सोमनाथ... यह शब्द कान में पड़ते ही एक अजीब सी ऊर्जा महसूस होती है. ऐसा लगता है जैसे सदियों का इतिहास हमारी आंखों के सामने आकर खड़ा हो गया हो. गुजरात के तट पर बसा यह मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि भारत के उस स्वाभिमान की कहानी है, जिसे मिटाने की कोशिश तो बहुत हुई, लेकिन हर बार वो पहले से ज्यादा चमक के साथ खड़ा हो गया.
साल 2026 भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक बड़ा मील का पत्थर है, क्योंकि 1026 में सोमनाथ पर हुए उस पहले भयानक आक्रमण के ठीक 1000 साल पूरे हो रहे हैं. यह मौका शोक का नहीं, बल्कि उस विजय को याद करने का है कि कैसे लुटेरे आए और चले गए, पर हमारी आस्था का यह स्तंभ आज भी अडिग है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को इसी पावन धरती पर 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' में शामिल होने पहुंच रहे हैं. उन्होंने खुद एक्स पर लिखा कि बार-बार हुए हमलों के बाद भी सोमनाथ का अडिग रहना भारत माता की वीर संतानों के अदम्य साहस की गाथा है. 8 से 11 जनवरी तक चलने वाले इस उत्सव में देश की गौरवशाली सभ्यता की झलक दिखेगी. तो चलिए, जानते हैं इस मंदिर की वो कहानी, जिसमें सोने की दीवारों का वैभव भी है, आक्रमणकारियों की बर्बरता भी और हर बार फिर से उठ खड़े होने का वो जज्बा भी, साथ ही यह भी कि आज के दौर में श्रद्धालु यहां तक कैसे पहुंच सकते हैं.
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जब महमूद गजनवी की क्रूरता से दहला था सोमनाथ
कहानी आज से ठीक 1000 साल पहले की है, जब भारत की संपन्नता और सोमनाथ के वैभव की चर्चा सात समंदर पार तक थी. उस दौर के महान इतिहासकार अल-बरूनी ने जब सोमनाथ को देखा, तो वह इसके सौंदर्य और भव्यता को देखकर दंग रह गया था. मंदिर के शिखर पर लगे सोने के गुंबद सूरज की रोशनी में कुछ इस तरह दमकते थे कि मीलों दूर से ही इनकी चमक दिखाई देती थी. लेकिन इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य और आकर्षण था इसका गर्भगृह, जहां महादेव की मुख्य मूर्ति बिना किसी भौतिक सहारे के हवा में लटकी रहती थी. यह उस समय की इंजीनियरिंग और आध्यात्म का एक ऐसा अद्भुत मेल था, जिसे देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था.
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यही अटूट समृद्धि और सोने की चमक लुटेरे महमूद गजनवी की आंखों में खटकने लगी. साल 1024 के अंत में गजनवी 30 हजार खूंखार घुड़सवारों की सेना लेकर गजनी से निकला. रास्ते की तमाम बाधाओं और राजस्थान के तपते रेगिस्तान को पार करता हुआ, वह जनवरी 1026 में गुजरात के तट पर जा पहुंचा. उस सुबह सोमनाथ ने वो मंजर देखा जो इतिहास के पन्नों में सबसे खूनी अध्याय बनकर दर्ज हो गया. मंदिर को बचाने के लिए वहां मौजूद स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी. कहा जाता है कि इस दौरान करीब 50 हजार से ज्यादा भक्तों ने मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन गजनवी की बर्बरता नहीं रुकी.
गजनवी जब मंदिर के भीतर दाखिल हुआ, तो उसकी नजर वहां के अथाह खजाने पर थी. उसने मंदिर के 56 नक्काशीदार खंभों को क्षतिग्रस्त किया, चांदी के पत्तर उखाड़ लिए और 40 मन वजनी उस सोने की जंजीर को भी तोड़ दिया जिससे महाघंटा लटकता था. लुटेरे का लालच यहीं खत्म नहीं हुआ उसने बेशकीमती रत्न और गुप्त कोष की तलाश में पूरे गर्भगृह को खुदवा डाला. उसे लगा कि मंदिर को खंडहर में तब्दील करके उसने सोमनाथ का नामो-निशान हमेशा के लिए मिटा दिया है. लेकिन वो लुटेरा एक बात समझना भूल गया कि इमारतें तोड़ी जा सकती हैं, पत्थर बिखेरे जा सकते हैं, पर सोमनाथ कोई पत्थर की दीवार नहीं थी. सोमनाथ तो भारतीयों की रगों में दौड़ता हुआ वो अटूट विश्वास था, जो हर विनाश के बाद और भी मजबूती के साथ जी उठने का जज्बा रखता था.

