केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खर्च का नया रिकार्ड स्थापित किया है. वित्तीय वर्ष 2023-24 में पहली बार सरकारी खरीद पर 3 लाख 47 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए, जो पिछले उच्चतम स्तर 2 लाख 80 हजार करोड़ रुपये (साल 2020-21) से काफी अधिक है. यह वृद्धि दर्शाती है कि सरकार ने किसानों को फसलों के बेहतर दाम देने के लिए बड़े पैमाने पर समर्थन बढ़ाया है.
हालांकि, इस बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह नहीं है कि मोदी सरकार ने केवल एमएसपी बढ़ा दी है. इस खर्च में महंगाई के कारण एमएसपी की बढ़ोतरी के साथ-साथ फसलों की मात्रा और लाभार्थियों की संख्या में भी जबरदस्त वृद्धि शामिल है. यानी, अधिक किसानों को जोड़ा गया है और सरकारी खरीदारी भी पहले से अधिक की गई है. इस वजह से कुल खर्च में यह बड़ा इजाफा हुआ है.
किसान संगठनों के लिए एमएसपी आज भी सबसे अहम मुद्दा बना हुआ है. पिछले कुछ वर्षों से कृषि राजनीति इस बात पर केंद्रित रही है कि एमएसपी की गारंटी का कानून बनाया जाए. इस दिशा में संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य गैर-राजनीतिक किसान नेता भारत के विभिन्न हिस्सों में जागरूकता फैलाने और मांगों को जोर-शोर से उठाने के लिए किसान जागृति यात्राएं कर रहे हैं.
फिर भी, केंद्र सरकार एमएसपी की गारंटी देने वाले कानून को लागू करने से बचती दिख रही है. विपक्ष और किसान नेता सरकार से सवाल करते हैं कि अगर सरकार ही फसल का दाम तय करती है, तो उसमें गारंटी देने में क्या हर्ज है? उनका मानना है कि इस कदम से किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी और कृषि क्षेत्र में स्थिरता आएगी.
कितनी हुई खरीद?
कृषि क्षेत्र में किसानों के हितों की रक्षा और उनकी उपज को उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार द्वारा लागू न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) योजना की सफलता लगातार बढ़ती जा रही है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में एमएसपी पर खर्च की गई रकम, खरीदी गई कृषि उपज की मात्रा और लाभान्वित किसानों की संख्या तीनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
साल 2024-25 में सरकार ने एमएसपी के तहत रिकार्ड 3.47 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो पिछले वर्ष 2023-24 के 2.63 लाख करोड़ रुपये की तुलना में काफी ज्यादा है. यह वृद्धि किसानों को बेहतर आर्थिक सुरक्षा और खेती के लिए उत्साह प्रदान करती है. इससे न केवल किसानों की आय में सुधार होगा, बल्कि वे बाजार में भी अपनी फसल की बेहतर कीमत पा सकेंगे.
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एमएसपी से खरीदी गई कृषि उपज की मात्रा भी बढ़कर 1,223 लाख मीट्रिक टन हो गई, जो 2023-24 की 1,089 लाख मीट्रिक टन की तुलना में पर्याप्त इजाफा है. यह दर्शाता है कि किसानों ने एमएसपी की योजना पर विश्वास जताते हुए अधिक उत्पादन किया और अपनी फसलों को सरकारी खरीद केंद्रों पर बेचने के लिए भेजा.
सबसे बड़ी सफलता यह रही कि एमएसपी का लाभ उठाने वाले किसानों की संख्या भी बढ़कर 196.35 लाख हो गई, जबकि पिछले वर्ष सिर्फ 152.35 लाख किसान ही इस योजना से जुड़े थे. यह आंकड़ा बताता है कि सरकार की योजनाएं वास्तव में किसानों तक पहुंच रही हैं और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है.
आंकड़े बदलने का समय: एमएसपी लाभार्थियों की नई तस्वीर
भारतीय कृषि क्षेत्र की बहुप्रतीक्षित योजनाओं में से एक है न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), जो किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम दाम प्रदान कर किसानों की आय सुरक्षा सुनिश्चित करता है. परंतु, इसके प्रभाव और लाभार्थियों की संख्या को लेकर हमेशा विवाद होता रहा है.
2015 में भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन के लिए गठित शांता कुमार कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि देश में केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का सीधा लाभ मिलता है. यह आंकड़ा कृषि नीति और किसान संगठनों के बीच बहस का केंद्र बना रहा. अधिकांश किसान नेता और नीति निर्धारक इसी आंकड़े को आधार बनाकर एमएसपी प्रणाली की सीमाओं को उजागर करते हैं.
लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में कृषि खरीद के आंकड़ों में काफी परिवर्तन आया है. अब न केवल धान और गेहूं, बल्कि दलहन और तिलहन की खरीद भी पहले से कहीं अधिक हो रही है. इससे एमएसपी के लाभार्थी किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है. अब अनुमान है कि देश के लगभग 14 प्रतिशत किसान परिवार सीधे एमएसपी का लाभ उठा रहे हैं.
हाल ही के आंकड़ों के अनुसार, भारत में करीब 14 करोड़ किसान परिवार हैं, जिनमें से लगभग 1.96 करोड़ परिवार एमएसपी के तहत अपनी फसलों की बिक्री कर लाभान्वित हुए हैं. यह नए आंकड़े यह दर्शाते हैं कि एमएसपी की पहुंच अब पहले से अधिक किसानों तक फैल चुकी है.
