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पॉकेट मनी के लिए लड़कियां बेच रही हैं अपने 'एग्स'

आपने सरोगेट मदर यानी किराये की कोख के बारे में सुना होगा, लेकिन यह खबर बिल्कुल जुदा है. यहां आसान पैसे के लिए जवान लड़कियां बेच रही हैं अपने अंडाणु यानी एग्स. फर्टीलिटी क्लीनिक्स की शह पर चल रहे इस धंधे में डोनर को हजारों मिलते हैं, जबकि ये क्लीनिक्स बेऔलाद दपंत्तियों से लाखों वसूलते हैं.

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आपने सरोगेट मदर यानी किराये की कोख के बारे में सुना होगा, लेकिन यह खबर बिल्कुल जुदा है. यहां आसान पैसे के लिए जवान लड़कियां बेच रही हैं अपने अंडाणु यानी एग्स. फर्टीलिटी क्लीनिक्स की शह पर चल रहे इस धंधे में डोनर को हजारों मिलते हैं, जबकि ये क्लीनिक्स बेऔलाद दपंत्तियों से लाखों वसूलते हैं.

दिल्ली की युवा लड़कियों के एक वर्ग में ब्रैंडेड जींस या जुलरी का क्रेज नहीं बल्कि जल्द पैसे के लिए खतरनाक ट्रेंड पैर पसार रहा है, हकीकत आपके होश उड़ा देगी, लड़कियां अपने एग्स यानी अंडाणु बेच रही हैं ताकि इजी मनी कमा सकें.

ऐसे कपल्स की संख्या बढ़ी है जो औलाद के लिए तरस रहे हैं और वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं, नतीजा अंडाणुओं का यह धंधा तेजी से परवान चढ़ रहा है लेकिन यहां भी धंधे की अपनी रेट लिस्ट है, आप खूबसूरत और दिमागदार बच्चा चाहते हैं तो उसके लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं. यह कीमत पच्चीस से 75 हजार के बीच कुछ भी हो सकती है.

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फर्टीलिटी स्पेशलिस्ट,  डॉ अनूप गुप्ता, ने बताया कि क्विक पॉकेट मनी के लिए 18 साल तक की एग डोनर्स अपने अंडे डोनेट करने के लिए क्लीनिक को अप्रोच करती हैं. फर्टीलिटी क्लीनिक्स के पास रोजाना औसतन 10-15 बेऔलाद दंपत्तियों अप्रोच करती हैं. शायद इसी का बढ़ता दबाव है कि ऐसे क्लीनिक्स को एग डोनर्स की तलाश रहती है और इसी का असर है कि युवा लड़कियों के एक वर्ग ने आसान पैसे के लिए यह रास्ता चुन लिया, बगैर यह सोचे कि यह कदम कितना सही है या कितना गलत. {mospagebreak}

कानून की खामियां इन क्लीनिक्स के लिए वरदान बन गई हैं. वो युवा लड़कियों को इस तरह धड़ल्ले से एग डोनेशन के खतरे के बारे में कुछ नहीं बतातीं, और लड़कियां भी पॉकेट मनी के लिए इसे आसान रास्ता समझती हैं जबकि एग डोनेशन ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए फर्टीलिटी के हॉर्मोन्स देने पड़ते हैं ताकि लड़की के गर्भाशय में एग्स तेजी से बनें. इसका फौरी असर मिचली, चक्कर और सिरदर्द के रूप में देखने को मिल सकता है. एग डोनेशन करने के बाद भी यह लक्षण जारी रहते हैं. 

वैसे भी रेगुलर एग डोनेशन में जोखिम काफी ज्यादा है, इससे लड़कियों की ओवरी में बीमारी का खतरा बढ़ ज्यादा है जिसके आगे चलकर ज्यादा गंभीर नतीजे हो सकते हैं.
 सिर्फ डोनर ही नहीं, जो  बेऔलाद दंपत्ति है उनके लिए भी ये सब आसान नहीं, उन्हें कुछ पता नहीं होता है, और अक्सर क्लीनिक्स भी उन्हें बेवकूफ बनाते हैं.

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ऐसे क्लीनिक्स को रेगुलेट करने के लिए आईसीएमआर ने गाइडलाइंस जारी किए हैं,  लेकिन इनका धड़ल्ले से उल्लंघन होता है. यही वजह है कि अब इससे कड़े कानून बनाने का वक्त आ गया है. लेकिन जबतक कानून नहीं बन जाता तबतक फर्टीलिटी क्लीनिक्स शायद इसी तरह बेऔलाद दंपत्तियों की चाहत और युवा लड़कियों की आसान पैसे की ललक को भुनाते रहें.

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