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रमजान में जेब पर भारी पड़ता है मक्का-मदीना का सफर, इन टिप्स से बचाएं पैसे

मक्का और मदीना जाना हर मुसलमान की सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है, लेकिन रमजान का महीना शुरू होते ही इस सफर का खर्च अचानक क्यों बढ़ जाता है? इसके पीछे का पूरा गणित समझने के लिए पढ़ें यह खबर.

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भीड़ भारी पर दिल में इबादत का जुनून (Photo: Pixabay)
भीड़ भारी पर दिल में इबादत का जुनून (Photo: Pixabay)

रमजान का पाक महीना चल रहा है, इस दौरान हर मुसलमान की ये ख्वाहिश रहती है कि वो कुछ वक्त मक्का और मदीना में बिताए. ये वो दो शहर हैं जिनसे इस्लाम की पहचान जुड़ी है. एक तरफ मक्का है जहां काबा है और दूसरी तरफ मदीना, जहां पैंगबर मोहम्मद साहब की मजार है और मस्जिद-ए-नबवी है.

वैसे तो वहां साल भर लोग जाते हैं, लेकिन रमजान के महीने में लोगों की संख्या बहुत बढ़ जाती है. इससे  सफर का खर्च आम दिनों के मुकाबले दोगुना हो जाता है. इन दो शहरों का असली महत्व क्या है और क्यों रमजान के महीने में यहां जाने के लिए आपको अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ती है.

क्यों है इन दो शहरों की इतनी अहमियत?

सबसे पहले मक्का की बात करते हैं. मक्का वो शहर है, जहां पैगंबर मोहम्मद साहब पैदा हुए थे. यहीं पर काबा है, जिसकी ओर पूरी दुनिया के मुसलमान मुंह करके नमाज पढ़ते हैं. इसे इस्लाम की सबसे पवित्र जगह माना जाता है. वहीं मदीना वो शहर है जहां पैगंबर साहब ने अपना घर बसाया और जहां उनकी कब्र मौजूद है. मदीना का माहौल मक्का के मुकाबले काफी शांत रहता है और यहां की मस्जिद-ए-नबवी की अपनी एक अलग ही बात है.

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मक्का में 'मस्जिद-अल-हराम' है, जो दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद है. इसके बीचों-बीच जो काला पत्थर (काबा) है, उसे इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने बनवाया था. लोग यहां तवाफ करते हैं, यानी काबा के चारों तरफ चक्कर लगाते हैं. यह अनुभव इतना खास होता है कि इसे देखने के बाद लोग सब कुछ भूल जाते हैं. मदीना का मामला थोड़ा अलग है. यहां पैगंबर साहब की मस्जिद है, जिसका हरा गुंबद पूरी दुनिया में मशहूर है. मदीना पहुंचते ही एक अजीब सा सुकून मिलता है. वहां की साफ-सफाई, लोगों का प्यार और मस्जिद की शांति दिल जीत लेती है.

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अब बात करते हैं रमजान की. रमजान में उमराह करने का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस दौरान उमराह करने का सवाब हज के बराबर मिलता है.  दुनिया भर से लाखों लोग एक साथ सऊदी अरब पहुंच रहे हैं. जब भीड़ बढ़ती है, तो जाहिर है कि वहां रहना और घूमना भी महंगा हो जाता है.

खर्च क्यों बढ़ जाता है?

रमजान में उमराह का खर्च दोगुना या तिगुना होने का सबसे बड़ा कारण है 'अंधाधुंध भीड़'. जब दुनिया भर से करोड़ों लोग एक साथ दो छोटे शहरों में जाना चाहेंगे, तो वहां की हर चीज महंगी होना तय है. इसे आप मांग और सप्लाई का खेल कह सकते हैं.

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सबसे ज्यादा असर पड़ता है होटल और कमरों के किराए पर. मक्का में जो होटल काबा के पास हैं, उनके दाम कई गुना बढ़ जाते हैं. हर कोई चाहता है कि वह मस्जिद के इतना पास रहे कि गेट से बाहर निकलते ही नमाज पढ़ ले. इसी पास रहने की चाहत का फायदा होटल वाले उठाते हैं. अगर आप आम दिनों में वहां 5-6 हजार में कमरा पा लेते हैं, तो रमजान में वही कमरा 25-30 हजार रुपये तक का हो जाता है. खासकर रमजान के आखिरी 10 दिनों में कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, क्योंकि लोग 'शब-ए-कद्र' की तलाश में पूरी रात इबादत करना चाहते हैं.

दूसरी मार पड़ती है हवाई जहाज के टिकट पर. एयरलाइंस कंपनियों को पता होता है कि इस समय लोग किसी भी कीमत पर टिकट खरीदेंगे, इसलिए वे दाम बढ़ा देती हैं. इसके अलावा, जो लोग पैकेज बुक करते हैं, उन्हें भी ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं, क्योंकि वहां गाड़ियों और खाने-पीने का खर्च भी बढ़ जाता है. टैक्सी वाले जो आम दिनों में 100 रियाल लेते हैं, वो भीड़ का फायदा उठाकर 300 से 400 रियाल तक मांगने लगते हैं.

ट्रैवल पैकेज और एजेंटों का गणित

बहुत से लोग खुद जाने के बजाय एजेंटों से पैकेज लेते हैं. ये एजेंट आपको रहने, खाने और घुमाने का पूरा जिम्मा लेते हैं. रमजान में इन पैकेज के दाम इसलिए भी बढ़ते हैं, क्योंकि सऊदी अरब में वीजा फीस और ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी बढ़ जाता है. इसके अलावा, भीड़ की वजह से खाने-पीने की चीजों की सप्लाई पर भी असर पड़ता है, जिससे वहां का स्थानीय बाजार भी महंगा हो जाता है.

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कैसे बचाएं अपने पैसे? 

अगर आपका सपना मक्का-मदीना जाने का है लेकिन आप बढ़ते खर्च से परेशान हैं, तो कुछ स्मार्ट तरीके अपना सकते हैं. पहला तो ये कि रमजान शुरू होने से कम से कम 4-5 महीने पहले अपनी फ्लाइट और होटल बुक कर लें. आखिरी समय पर बुकिंग हमेशा महंगी पड़ती है. दूसरा तरीका ये है कि आप काबा या मस्जिद-ए-नबवी से थोड़ा दूर होटल लें. जो होटल मस्जिद से 2-3 किलोमीटर दूर होते हैं, वे काफी सस्ते मिल जाते हैं. वहां से मस्जिद तक जाने के लिए बसें चलती हैं, जो आपका काम आसान कर सकती हैं.

तीसरी बात, अगर मुमकिन हो तो रमजान के शुरूआती 15 दिनों में यात्रा करें. आखिरी 10 दिनों के मुकाबले शुरू के दिनों में भीड़ थोड़ी कम होती है और होटल के दाम भी थोड़े काबू में रहते हैं. कुल मिलाकर, रमजान में मक्का-मदीना का सफर यादों के लिहाज से तो बहुत बढ़िया रहता है, लेकिन यह आपकी जमा-पूंजी पर भी काफी भारी पड़ता है. इसलिए सही प्लानिंग और जानकारी ही आपको भारी खर्च से बचा सकती है.

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