क्यों हो रहा है आंदोलन?
हाल ही में केंद्र सरकार ने एमएसपी पर खरीद बढ़ाने की घोषणा की है, लेकिन इसके बावजूद किसान आंदोलन थमता नहीं दिख रहा. यह सवाल कई लोगों के मन में उठता है कि जब खरीद बढ़ाई जा रही है तो फिर किसान आंदोलन क्यों जारी है? इसका जवाब स्थिति की जटिलता में छिपा है.
दरअसल, सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर खरीदी की रकम और लाभार्थी किसानों की संख्या में निश्चित तौर पर वृद्धि हुई है. यह एक सकारात्मक पहल है, जो किसानों के हित में काम करती है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि किसानों को अपनी फसलों का उचित मूल्य मिल रहा है. सवाल है एमएसपी की कानूनी गारंटी का.

सरकार तो एमएसपी घोषित करती है, लेकिन यह गारंटी केवल सरकारी खरीद के लिए है. निजी क्षेत्र पर इसका कोई प्रतिबंध नहीं है. निजी व्यापारी बाजार में अपनी मर्जी से कीमत तय करते हैं और अक्सर एमएसपी से कम दाम पर ही खरीददारी करते हैं. इससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता. ऐसे में किसानों को बिक्री में आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
इसीलिए किसान संगठन एमएसपी की लीगल गारंटी की मांग कर रहे हैं, ताकि निजी क्षेत्र भी एमएसपी के दामों का पालन करे और किसानों को आश्वस्त किया जा सके कि उनकी फसल का न्यूनतम दाम तय रहेगा. इस गारंटी के बिना किसानों को आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, जो आंदोलन की मुख्य वजह बनी हुई है.
MSP फार्मूले पर जंग
भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का निर्धारण किसानों के जीवन और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वर्तमान में सरकार एमएसपी तय करने के लिए A2+FL (असल में चुकाई गई लागत और परिवार की मेहनत की अनुमानित कीमत) फार्मूले का प्रयोग कर रही है, जबकि किसान संगठन सी-2 (Comprehensive Cost) फार्मूले के आधार पर एमएसपी निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं. इस संघर्ष में फार्मूले को लेकर दोहरी जंग छिड़ी हुई है.
A2+FL फार्मूला किसानों की थोडी बहुत वास्तविक लागत और परिवार के श्रम की काल्पनिक कीमत को जोड़कर तैयार किया जाता है, जबकि सी-2 फार्मूला इसमें अनेक अन्य लागतों जैसे ब्याज, जमीन किराया, परिधान व्यय इत्यादि को शामिल करता है. स्वामीनाथन कमीशन ने भी सी-2 फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय करने की सिफारिश की है, ताकि किसानों को उनकी वास्तविक लागत के साथ-साथ उचित लाभ मिल सके.
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खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 में धान की एमएसपी A2+FL फार्मूले के तहत 2369 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि सी-2 फार्मूले के अनुसार यह 3135 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए. इसका अर्थ है कि किसान प्रति क्विंटल 766 रुपये का नुकसान उठा रहे हैं. इसी प्रकार अरहर की वर्तमान एमएसपी 8000 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि सी-2 फार्मूले के अनुसार यह 10258.5 रुपये होनी चाहिए, जिससे किसानों को लगभग 2258.5 रुपये प्रति क्विंटल की आर्थिक क्षति हो रही है.
यह स्पष्ट है कि सरकार और किसान संगठनों के बीच एमएसपी के निर्धारण के फार्मूले को लेकर बड़ा मतभेद है. किसान न्यायसंगत मूल्य की मांग कर रहे हैं ताकि उनकी आय सुरक्षित हो सके और वे कृषि कार्य को आर्थिक रूप से जीवंत रख सकें. इस फार्मूला जंग का हल निकले बिना भारत के किसानों की आर्थिक स्थिरता अधर में रहेगी.
कौन करता है MSP पर खरीद ?
सरकार किसानों को मूल्य समर्थन देने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) और अन्य राज्य एजेंसियों के माध्यम से अनाज एवं मोटे अनाज की खरीद करती है. यह कदम किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए अपनाया गया है, ताकि वे बाजार में होने वाले मूल्य गिरावट से प्रभावित न हों. जब दलहन, तिलहन, और कोपरा जैसे उत्पादों का बाजार मूल्य निर्धारित सर्वेक्षण मूल्य (एमएसपी) से कम हो जाता है, तब संबंधित राज्य सरकारों की सलाह के अनुसार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत मूल्य समर्थन योजना लागू की जाती है. इस योजना के अंतर्गत इन फसलों की खरीद की जाती है, जिससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है.
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प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (नेफेड) और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीसीएफ) प्रमुख खरीद एजेंसियां हैं. इसके अतिरिक्त, कपास की खरीद कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) और जूट की खरीद जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (JCI) द्वारा एमएसपी के अनुसार की जाती है.
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर सरकार 22 नोटिफाइड फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित करती है. इनमें प्रमुख खरीफ फसलें जैसे धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, रामतिल और कपास शामिल हैं. इसके अलावा, रबी फसलों में गेहूं, जौ, चना, मसूर, सरसों तथा कुसुम के अलावा जूट और कोपरा जैसी व्यावसायिक फसलें भी शामिल हैं. इस योजना के माध्यम से किसानों को बाजार की अनिश्चितताओं से बचाते हुए उनकी आय में स्थिरता प्रदान की जाती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है.