मध्य प्रदेश में गेहूं की फसल इस बार अच्छी खड़ी थी. खेतों में सुनहरे दाने लहलहा रहे थे, लेकिन इन दानों की चमक किसानों के चेहरों तक नहीं पहुंच पाई. कारण, सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी की तारीखों का बार-बार टलना. ईरान युद्ध के बाद बारदानों की कमी का हवाला देते हुए सरकार ने खरीदी की तारीख तीन बार आगे बढ़ाई.
नतीजा यह कि खेत से मंडी तक पहुंचे किसान समर्थन मूल्य का इंतजार करते-करते थक गए और औने-पौने दाम पर अपनी मेहनत बेचने को मजबूर हो गए. किसानों की इसी मजबूरी को करीब से देखने मैंने मध्य प्रदेश के तीन अलग-अलग शहरों में किसानों से बात की है. सबसे पहले मैं भोपाल की करोद मंडी पहुंचा. सुबह के नौ बज रहे थे.
मंडी में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतार लगी थी. कई किसान ट्रॉली पर तिरपाल डालकर गेहूं ढकने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि बीते दिनों की बेमौसम बारिश और आंधी ने पहले ही फसल की क्वालिटी पर असर डाला था. मंडी परिसर में बैठे किसान एक ही बात दोहरा रहे थे कि कब तक इंतजार करें?. नीली टी-शर्ट पहने सतीश पाल खड़े मिले.
उनके चेहरे पर थकान थी. उन्होंने कहा, ''हमने 2640 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बेचने की तैयारी की थी. सोसायटी का कर्ज चुकाना है, खाद-बीज का उधार देना है. लेकिन घर में रखे-रखे गेहूं खराब हो रहा था. मजबूरी में 2100-2200 में बेचना पड़ रहा है. सतीश की बात अधूरी ही थी कि पास खड़े दीपक दास बैरागी अपना दुख बयां करने लगे.
उन्होंने कहा, ''सरकार तारीख पर तारीख दे रही है. पहले 16 मार्च कहा, फिर 1 अप्रैल, फिर 10 अप्रैल. हमें मजदूरों का पैसा देना है. ब्याज रोज बढ़ रहा है. हम इंतजार करें तो कैसे?'' मंडी में बैठे-बैठे किसान बताते हैं कि कैसे हर एकड़ पर उन्हें गेहूं उगाने पर जो लागत आ रही है, उसका आधा दाम भी उनको गेहूं बेचने पर नहीं मिल रहा है.
भोपाल से करीब 300 किलोमीटर दूर, मध्य प्रदेश-राजस्थान सीमा पर स्थित मंदसौर की मंडी में भी तस्वीर अलग नहीं है. यहां किसान मोहनलाल गुप्ता से मुलाकात हुई. उनके हाथ में बिक्री की पर्ची थी. उस पर साफ लिखा था 2000 और 2160 रुपए प्रति क्विंटल. उन्होंने कहा, ''समर्थन मूल्य 2640 है, लेकिन हमें 2160 में बेचना पड़ रहा है.''

मोहनलाल गुप्ता का भी यही कहना था कि उनको मजदूरों का भुगतान करना है, सोसायटी भरनी है. सरकार अच्छी है, लेकिन समय पर खरीदी चालू कर देती तो वो संतुष्ट हो जाते. उनकी आंखों में नाराजगी से ज्यादा थकान थी. उन्होंने बताया, ''मेरे पास 150 क्विंटल गेहूं था. यदि 500 रुपए प्रति क्विंटल कम मिले, तो 75 हजार रुपए का घाटा हुआ.''
उनका कहना था कि एक छोटा किसान इतना नुकसान कैसे सह पाएगा. मंदसौर मंडी में खड़े फूलचंद राठौर की मजबूरी और निजी थी. उन्होंने कहा, ''घर में पोते की शादी है. पहले कहा मार्च में खरीदी होगी, फिर अप्रैल बताया. शादी टाल नहीं सकते. मंडी में भाड़ा भी लगता है, खर्च भी होता है. पैसे चाहिए थे, इसलिए गेहूं को बेच दिया.''
किसानों की यह मजबूरी सिर्फ आर्थिक नहीं, मानसिक भी है. गेहूं को घर में लंबे समय तक रखने का जोखिम है. बारिश, नमी, चूहे और खराब होती क्वालिटी. कई किसानों ने बताया कि वे हर दिन अनाज की बोरियां पलटते हैं, ताकि नमी न लगे. लेकिन कब तक? मंडी में एक बुजुर्ग किसान ने कहा, ''बेटा, हम लड़ना नहीं चाहते. हमें बस समय पर खरीदी चाहिए.''
उनकी आवाज में शिकायत कम, बेबसी ज्यादा थी. आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल समर्थन मूल्य 2640 रुपए प्रति क्विंटल तय हुआ. खरीदी की शुरुआत पहले 16 मार्च से होनी थी. फिर इसे 1 अप्रैल किया गया. उसके बाद 10 अप्रैल से शुरू करने का आदेश आया. बारदानों की कमी के चलते तारीखें आगे बढ़ती रहीं.
सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, खासकर ईरान युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. लेकिन किसानों का सवाल है कि क्या वैश्विक संकट का पूरा बोझ वे ही उठाएं? मंडी के बाद मैंने रुख किया सीहोर का. यहां गांवों में जाकर देखा तो कई घरों के आंगन में गेहूं की बोरियां करीने से रखी थीं. महिलाएं चिंतित थीं.

शादी-ब्याह, बच्चों की फीस और रोजमर्रा के खर्च कैसे निकलेंगे. एक किसान की पत्नी ने कहा, ''जब गेहूं बिकेगा तभी घर चलेगा. अभी तो उधार में सब चल रहा है.'' मध्य प्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में है. यहां की मंडियों में हर साल लाखों टन गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है. लेकिन इस बार देरी ने किसानों की पूरी गणित बिगाड़ दी है.
बैंक का ब्याज, सोसायटी का कर्ज, साहूकार का उधार, सबका दबाव एक साथ है. खेत से मंडी तक की इस यात्रा में मैंने एक बात साफ देखी, किसान नाराज जरूर है, लेकिन टूटना नहीं चाहता. वो उम्मीद लगाए बैठा है कि शायद आने वाले कल से खरीदी शुरू हो जाए, शायद अगली ट्रॉली में उसे समर्थन मूल्य मिल जाए.
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हर दिन की देरी उसके लिए सीधे घाटे में बदल रही है. हर क्विंटल पर 400-600 रुपए का नुकसान सिर्फ आंकड़ा नहीं, उसके बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के भविष्य से जुड़ा सवाल है. मध्य प्रदेश में गेहूं तैयार है, मंडियां तैयार हैं, किसान तैयार है. बस इंतजार है समय पर फैसले का.