इजरायल और अमेरिका के हमले ईरान के कई इलाके मलबे में तब्दील हो गए हैं. कई अपार्टमेंट और इमारतें रातोंरात ढह गईं. परिवार मलबे में अब भी अपनों की तलाश कर रहे हैं. ईरान की राजधानी तेहरान में युद्ध ने सिर्फ इमारतें नहीं गिराईं, बल्कि लोगों की बरसों की मेहनत और यादों को भी मलबे में बदल दिया. इस बीच एक म्यूजिक स्कूल ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है.
किसी फाइटर जेट या ढहती इमारत के वीडियो से अलग एक गमगीन संगीत शिक्षक की तस्वीर वायरल हो रही है, जो अपने म्यूजिक स्कूल के मलबों के बीच बैठा हुआ है. संगीत शिक्षक अपने तबाह हो चुके स्कूल के खंडहरों में बैठा है और टूटे पत्थरों, धूल और लटकती तारों के बीच अपना वाद्ययंत्र बजा रहा हैइस म्यूजिक टीचर का नाम हामिदरेजा अफारिदेह है, जिनसे इंडिया टुडे ने बातचीत की.
उन्होंने अपनी पत्नी शैदा एबादतदौस्त के साथ करीब 15 साल की मेहनत से तेहरान की पिरूजी स्ट्रीट पर 'होनियाक म्यूजिक स्कूल' बनाया था. यह सिर्फ एक संगीत स्कूल नहीं था, बल्कि सैकड़ों बच्चों और युवाओं के सपनों को बुनने की जगह बन चुका था. यहां करीब 250 छात्र और 22 शिक्षक जुड़े हुए थे.
एक रात में खत्म हो गई 15 साल की मेहनत
23 मार्च 2026 को हुए मिसाइल हमले में स्कूल बुरी तरह तबाह हो गया. क्लासरूम टूट गए, संगीत के उपकरण मलबे में दब गए और जिस जगह पर रोज सुर गूंजते थे, वहां सन्नाटा छा गया. हमले के बाद जब हमीदरेजा वापस अपने स्कूल पहुंचे तो वहां सिर्फ टूटी दीवारें और बिखरी यादें बची थीं.
उन्होंने बताया कि मैंने और मेरी पत्नी ने इस जगह को बनाने में 15 साल लगा दिए थे. एक ही रात में सब खत्म हो गया. रिपोर्ट के मुताबिक इस नुकसान की कीमत करीब 42 हजार डॉलर यानी लगभग 35 लाख रुपये आंकी गई है. लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा नुकसान पैसों का नहीं, बल्कि उन यादों का था जो इस स्कूल से जुड़ी थीं.
'हमारे लिए यह स्कूल बच्चे जैसा था'
हमीदरेजा और उनकी पत्नी की कोई संतान नहीं है. उन्होंने कहा कि यह स्कूल उनके लिए बच्चे जैसा था. यहां छोटे-छोटे बच्चे संगीत सीखते हुए बड़े हुए. कई छात्रों ने यहीं से अपनी जिंदगी की दिशा तय की.ॉ
उनके मुताबिक, यह जगह सिर्फ संगीत सिखाने की नहीं थी, बल्कि बच्चों के लिए एक सुरक्षित और सुकून देने वाली जगह थी. युद्ध और तनाव के माहौल में भी यहां आने वाले बच्चे कुछ देर के लिए डर और चिंता भूल जाते थे. स्कूल टूटने के बाद अब छात्र रोज उनसे पूछ रहे हैं कि यह दोबारा कब बनेगा, लेकिन फिलहाल उनके पास इसका जवाब नहीं है.
फिर मलबे में बैठकर बजाने लगे इंस्ट्रूमेंट
सबसे भावुक पल तब आया जब हमीदरेजा दोबारा उस खंडहर बन चुके स्कूल में पहुंचे. वहां जाना भी सुरक्षित नहीं था. इमारत कभी भी गिर सकती थी, लेकिन वह फिर भी गए. वजह सिर्फ इतनी थी कि वह नहीं चाहते थे कि उस जगह की आखिरी आवाज धमाकों और मिसाइलों की हो.
उन्होंने मलबे के बीच बैठकर अपना पारंपरिक ईरानी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट 'कमांचेह' बजाना शुरू कर दिया. आसपास टूटे पत्थर थे, ऊपर से तारें लटक रही थीं और छत का बड़ा हिस्सा गायब था. लेकिन उस वीरानी में संगीत की आवाज गूंज रही थी.
हमीदरेजा ने कहा कि मैं चाहता था कि इस जगह से आखिरी आवाज संगीत की निकले बमों और मिसाइलों की नहीं. यही वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लाखों लोगों ने इसे युद्ध की असली कीमत बताने वाली तस्वीर कहा.