स ढूंढ रहे हैं जो उनके गट हेल्थ, हार्मोन्स और ब्लड शुगर को बैलेंस रखें. यही वजह है कि एडेप्टोजेनिक ड्रिंक्स और फंक्शनल एलिक्सर्स की डिमांड बढ़ गई है, जो आपको रिलैक्स तो करते हैं पर मदहोश नहीं.
हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के लिए यह एक सर्वाइवल गेम बन चुका है. टेक्नोमिक की 2025 की ग्लोबल ट्रेंड रिपोर्ट में एक नया शब्द आया है— इनहेरिवेशन. इसका मतलब है पुराने क्लासिक ड्रिंक्स को मॉडर्न और ग्लोबल ट्विस्ट के साथ सामने लाना, जैसे कि मिसो-कारमेल या पांडान का इस्तेमाल. अब बार्स सिर्फ शराब नहीं बेच रहे, बल्कि वे बेवरेज-फॉरवर्ड मॉडल्स पर शिफ्ट हो रहे हैं जहां बोबा टी, स्पेशल कॉफी और जीरो-प्रूफ स्पिरिट्स का बोलबाला है. इसके पीछे एक बड़ा हाथ सोशल मीडिया का भी है. मिंटेल के डेटा के अनुसार, 54% जेन-जी अपना वेन्यू सिर्फ दोस्तों के इंस्टाग्राम फीड और एस्थेटिक्स देखकर चुनती है. अगर ड्रिंक फोटोज़ेनिक या इंस्टाग्रामेबल नहीं है, तो आज के दौर में उसका कोई वजूद नहीं है.

ग्लोबल लेवल पर देखें तो अमेरिका और यूरोप में सॉफ्ट-क्लबिंग और अल्कोहल-फ्री नेटवर्किंग इवेंट्स एक बड़ा बाजार बन चुके हैं. भारत में भी, खासकर बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में यह ट्रेंड तेजी से पकड़ बना रहा है. यहां के युवा अब अपनी मेहनत की कमाई शराब की बोतलों पर लुटाने के बजाय एक्सपीरियंस-लीड वेन्यूज पर खर्च करना चाहते हैं.
रिवेन्यू मैनेजमेंट सॉल्यूशंस (RMS) के अक्टूबर 2025 के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक अनिश्चितताओं के बाद भी 56% जेन-जी हफ्ते में 5 से ज्यादा बार बाहर खाना खाती है. उनके लिए वैल्यू का मतलब अब सबसे कम कीमत नहीं, बल्कि एक्सपीरियंस + ब्रांड वैल्यू + एस्थेटिक का परफेक्ट कॉम्बो है, क्यूंकि उन्हें अपनी सोशल मीडिया लाइफ भी मेंटेन करनी है. टोस्ट पीओएस का डेटा भी इसकी पुष्टि करता है कि 46% युवा उन आइटम्स के लिए एक्स्ट्रा पैसे देने को तैयार हैं जो सस्टेनेबल या जीरो-वेस्ट हों.
कुल मिलाकर, हम एक ऐसी कल्चरल शिफ्ट के बीच खड़े हैं जहाँ होश ही असल पावर है. शराब कंपनियों के लिए यह वक्त अपनी स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदलने का है, क्योंकि आने वाले समय में बाजार उसी का होगा जो नशा नहीं, बल्कि वेलनेस और क्रिएटिविटी बेचेगा. अगली बार जब आप किसी कैफे में किसी युवा को ग्रीन टी या जीरो-अल्कोहल कॉकटेल के साथ लैपटॉप पर काम करते देखें, तो समझ जाइये कि यह सिर्फ एक चॉइस नहीं, बल्कि एक पूरी इकोनॉमी का नया चेहरा है. हालांकि, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि शराब का सेवन कम होने का मतलब नई पीढ़ी नशा ही कम कर रही है, बल्कि इसको इस तरह कहना सही होगा कि नशे का तरीका बदल दिया गया है, क्यूंकि हमने ये भी देखा है कि किस तरह अब युवा पीढ़ी धुएं की तरफ खुद को आगे बढ़ा रही है.
क्यूंकि कहा तो यही गया है कि:
शराब का कोई अपना सरीह रंग नहीं
शराब तजज़िया-ए-एहतिसाब करती है
जो अहले दिल हैं बढ़ाती है आबरू उनकी
जो बेशऊर हैं उनको ख़राब करती है