खंडहर से आधुनिक वैभव तक का सफर
सदियों तक सोमनाथ ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन 1947 में जब भारत आजाद हुआ, तो सोमनाथ के पुनरुद्धार की नई किरण जागी. आजादी के महज तीन महीने बाद देश के 'लौह पुरुष' सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ का दौरा किया. वहां के खंडहरों को देखकर उन्होंने संकल्प लिया कि इस अपमान के दाग को धोना होगा और सोमनाथ को उसकी पुरानी भव्यता लौटानी होगी. सरदार पटेल ने साफ कहा था कि सोमनाथ सिर्फ पूजा का मंदिर मात्र नहीं रहेगा, बल्कि यह हमारी एकता और संस्कृति का प्रतीक बनेगा.
1951 में जो मंदिर बनकर तैयार हुआ, वह उसी मूल स्थान पर सातवां पुनर्निर्माण था. के.एम. मुंशी और सरदार पटेल की देखरेख में इसे चालुक्य शैली की वास्तुकला में फिर से ढाला गया. हालांकि, पटेल इस मंदिर को पूर्ण होते देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन उनका संकल्प आज भी सोमनाथ की ऊंची ध्वजा में लहराता है. आज हम जिस भव्य मंदिर को देखते हैं, वह भारत के उसी स्वाभिमान का प्रमाण है, जो आक्रमणकारियों के हर घाव को सहकर और निखर कर सामने आया.
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में क्यों है सोमनाथ का प्रथम स्थान?
शास्त्रों में 12 ज्योतिर्लिंगों का जिक्र है, लेकिन जब भी इनकी गणना शुरू होती है, तो पहला नाम आता है "सौराष्ट्रे सोमनाथं च...". धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ का मुख्य मंदिर खुद चंद्र देवता ने सोने से बनवाया था. इसके बाद सूर्य देवता ने इसे चांदी से, भगवान कृष्ण ने लकड़ी से और बाद में सोलंकी राजपूतों ने इसे पत्थर से भव्य रूप दिया. मान्यता है कि यहां हर रोज गंगाजल से महादेव का अभिषेक होता है, जिसे 1200 किलोमीटर दूर से लाया जाता था.
यह मंदिर तीन तरफ से समुद्र से घिरा है, जो इसे और भी दिव्य बनाता है. इतना ही नहीं चंद्र ग्रहण के समय यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं. इसकी आध्यात्मिक महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां की गई पूजा का फल अक्षय माना जाता है. 8 से 11 जनवरी तक होने वाला 'स्वाभिमान पर्व' इसी शाश्वत आध्यात्मिक ऊर्जा को नमन करने का एक जरिया है, जिसमें पीएम मोदी खुद शामिल होकर देश को अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देंगे.
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कैसे पहुंचें सोमनाथ मंदिर?
अगर आप भी इस ऐतिहासिक 'स्वाभिमान पर्व' का हिस्सा बनना चाहते हैं तो यहां तक पहुंचने का रास्ता बहुत ही सुलभ और आसान है. गुजरात के सौराष्ट्र में वेरावल के पास समुद्र तट पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए रेल मार्ग सबसे पसंदीदा विकल्प माना जाता है.
सोमनाथ से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन वेरावल (Veraval) है, जो मंदिर से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर है. यह स्टेशन मुंबई, अहमदाबाद और राजकोट जैसे देश के प्रमुख शहरों से सीधे ट्रेनों के जरिए जुड़ा हुआ है. स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको टैक्सी, ऑटो या कैब आसानी से मिल जाएंगे, जो महज 15 मिनट में आपको मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंचा देंगे.
हवाई मार्ग से यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे पास दीव एयरपोर्ट पड़ता है, जिसकी सोमनाथ से दूरी करीब 65 किलोमीटर है. दीव एयरपोर्ट पहुंचने के बाद आप वहां से नियमित चलने वाली टैक्सियों या बसों का सहारा ले सकते हैं. इसके अलावा, जो लोग लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय या घरेलू उड़ानों से आ रहे हैं, उनके लिए अहमदाबाद का सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा एक बेहतरीन विकल्प साबित होता है, जहां से आप आगे का सफर बस या ट्रेन के जरिए तय कर सकते हैं.
सड़क मार्ग के शौकीनों के लिए भी गुजरात का हाईवे नेटवर्क किसी वरदान से कम नहीं है. राजकोट, पोरबंदर और अहमदाबाद जैसे शहरों से सोमनाथ के लिए लग्जरी एसी और नॉन-एसी बसें हर वक्त उपलब्ध रहती हैं. दिलचस्प बात यह है कि दीव से सोमनाथ के बीच चलने वाली वातानुकूलित बसों का किराया भी 500 रुपये के आसपास है, जो आपकी यात्रा को किफायती और आरामदायक दोनों बनाता है.