मैराथन धावक बनने के लिए किसी खास कद-काठी या 'जेनेटिक ग्लव' में फिट होना जरूरी नहीं. दौड़ना सबके लिए है. अगर आपके फेफड़ों को यह रफ्तार पसंद आ जाए और शरीर 42.195 किमी तक लगातार दर्द सहने को तैयार हो जाए, तो यह सिर्फ खेल नहीं, आपका जुनून बन जाता है. एक ऐसी दीवानगी, जो आपको खुद से आगे धकेलती है. मैराथन उन्हीं के लिए है जो रुकना नहीं जानते. सांसें जलती हैं, भीतर आग सुलगती है, कदम एक लय में उठते-गिरते हैं और आप अपनी ही दुनिया में खोकर हर सेकंड को चीरते हुए महानता को छूने की कोशिश करते हैं.
अभी कल ही पंजाब के गुरदासपुर हाईवे के पास निक्की कलां गांव में एक कबड्डी टूर्नामेंट के दौरान एक दृश्य दिखा, जो इस खेल की आत्मा को बयान करता है. गेहूं की सुनहरी फसलों के बीच, 15 साल से भी कम उम्र का एक लड़का मैदान के चक्कर पर चक्कर लगाए जा रहा था. उसकी तल्लीनता इतनी गहरी थी कि आखिरकार किसी को उसे रोकना पड़ा...क्योंकि हर खेल में एक समय पर रुकना भी जरूरी होता है.
... लेकिन भारतीय मैराथन की कहानी में 48 साल तक एक नाम सबसे बड़ा बना रहा. शिवनाथ सिंह...जिसकी छाया हर धावक पर भारी पड़ती रही.दशकों तक भारतीय धावक आखिरी किलोमीटरों में कमजोर पड़ते रहे. वे वह तेज अंतिम प्रयास नहीं कर पाए, जो मैराथन को सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी बनाता है. ऐसा लगता था कि शिवनाथ सिंह का रिकॉर्ड हर धावक के साथ मौजूद है और उन्हें लगातार बेहतर करने के लिए प्रेरित कर रहा है.
1976 मॉन्ट्रियल ओलंपिक में 2:16:22 का समय लेकर 11वें स्थान पर रहे शिवनाथ सिंह ने 1978 में जालंधर राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में 2:11:59 (बाद में 2:12:00) का समय निकालकर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जो लगभग आधी सदी तक अटूट रहा.
और फिर आया 12 अप्रैल 2026
नीदरलैंड्स के रॉटरडैम मैराथन में 28 साल के धावक सावन बरवाल ने इतिहास रच दिया. फिनिश लाइन से कुछ मीटर पहले वह बेहोश होकर गिर पड़े. उठे, फिर गिरे. समय फिसल रहा था. एक वॉलंटियर ने सहारा दिया और लड़खड़ाते कदमों से वह फिनिश लाइन पार कर गए- 2:11:58 के समय के साथ. सिर्फ 2 सेकंड से सही, लेकिन 48 साल पुराना नेशनल रिकॉर्ड टूट चुका था.
2016 रियो ओलंपियन नितेंद्र सिंह रावत इस ‘दबाव’ की बात को खारिज करते हैं. उनके मुताबिक, 'हमने शिवनाथ के बारे में सुना था, लेकिन हम अपनी-अपनी रेस दौड़ते थे.' फिर भी सच यही है कि वह रिकॉर्ड हर धावक के दिमाग में कहीं न कहीं मौजूद था.
कोच और एशियाई पदक विजेता सुरेंद्र सिंह मानते हैं कि कभी-कभी बिना किसी बोझ के दौड़ना ही सबसे बड़ा फायदा होता है. वे कहते हैं, सावन के लिए दिन परफेक्ट था. अगर वह अंत में नहीं लड़खड़ाते, तो 2:09 के करीब समय निकाल सकते थे.'
दरअसल, शिवनाथ सिंह का रिकॉर्ड सिर्फ एक समय नहीं था... वह एक मानसिक दीवार था. एक ऐसी सीमा, जिसे पार करना भारतीय धावकों के लिए असंभव-सा लगने लगा था. और यह तब, जब दुनिया आगे निकल चुकी थी. उदाहरण के तौर पर, केन्या के केल्विन किप्टुम ने 2023 में 2:00:35 का विश्व रिकॉर्ड बनाया था.
13 अप्रैल 2026 की सुबह, भारतीय मैराथन के लिए एक नए युग की शुरुआत थी. शिवनाथ सिंह ने 48 साल पहले इस खेल को धड़कन दी थी और शायद अपनी आखिरी सांस तक यही उम्मीद की कि कोई उनका रिकॉर्ड तोड़े. आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अगर होते, तो सबसे पहले सावन बरवाल को गले लगाते.
क्योंकि असली चैम्पियन कभी नहीं चाहता कि उसका रिकॉर्ड दशकों तक अटका रहे. यह खेल की प्रगति के लिए अच्छा संकेत नहीं होता.
सावन का यह रिकॉर्ड सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक मानसिक बाधा का टूटना है. अब यह 2:11:58 आने वाले समय में और नीचे जाएगा. नितेंद्र रावत कहते हैं, 'रिकॉर्ड टूटते ही बाकी खिलाड़ी भी उसे निशाना बनाने लगते हैं. 2:09 तक हम जा सकते हैं, लेकिन उसके लिए दुनिया के बेहतरीन धावकों के साथ लगातार दौड़ना होगा.'
हिमाचल प्रदेश के मंडी से आने वाले सावन बरवाल खुद कहते हैं, 'मैं यहां रिकॉर्ड तोड़ने के इरादे से आया था. 2:08 से 2:10 का लक्ष्य था. आखिरी 2 किमी में हवा और ठंड ने असर डाला, नहीं तो मैं अपना लक्ष्य हासिल कर लेता.'
उनकी कहानी में नाटक भी है. आखिरी पलों में ब्लैकआउट, सिर पर पानी डालना और फिर लड़खड़ाते हुए फिनिश लाइन पार करना. लेकिन यही तो मैराथन है, जहां जीत सिर्फ पैरों से नहीं, जिद से मिलती है.
उधर, शिवनाथ सिंह के घर में यह खबर खुशी और हल्की उदासी दोनों लेकर आई. उनके बेटे अर्जुन कहते हैं, 'खुशी है कि रिकॉर्ड टूटा, लेकिन 48 साल का रिश्ता था उससे.' उनकी मां सीता देवी के लिए यह भावनात्मक पल था क्योंकि उस रिकॉर्ड में शिवनाथ की मेहनत, संघर्ष और पहचान जुड़ी थी.
फिर भी, यह बदलाव जरूरी था...
अब सावन बरवाल के सामने अगली मंजिल एशियन गेम्स है. और भारतीय मैराथन के लिए एक नई शुरुआत हो चुकी है. जब तक दौड़ने के लिए सड़कें हैं, कोई न कोई क्षितिज का पीछा करता रहेगा. रिकॉर्ड टूटते रहेंगे, लेकिन जो पहली लकीर खींचते हैं- वो दिग्गज हमेशा साथ दौड़ते रहते हैं.
रिपोर्ट- Sundeep Misra