भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1999 में हुए करगिल युद्ध के बाद एक बेहद संगीन मामला सामने आने से देशवासियों की भावनाएं बुरी तरह आहत हुईं. इस तरह की बातें सामने आईं कि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के शव को सम्मानजनक तरीके से घर पहुंचाने के लिए जिन ताबूतों की खरीद हुई, उसमें भारी घोटाला हुआ.
बाजार-भाव से ज्यादा दर पर खरीद
इसी मामले में देश की केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और अमरीका के एक ठेकेदार के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया. तथ्य यह है कि भारत के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका की एक कंपनी से अल्युमिनियम के ताबूत और शव रखने योग्य थैले ख़रीदे थे. आरोपी अधिकारियों ने वर्ष 1999-2000 के दौरान ऐसे 500 अल्यूमुनियम ताबूत और 3000 शव थैले ख़रीदने के लिए अमरीका की एक कंपनी के साथ सौदा किया था. इस सौदे में प्रति ताबूत 2500 अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक लाख बीस हज़ार रुपए और शव के थैलों के लिए 85 अमरीकी डॉलर प्रति थैला के हिसाब से भुगतान किया गया. बाद में पाया गया कि यह दर अंतरराष्ट्रीय बाजार-भाव के अनुसार बहुत ही ज्यादा थी.
ताबूतों के वजन से भी खिलवाड़
कुल मिलाकर यह सौदा करीब 15 लाख और 5 हज़ार अमरीकी डॉलर यानी क़रीब 7 करोड़ रुपए का था. जांच में पाया गया है कि जिस अमरीकी कंपनी के साथ सौदा हुआ था, वह इन ताबूतों की निर्माता कंपनी नहीं थी. कंपनी ने पहले जिन 150 ताबूतों की आपूर्ति की, उनका वज़न 55 किलोग्राम प्रति ताबूत था, जबकि सौदे के मुताबिक से वजन 18 किलोग्राम होना चाहिए था.
दलालों की जेब में गई जनता की रकम
शुरुआती जांच में यह भी पाया गया कि ताबूतों के साथ वेल्डिंग के जरिए छेड़छाड़ की गई थी, जिसके कारण उसमें सुराख होने का ख़तरा बढ़ गया था. इसी वजह से विवादास्पद ताबूत इस्तेमाल के योग्य नहीं पाए गए थे. इस तरह सरकार को करीब एक लाख 87 हजार अमरीकी डॉलर यानी लगभग 89 लाख 76 हज़ार रुपए का भरी घाटा हुआ. जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा शहीदों के शव के काम न आकर दलालों व भ्रष्ट अफसरों की जेब में चले गए.
जॉर्ज पर भी लगे थे आरोप
करगिल युद्ध के बाद तब विपक्ष में बैठ रही कांग्रेस ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस पर ताबूत आयात में घोटाले का आरोप लगाया था. विपक्ष ने जॉर्ज से इस्तीफे की भी मांग की थी. बाद में इस मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी.