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मुजीब

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शेख मुजीबुर रहमान (Sheikh Mujibur Rahman), जिन्हें “बंगबंधु” के नाम से भी जाना जाता है, बांग्लादेश के संस्थापक नेता माने जाते हैं. उनका जन्म 17 मार्च 1920 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत के गोपालगंज जिले के तुंगीपारा गांव में एक बंगाली मुस्लिम परिवार में हुआ था. उनके पिता शेख लुत्फुर रहमान अदालत में कानून क्लर्क थे, जबकि उनकी मां सायरा खातून गृहिणी थीं. परिवार स्थानीय स्तर पर जमींदार पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ था.

बचपन से ही शेख मुजीब राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में रुचि रखते थे. छात्र जीवन के दौरान वे बंगाल की राजनीति में सक्रिय हुए. शुरुआती राजनीतिक जीवन में वे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग से जुड़े और पाकिस्तान के समर्थन में राजनीति की. बाद में 1949 में वे उस राजनीतिक धड़े का हिस्सा बने, जिसने आगे चलकर अवामी लीग का रूप लिया.

1950 और 1960 के दशक में शेख मुजीब पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के अधिकारों की आवाज बनकर उभरे. उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान पर पूर्वी बंगाल के लोगों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भेदभाव का आरोप लगाया. इसी दौरान उन्होंने छह सूत्रीय आंदोलन (Six Point Movement) शुरू किया, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग की गई. इस आंदोलन ने उन्हें पूर्वी पाकिस्तान का सबसे बड़ा नेता बना दिया.

पाकिस्तान सरकार के खिलाफ आंदोलनों के कारण शेख मुजीब को कई बार जेल जाना पड़ा. ब्रिटिश शासन और बाद में पाकिस्तान के शासन के दौरान उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 13 साल जेल में बिताए.

1970 में पाकिस्तान में पहला आम चुनाव हुआ, जिसमें अवामी लीग ने भारी जीत दर्ज की. लेकिन पाकिस्तान की सैन्य सरकार ने सत्ता हस्तांतरण से इनकार कर दिया. इसके बाद 7 मार्च 1971 को शेख मुजीब ने ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसे बाद में बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत माना गया.

25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तान सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू की. इसके बाद 26 मार्च 1971 को बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की गई. इसी के साथ बांग्लादेश मुक्ति संग्राम शुरू हुआ. युद्ध के दौरान शेख मुजीब पाकिस्तान की जेल में बंद रहे, लेकिन उन्हें बांग्लादेश की अस्थायी सरकार का नेता माना गया.

दिसंबर 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद जनवरी 1972 में वे देश लौटे और नए राष्ट्र के नेता बने. उन्होंने देश के लिए नया संविधान लागू किया, प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित किया और दुनिया के कई देशों से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए. उनकी विदेश नीति का प्रमुख सिद्धांत था- “सबके साथ मित्रता, किसी से दुश्मनी नहीं.”

1974 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में बंगाली भाषा में भाषण दिया, जो उस समय एक महत्वपूर्ण घटना मानी गई. हालांकि, स्वतंत्रता के बाद उनका शासन कई चुनौतियों से घिरा रहा. देश में आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और 1974 का भयानक अकाल उनकी सरकार के लिए बड़ी समस्या बने.

इन परिस्थितियों से निपटने के लिए उन्होंने जातीय रक्षी बहिनी नाम की अर्धसैनिक बल बनाई, जिस पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे. 1975 में उन्होंने देश में एकदलीय शासन व्यवस्था लागू की और राजनीतिक स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण बढ़ाया.

15 अगस्त 1975 को ढाका स्थित उनके धानमंडी 32 आवास पर सैन्य तख्तापलट में शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई.

आज भी बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिलती है. एक ओर उन्हें बांग्लादेश की स्वतंत्रता और बंगाली पहचान के प्रमुख नेता के रूप में याद किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उनके शासनकाल की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों को लेकर आलोचना भी होती है.

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