भारत में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां ट्रेन की आवाज़ सुनाई न दे, लेकिन सिक्किम इस मामले में बिल्कुल अलग है. यह देश का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां अपना कोई रेलवे स्टेशन या रेल की पटरी नहीं है. यहां की खूबसूरत वादियों में आपको झरनों और चिड़ियों का शोर तो खूब मिलेगा, लेकिन ट्रेन की सीटी आज भी लोगों के लिए एक सपने जैसी है.
अगर आप सिक्किम जाने का प्लान बना रहे हैं, तो आपका रेलवे ऐप यहां काम नहीं करेगा. आपको पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी या न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर उतरना होगा और वहां से पहाड़ों के घुमावदार रास्तों से होकर सिक्किम पहुंचना होगा. ट्रेन न होने के बावजूद, यहां की सादगी और कुदरती खूबसूरती हर साल लाखों सैलानियों को अपनी ओर खींच लेती है. आखिर क्यों इस पहाड़ी राज्य में आज तक पटरियां नहीं बिछ पाईं और कब तक यहां पहली ट्रेन पहुंचने की उम्मीद है.
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क्यों नहीं है ट्रेन
सिक्किम साल 1975 में भारत का 22वां राज्य बना था, लेकिन तब से लेकर अब तक यहां के लोग अपने राज्य में रेल की पटरी बिछने की राह देख रहे हैं. यहां का भौगोलिक ढांचा इतना कठिन है कि ऊंची ढलानों और गहरी खाइयों के आगे इंजीनियरिंग को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है. ऊंचे पहाड़ और अप्रत्याशित मौसम के कारण यहां पटरियां बिछाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है.
हालांकि, अब वक्त बदल रहा है और पश्चिम बंगाल के सेवक से यहां के रंगपो तक एक नई रेल लाइन का काम तेजी से चल रहा है, जिसके 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है. तब जाकर सिक्किम को अपना पहला रेलवे स्टेशन नसीब होगा और इस पहाड़ी राज्य का सालों पुराना सपना हकीकत में बदल जाएगा.
पहुंचने के सबसे आसान रास्ते
सिक्किम की राजधानी गंगटोक आज भी देश के पर्यटकों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है. भले ही सीधे ट्रेन इस राज्य की सीमा तक नहीं पहुंचती, पर इन वादियों का सफर किसी एडवेंचर से कम नहीं होता. अगर आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं, तो सबसे पास का हवाई अड्डा पश्चिम बंगाल का बागडोगरा है, जहां से करीब 125 किलोमीटर की दूरी तय कर आप इन खूबसूरत नजारों के बीच पहुंच सकते हैं. वहीं ट्रेन से आने वाले मुसाफिरों को पहले न्यू जलपाईगुड़ी उतरना पड़ता है और फिर वहां से टैक्सी के जरिए दूसरे राज्य की सरहद पार कर इस पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करना होता है.
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सड़क मार्ग से कनेक्टिविटी काफी शानदार है, जो सैलानियों को एक अलग ही दुनिया का एहसास कराती है. दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और कलिंगपोंग जैसे शहरों से बस या टैक्सी लेकर आप महज 3 से 4 घंटे के भीतर बर्फीली चोटियों के करीब पहुंच सकते हैं. तीस्ता नदी के साथ-साथ चलती घुमावदार सड़कें और रास्ते में मिलने वाले दूधिया सफेद वॉटरफॉल्स का दीदार सफर की सारी थकान मिटा देता है.
वादियों में छिपा कुदरत का जादू
पर्यटन के लिहाज से यह जगह किसी खजाने से कम नहीं है. रुमटेक मोनैस्ट्री की शांति, गणेश टोक से दिखने वाला शहर का नजारा और नाथू ला पास की जमा देने वाली ठंड पर्यटकों को एक रोमांचक अनुभव देती है. इसके अलावा युमथंग वैली के फूलों के मैदान और हनुमान टोक जैसे धार्मिक स्थल आज भी बिना ट्रेन के लाखों सैलानियों को हर साल अपनी ओर खींच रहे हैं. यहां का सफर हर मुसाफिर को यह गहरा सबक सिखाता है कि कभी-कभी स्टेशन का शोर और पटरियों का जाल न होना भी किसी जगह को ज्यादा शांत, पवित्र और खूबसूरत बना सकता है. प्रकृति के इतने करीब होने का जो सुख यहां की कच्ची राहों में है, वो शायद ही किसी और सफर में मिले.
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