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एमएसपी

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एमएसपी (MSP) यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह तय कीमत है, जिस पर सरकार किसानों की कुछ प्रमुख फसलों को खरीदने के लिए समर्थन मूल्य घोषित करती है. इसका उद्देश्य किसानों को बाजार में कीमतें गिरने की स्थिति में एक आधार उपलब्ध कराना है. MSP कृषि क्षेत्र और किसान अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है.

भारत में MSP की व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि उपज की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से किसानों को सुरक्षा देने के लिए विकसित की गई. सरकार हर साल विभिन्न फसलों के लिए MSP घोषित करती है. इसमें खरीफ और रबी की फसलों के साथ कुछ अन्य प्रमुख कृषि उपज भी शामिल होती हैं.

MSP तय करने की प्रक्रिया में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. CACP खेती की लागत, मांग और आपूर्ति, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों, अलग-अलग फसलों के बीच मूल्य संबंध तथा किसानों और उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर अपनी सिफारिश देता है. इसके बाद केंद्र सरकार MSP पर फैसला करती है.

MSP के दायरे में धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार, रागी, दालों, तिलहनों और कपास जैसी कई फसलें आती हैं. हालांकि MSP घोषित होने का मतलब यह नहीं है कि किसान अपनी पूरी उपज सरकार को MSP पर ही बेचते हैं. सरकारी खरीद की मात्रा और व्यवस्था फसल तथा राज्य के अनुसार अलग-अलग होती है.

MSP को लेकर किसानों की प्रमुख मांगों में लंबे समय से सभी प्रमुख फसलों के लिए कानूनी गारंटी का मुद्दा शामिल रहा है. किसान संगठनों का कहना है कि MSP पर खरीद की मजबूत व्यवस्था से उन्हें बाजार में कम कीमत मिलने के जोखिम से राहत मिल सकती है.

MSP का मुद्दा वर्ष 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान भी प्रमुख मांगों में शामिल रहा. नवंबर 2021 में तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद भी MSP पर कानूनी गारंटी समेत कई मांगों को लेकर किसान संगठनों ने अपनी आवाज उठाई.

इस तरह MSP केवल फसल की कीमत से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि किसानों की आय, कृषि बाजार और सरकारी खरीद व्यवस्था से भी इसका सीधा संबंध है. इसलिए भारत में कृषि नीति और किसान आंदोलनों के संदर्भ में MSP लगातार एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है.

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