
तनुज करीब 6 साल जर्मनी में रहे. उन्होंने वहां की जिंदगी को खूब एंजॉय किया. साफ सड़कें, ट्रैफिक का बोझ न होना, समय पर हर चीज का चलना, प्रदूषण मुक्त माहौल और शांतिपूर्ण दिनचर्या सब कुछ था. लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता था.तनुज ने अपने पोस्ट में लिखा कि जर्मनी में सब कुछ बेहतर था. काम के बाद शाम को शांति, वीकेंड पर प्लान के मुताबिक घूमना, हर चीज अनुमानित और व्यवस्थित, लेकिन कुछ कमी लगती थी भारत में ट्रैफिक है, प्रदूषण है, शोर है, भीड़ है, अनिश्चितता है… फिर भी यहां कुछ है जो वहां नहीं मिलता.वो एनर्जी, वो इमोशनल कनेक्शन.
उन्होंने आगे लिखा कि परिवार, त्योहार, दोस्तों के साथ अचानक की मुलाकातें, स्ट्रीट फूड, आसपास जिंदगी के दौड़ने का एहसास… कभी-कभी सिर्फ आराम काफी नहीं होता. इंसान को यह भी महसूस होना चाहिए कि वह सच में जिंदगी जी रहा है.भारत की 'लाइफ' vs जर्मनी का आराम'.
'भारत में जिंदगी 'जिंदा' लगती है'
तनुज ने स्वीकार किया कि भारत लौटने के बाद भी कई बार उनका मन जर्मनी वापस जाने का करता है. लेकिन परिवार, दोस्तों और भारतीय संस्कृति की वो गर्मजोशी उन्हें बार-बार खींच लाती है. उनके अनुसार, विदेश में जिंदगी 'आरामदायक' है, लेकिन भारत में जिंदगी 'जिंदा' लगती है.

पोस्ट वायरल होते ही हजारों लोगों ने अपनी कहानियां शेयर करना शुरू कर दीं. किसी ने कहा कि मैं कनाडा में 8 साल से हूं, हर साल सोचता हूं वापस जाऊंगा… लेकिन सैलरी देखकर रुक जाता हूं. तनुज भाई सही कह रहे हो. वहीं किसी ने कमेंट करते हुए लिखा कि आराम तो मिल जाता है विदेश में, लेकिन वो मां के हाथ का खाना, दीवाली की रौनक, भाई-बहन के साथ गप्पें… वो कहीं नहीं मिलता. वहीं किसी ने कहा कि दोनों जगह की अपनी खूबियां हैं, लेकिन घर की बात ही कुछ और है.
तनुज फिलहाल बेंगलुरु में काम कर रहे हैं
पिछले कुछ सालों में कई भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर विदेश (खासकर जर्मनी, कनाडा, अमेरिका) से भारत लौट रहे हैं. बेहतर करियर, सीनियर पोस्ट और परिवार के साथ समय बिताने की चाह इनकी मुख्य वजह है. तनुज का पोस्ट इसी भावना को बखूबी दर्शाता है.तनुज फिलहाल बेंगलुरु में अपनी कंपनी के साथ काम कर रहे हैं और भारत में ही नई शुरुआत करने की योजना बना रहे हैं.तनुज जैसे कई प्रोफेशनल्स की कहानियां बताती हैं कि नौकरी और सुविधाओं के अलावा इंसान को भावनात्मक संतोष भी उतना ही जरूरी है.